Naxal Mukt Chhattisgarh NDTV Report: छत्तीसगढ़ को ‘नक्सल मुक्त' घोषित किए जाने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है, क्या वास्तव में यह लड़ाई पूरी तरह खत्म हो चुकी है? 31 मार्च 2026 को केंद्र और राज्य सरकार की ओर से लगभग नक्सल मुक्त भारत का ऐलान किया गया, लेकिन इसके बावजूद बस्तर और कांकेर के जंगलों में अब भी कुछ हथियारबंद नक्सलियों की मौजूदगी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनी हुई है. आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि बीते 26 महीनों में ढाई हजार से ज्यादा नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, सैकड़ों मुठभेड़ों में मारे गए और हजारों गिरफ्तार हुए. इसके बावजूद सवाल वही है; जो बचे हैं, जिनका न सरेंडर हुआ और न ही सामना, उनका आगे क्या होगा? क्या वे लोकतांत्रिक मुख्यधारा में लौटेंगे या यह चुनौती अभी कुछ वक्त और जारी रहेगी?
31 मार्च 2026: ‘लगभग नक्सल मुक्त' छत्तीसगढ़ का ऐलान
सरकार के अनुसार 31 मार्च 2026 को छत्तीसगढ़ को लगभग नक्सल मुक्त घोषित कर दिया गया. बीते दो वर्षों में सुरक्षाबलों ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए, जिनका असर जमीन पर दिखा. नक्सल घटनाओं में बड़ी गिरावट आने के साथ ही संगठनात्मक ढांचा लगभग टूट चुका है. हालांकि सरकार भी यह मान रही है कि कुछ चुनिंदा हथियारबंद नक्सली अब भी सक्रिय हैं, जिन पर लगातार नजर रखी जा रही है.

Naxal Mukt Chhattisgarh: नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ का दावा, लेकिन जंगलों में अब भी कुछ नाम चुनौती बने
आंकड़ों में सरकार की बड़ी उपलब्धि
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 26 महीनों में 2500 से ज्यादा नक्सलियों ने पुनर्वास योजना के तहत आत्मसमर्पण किया. पिछले दो साल में 600 से अधिक नक्सली मुठभेड़ों में न्यूट्रलाइज किए गए. 2000 से ज्यादा नक्सली गिरफ्तार किए गए. इन आंकड़ों के आधार पर सरकार का दावा है कि राज्य में सशस्त्र नक्सलियों की संख्या अब 20 से भी कम रह गई है.
कौन हैं वो नाम जो अब भी चुनौती बने हुए हैं?
नक्सलिज्म की तय डेडलाइन 31 मार्च 2026 के बाद भी ये कुछ बड़े नाम अब तक सुरक्षाबलों की पकड़ से बाहर हैं.
मोपल्ला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति : माओवादी संगठन का पूर्व महासचिव और पोलित ब्यूरो सदस्य. उम्र करीब 78 साल. उस पर एक करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित है.
मिसिर बेसरा : माओवादियों की सेंट्रल कमेटी का सदस्य. जानकारी के मुताबिक झारखंड और आसपास के जंगलों में लगभग 70 हथियारबंद नक्सलियों के साथ सक्रिय है. इस पर भी एक करोड़ रुपये से अधिक का इनाम है.
हेमला बेच्चा : बीजापुर और तेलंगाना की सीमा से लगे जंगलों में सक्रिय बताया जा रहा है. वह हिडमा की टीम से जुड़ा हुआ है और अब भी गिरफ्त से बाहर है.
चन्दर (DVCM स्तर) : कांकेर और सीमावर्ती जिलों के जंगलों में दर्जनभर सदस्यों के साथ सक्रिय बताया जा रहा है.

Naxal Mukt Chhattisgarh: नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ का दावा, लेकिन जंगलों में अब भी कुछ नाम चुनौती बने
उपमुख्यमंत्री का दावा: ‘घटना को अंजाम देने की स्थिति में नहीं'
उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा का कहना है कि छत्तीसगढ़ में सशस्त्र नक्सली समस्या लगभग समाप्त हो चुकी है. उनके अनुसार, “कुछ ऐसे लोग जरूर हैं जो हमारी सूची में हैं, लेकिन उन्होंने न तो आत्मसमर्पण किया है, न गिरफ्तार हुए हैं और न ही मुठभेड़ में मारे गए हैं. कांकेर और दक्षिण बस्तर में उनके छोटे समूह हैं, लेकिन वे अब ऐसी स्थिति में नहीं हैं कि किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकें. हमारी एजेंसियों के पास उनकी पूरी जानकारी है.”
सरेंडर और एनकाउंटर से कमजोर पड़ा नेटवर्क
31 मार्च के बाद भी घटनाक्रम जारी रहा. छत्तीसगढ़ में सक्रिय बड़े नक्सल लीडर सोढ़ी केसा ने तेलंगाना में आत्मसमर्पण कर दिया. वहीं बड़ी महिला नक्सली लीडर रूपी 13 अप्रैल को छोटे बेठिया में मुठभेड़ में मारी गई. इन घटनाओं ने नक्सल नेटवर्क को और कमजोर किया है.
सुरक्षाबलों की नई रणनीति: संपर्क और पुनर्वास
सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक बचे हुए हथियारबंद नक्सलियों से संपर्क साधने की कोशिश की जा रही है. प्राथमिक फोकस अब मुठभेड़ से ज्यादा पुनर्वास और सरेंडर पर है. एजेंसियां चाहती हैं कि बाकी बचे लोग भी हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटें.
‘नक्सल खात्मे' पर सियासत भी तेज
नक्सल मुद्दे पर सियासत भी जारी है. पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर के दंतेवाड़ा दौरे में कटौती को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए. प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला का कहना है, “सरकार नक्सल खात्मे का दावा कर रही है, लेकिन इतने बड़े खिलाड़ी को पूरी सुरक्षा नहीं दे पा रही. मुख्यमंत्री तक वहां जाने से परहेज कर रहे हैं, यह दिखाता है कि समस्या अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई.”
आखिरी चुनौती अभी बाकी
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है; छत्तीसगढ़ में नक्सल समस्या अब अपने अंतिम दौर में है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुई. कुछ गिने-चुने हथियारबंद नक्सली अभी भी जंगलों में हैं. सरकार और सुरक्षाबलों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे इन बचे हुए चेहरों को या तो लोकतंत्र की मुख्यधारा में लौटाएं या कानून के दायरे में लाएं. आने वाले महीनों में यही तय करेगा कि छत्तीसगढ़ सचमुच और स्थायी तौर पर नक्सल मुक्त बन पाता है या नहीं.
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