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ईरान के आसमान में हो रही लड़ाई होर्मुज पर क्यों आई? सब मास्टरमाइंड तिकड़ी का खेल है

ईरान में हो रही भीषण जंग होर्मुज पर कैसे पहुंची. इस युद्ध में अमेरिका के साथ-साथ रूस और चीन की क्या भूमिका है? रिपोर्ट में समझिए.

ईरान-इज़रायल और अमेरिका का युद्ध होर्मुज पर आकर अटक गया है. आपके मन में ये सवाल जरूर होगा कि मिसाइल और परमाणु खतरे को खत्म करने के लिए शुरू हुआ युद्ध होर्मुज के कंट्रोल पर आकर क्यों फंस गया है? इस बड़े और अहम सवाल का जवाब खोजने से पहले कुछ और सवालों के बारे में जानते हैं. क्या आपने कभी सोचा है कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया में जहां भी युद्ध या सैनिक टकराव हुए उसका कारण क्या है? 1945 के बाद हुए युद्ध और विवाद समुद्री ट्रेड गलियारों में आकर क्यों फंस जाते हैं? निशाने पर वो देश क्यों होते हैं जो अमेरिका और उसके दुश्मनों के बीच स्थित हैं? ऐसा क्यों होता है कि जहां चीन अपने व्यापार और रिश्तों के पैर बढ़ाता है वहीं अमेरिका के युद्ध वाले लंबे हाथ पहुंच जाते हैं?

शीत युद्ध के बाद अमेरिका बना बॉस

इन सवालों का जवाब खोजने के लिए आपको पिछले 81 साल के इतिहास को संक्षेप में देखना होगा. ये इतिहास दुनिया के तीन प्रमुख देशों के बीच बना और बिगड़ा है. जिनका नाम है अमेरिका, रूस और चीन. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दुनिया में अमेरिका और रूस की जंग कुख्यात थी इसे नाम दिया गया था शीत युद्ध. अमेरिका और रूस के बीच गोला-बारूद तो नहीं चलता था लेकिन वर्ल्ड नंबर वन बनने की लड़ाई चलती रहती थी. दुनिया को अमेरिका और रूस के पाले में बांट लिया गया था. कुछ देश गुटनिर्पेक्ष होने का दावा करते थे लेकिन उन्हें दोनो महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाना पड़ता था. फिर माना गया कि अमेरिका रूस के साथ रेस में बहुत आगे चला गया. निर्विवाद नंबर-1 हो गया. अमेरिका की अंग्रेजी और डॉलर का डंका बजने लगा. दुनिया का व्यापार डॉलर से होने लगा. डॉलर की कीमत गोल्ड जैसी हो गई. सारे बड़े वैश्विक संस्थान अमेरिका की पॉवर, मनी और इशारे पर चलने लगे. दूर दूर तक कोई टक्कर में नहीं था. दुनिया यूनिपोलर सी हो गयी थी.  एकतरफा पॉवर, कोई संतुलन नहीं, जो अमेरिका कहे वही सही. लेकिन दुनिया जब अमेरिका की शक्ति में बंधी हुई थी तो एशिया के एक कोने में कछुए की चाल से एक देश आगे बढ़ रहा था. इसका नाम है-चीन.

अमेरिका को चीन की चुनौती

चीन की चाल से पर्दा उठा तो सब हैरान रह गए. अमेरिका के लिए सुपर शॉक था. जहां देखो वहीं चीन. अमेरिका और उसकी पॉवर को एनर्जी देने वाले डॉलर और क्रूड ऑयल. दोनों के मैनेजमेंट को चीन ने खुलेआम चुनौती देनी शुरू कर दी. आज की हालत ये है कि पूरी दुनिया चीन और अमेरिका के सुपरपॉवर दंगल में फंसी हुई है. ये रोचक भी है और डरावना भी है. आने वाली दुनिया का नक्शा अमेरिका रूस और चीन की चालों में तैयार हो रहा है और इन्हीं के बीच हमारे सवालों के जवाब भी हैं.

  • घटना-1: स्पेन नाटो का सदस्य है और स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज हैं.सांचेंज से अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नाराज हैं. क्योंकि स्पेन ने ईरान के खिलाफ अमेरिका की जंग में अपने हवाई अड्डे साझा करने से इनकार कर दिया. ट्रंप की नाराजगी के बीच ही सांचेंज चीन की यात्रा पर निकले. चीन के राष्ट्रपति ने स्वागत में लाल कालीन बिछा दी. जबकि नाटो चीन के दोस्त रूस का दुश्मन है.
  • घटना-2:  यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की रूस के साथ युद्ध में हैं. जर्मनी ने स्वागत में लाल कालीन बिछा दी, जबकि जर्मनी के विदेशी व्यापार में चीन का नंबर-1 है.
  • घटना-3:  क्यूबा के राष्ट्रपति मिगेल डियाज,रूस और चीन के करीबी हैं, क्यूबा का ग्वांतानामो बे अमेरिका का स्ट्रेटजिक अमेरिकी अड्डा है. एक प्रमुख ट्रेड रूट का हिस्सा है. अमेरिका क्यूबा पर कब्जा करने की धमकी दे रहा है.
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ईरान युद्ध और बदलते समीकरण

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी के चांसलर फ़्रीडरिष मैर्ज़, ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डी सिल्वा और इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कट्टर दोस्त थे. लेकिन अब ये एक दूसरे के खिलाफ सार्वजिनिक बयान दे रहे हैं. दुनिया में सुपरपॉवर की पायदान का संतुलन बदल रहा है. जो देश कभी अमेरिका के साथ सीना तान के खड़े रहते थे अब वो नैतिकता,उसूल और इंटरनेशनल कानून की दुहाई देकर उससे अलग लाइन पर खड़े नजर आ रहे हैं.

चीन और अमेरिका के दंगल में फंसी दुनिया

जब होर्मुज के मुहाने पर पूरी दुनिया का अमन चैन और अर्थव्यवस्था फंसी हुई थी. माना जा रहा था कि  ईरान के दमदार प्रदर्शन के प्रायोजक चीन और रूस हैं. जब डोनाल्ड ट्रंप खुलेआम चीन को धमकी दे रहे थे कि अगर ईरान को हथियार दिए तो 50% एक्स्ट्रा टैरिफ लगा दूंगा. ऐन उसी दौरान चीन की यात्रा पर अमेरिका के कुछ प्रमुख दोस्त और दुश्मन मौजूद थे. ये थे संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नहयान, रूस के विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव और नामीबिया के विदेश और व्यापार मंत्री सेल्मा आशिपाला मुसावी.

इतना ही नहीं इससे आगे जो होने वाला है वो और ज्यादा हैरान करने वाला होगा. मई और जून के महीने में चीन की राजधानी बीजिंग में एक के बाद एक दुनिया की महाशक्तियों का दौरा तय है. मई महीने में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, रूसी राष्ट्रपति पुतिन, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्त्ज और ब्रिटन के कीर स्टार्मर पहुंचने वाले हैं. 2026 के नवंबर महीने में ही चीन के शेनझेन में APEC की बैठक होनी है, जिसमें अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप, रूस के व्लादिमीर पुतिन,  कनाडा के मार्क कार्नी,  जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ को आना होगा. तुम्हीं से मोहब्बत-तुम्ही से लड़ाई... ऐसी स्थिति के दो संकेत हैं एक सुपर पॉवर अमेरिका अपनी पोजीशन के लिए बेताब है. अमेरिकी की सर्वोच्चता छीनने के लिए चीन बेकरार है. तभी अमेरिका, उसके दोस्त और दुश्मन सब चीन की यात्रा पर हैं.

शक्ति का एक प्रमुख केंद्र चीन

सब उसे साधना चाहते हैं और इसी क्रम में चीन और अमेरिका टकरा रहे हैं. कभी बम में तो कभी बिजनेस में. दुनिया में आ रहे इस बदलाव और युद्ध के कारणों को समझने के क्रम में दुनिया के नक्शे पर एक एक करके गौर करना शुरू करें तो हमें पता चलता है कि हाल के दिनो में अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पड़ोसी कनाडा को धमकी दी कि उसे अमेरिका में मिला लेंगे. क्यूबा पर तो कब्जा कर लेने का बयान दिया. वेनेजुएला में पहले ह्यूगो शावेज के साथ विवाद हुआ उसके बाद निकोलस मादुरो को देश में घुस कर उठा लाए. अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देश पनामा को धमकी दी कि वो पनामा नहर को फिर अपने कंट्रोल में ले लेगा. इसके बाद पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया जबकि ट्रंप ने खुलेआम ऐलान कर दिया कि वो ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लेंगे. 

इस पूरी अमेरिकी उठापटक के पीछे सिर्फ और सिर्फ पांच बातें बतायी जा रही हैं.

  • डॉलर
  • पेट्रोलियम
  • मरीन कंट्रोल
  • रेयर अर्थ मिनरल्स
  • चीन-रूस

क्यूबा

क्यूबा में ग्वांतानामो बे है. जो 1898 में स्पेन के साथ युद्ध में अमेरिका ने जीती थी. 1903 में अमेरिका ने इसे लीज़ में बदल लिया. ग्वांतानामो बे कैरेबियन सी और अटलांटिंक शीपिंग रूट पर मौजूद है, जो कि अमेरिका के समुद्री व्यापार मार्ग के लिए उपयोगी और स्ट्रेटजिक है. मियामी से सिर्फ 400 किलोमीटर दूर है. क्यूबा में जैसे ही रूस या चीन का दखल बढ़ता है अमेरिका एक्टिव हो जाता है. क्यूबा के आयात निर्यात और विदेशी निवेश की लिस्ट पर चीन का नंबर दूसरे या तीसरे क्रम में रहता है. क्यूबा के इन्फ्रास्ट्रक्चर,विदेशी लोन में भी चीन की हिस्सेदारी भारी है.क्यूबा में चीन के टेलिकॉम और डिजीटल निवेश से अमेरिका को चिंता होती है. अमेरिका को आशंका है कि इसका इस्तेमाल उसके खिलाफ जासूसी के लिए किया जा सकता है.

पिक्चर क्लियर है लड़ाई अमेरिका और चीन की है लेकिन पिस रहा है क्यूबा. क्योंकि क्यूबा में चीन की बढ़त का मतलब है कैरेबियन और अटलांटिक सागर में अमेरिका के व्यापार को खतरा. इसके पहले जब क्यूबा में फिदेल कास्त्रो थे तब विचारधारा के आधार पर अमेरिका और क्यूबा भिड़ते थे. तब रूस का खुला समर्थन था. 1962 में रूस ने क्यूबा में परमाणु मिसाइल पहुंचा दी थी. परमाणु युद्ध का तनाव हो गया. अमेरिका पर आरोप है कि 1961 में अप्रवासी क्यूबा निवासियों की मदद से फिदेल कास्त्रो का तख्तापलट प्लान किया. यह असफल रहा. ये इतिहास में बे ऑफ पिग्स के नाम से कुख्यात है. 1962 में ऑपरेशन मोंगुस हुआ. अमेरिका की जासूसी एजेंसी CIA ने फिडेल कास्त्रो का तख्तापलट प्लान किया लेकिन असफल रहा. फिदेल कास्त्रो के समय में रूस और अमेरिका के बीच तनाव था. अब अमेरिका और चीन का तनाव है. तब इसे पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच संघर्ष कहा जाता था. अब भी अमेरिकी पूंजीवाद के सामने चीन का हाईब्रिड साम्यवाद है. यहां दो बातें याद रखें. पहली ये कि क्यूबा अमेरिका के प्रमुख ट्रेडरूट के रास्ते में है. दूसरा ये कि क्यूबा में साम्यवादी सरकार है. क्यूबा अमेरिका के विरोधियों चीन व रूस का करीबी है.

ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी का असली कारण

यहां जो फाल्टलाइन है उसमें एक बार फिर रूस अमेरिका और चीन आमने सामने हैं. इसके लिए हमें दुनिया के नक्शे के ऊपर पहुंच कर पीछे की ओर देखना पड़ता है. आर्कटिक महासागर के तट पर एक जगह है- ग्रीनलैंड. उत्तरी अमेरिका और यूरोप का चोक प्वाइंट. उत्तरी ध्रुव के आसपास का क्षेत्र. इसकी एक खासियत अमेरिका के अलावा बहुत कम लोग जानते हैं. ये खासियत है मिसाइल का बायपास, इसके हवाई क्षेत्र को अमेरिका पहुंच सकने वाली मिसाइलों का शॉर्टकट कहते है यानी पोलर मिसाइल ट्रैजेक्टरी. यहां पर ग्रीनलैंड- रूस और चीन का स्ट्रैटजिक ट्रैंगल भी बनता है. ग्रीनलैंड से सीधी रेखा खींचिए तो रूस, नॉर्थ पोल, ग्रीनलैंड, कनाडा और फिर अमेरिका दिखता है. यहां अमेरिका को आसमान में मिसाइल, पानी के नीचे पनडुब्बी और जमीन के ऊपर खुफिया निगरानी वाले सर्विलांस सिस्टम का खतरा रहता है. इसलिए अमेरिका ने ग्रीनलैंड के उत्तर में पिटुफिक गोल्डन डोम बनाया है. ये एक ऐसा सिस्टम है जो अमेरिका की ओर आने वाले मिसाइल,ड्रोन या विमान की पूर्व सूचना जारी करता है. मतलब अमेरिका पर किसी भी हवाई हमले की अलर्ट निगरानी करता है. 

ग्रीनलैंड के आर्कटिक जलक्षेत्र के पास से ही नॉर्दन सी रूट गुजरता है, जो कि रूस के उत्तरी तट के साथ चीन यूरोप व्यापार का प्रमुख रास्ता है. आर्कटिक सागर में चीन के रिसर्च शिप्स की भारी मौजूदगी रहती है. जलवायु परिवर्तन की वजह से ट्रांस आर्कटिक रूट बन रहे हैं जो कि यूरोप,अमेरिका,एशिया व्यापार और नौसैनिक आवाजाही के लिए महत्पपूर्ण हो रहे हैं. चीन खुद को नियर आर्कटिक स्टेट कहता है. पोलर सिल्क रोड और ग्रीनलैंड की ऊर्जा व खनिज में काफी दिलचस्पी दिखाता है. इतना ही नहीं चीन की हाईपरसोनिक मिसाइल्स के लिए भी ग्रीनलैंड का आकाश अमेरिका की बड़ी जरूरत है. ग्रीनलैंड में चीन ने पोर्ट और टेलिकॉम में बहुत ज्यादा निवेश किया है. ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ मिनरल्स की खोज में भी चीन काफी एक्टिव है. इसलिए अमेरिका को लगता है कि ग्रीनलैंड पर उसका कंट्रोल रहना चाहिए. ताकि चीन और रूस की मिलिट्री और मिसाइल थ्रेट को दूर रखा जाए. ग्रीनलैंड का अमेरिका के लिए बहुत स्ट्रेटजिक महत्व है वो अगर अमेरिका के कब्जे में रहेगा तो तो अमेरिका जी आई यू के (ग्रीनलैंड–आइसलैंड–यूके गैप) जो कि रूसी पनडुब्बियों का हाईवे हुआ करता था को भी को आसानी से ब्रिज कर पाएगा. अमेरिका की हवाई सुरक्षा शील्ड को कोई भेद नहीं पाएगा. अपने जासूसों पर भी अमेरिका नजर रख पाएगा. चीन और रूस को अमेरिका के लिए खतरा बनने से रोक पाएगा.

रूस की उत्तरी द्वीप श्रृंखला में फ्रैंज जोसेफ लैंड और ग्रीनलैंड का उत्तरी सिरा केप मोरिस जेसप काफी करीब हैं. यहां तक चीन नॉर्दन सी रूट के जरिए पहुंच जाता है. नॉर्दन सी रूट आर्कटिक तट के साथ रूस का ऐसा हिस्सा है जो कि यूरोप को पूर्वी एशिया से जोड़ता है. यहां एक स्ट्रेटजिक जानकारी जरूरी है वो ये कि अमेरिका को किसी ऐसे खतरे का डर नहीं है जो निकट भविष्य में हो सकता है. या फिर जमीन के रास्ते हो सकता हो. उसे भविष्य के हवाई खतरे की आशंका है और ऐसे हमले की क्षमता अभी रूस चीन या उनके किसी प्रॉक्सी के पास ही दिखती है. यही वजह है कि अमेरिका की युद्ध नीति में खाली, अकेले और सूनसान इलाकों को सबसे खतरनाक माना जाता है. क्योंकि वहां खतरे तैयार होने की सबसे ज्यादा आशंका होती है. ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए वैसी ही सूनसान जगह है. अमेरिका की युद्ध नीति में बफर लैंड के प्रति अलर्ट बहुत ज्यादा होता है. क्यूबा, पनामा, ग्वांतानामो बे और अब ग्रीनलैंड... ऐसे ही बफर लैंड हैं यहां पर अमेरिका विरोधी साइंटफिक रिसर्च हो सकती है. वहां के समुद्री पोर्ट, माइनिंग इन्वेस्टमेंट,  टेलिकॉम और सैटेलाइट के विकास की आड़ में अमेरिका के लिए खतरे का निर्माण किया जा सकता है. इसलिए अमेरिका की सबसे बड़ी रणनीति है कि अपने दुश्मन को अपनी हवाई और जमीनी सुरक्षा सीमा से दूर रखता है. इसके लिए वो दुश्मन और अपने बीच की जमीन,समुद्र या आसमान कड़ा नियंत्रण रखना चाहता है. एक्सपर्ट्स के मुताबिक क्यूबा, ईरान और अफगानिस्तान में धोखा खाने के बाद अब अमेरिका कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं दिखता है. सदा अलर्ट रहता है. हर उस जगह चीन,रूस या उसके प्रॉक्सी को टारगेट करता है.

पनामा

अमेरिका के नीचे लैटिन अमेरिका में पनामा नाम का देश है. इस देश के समुद्र में आने वाले हिस्से को काट कर एक आर्टीफिशिएल नहर बनायी गयी जिसका नाम है पनामा नहर. पनामा कनाल कैरेबियन सी पर बनी हुई है. अटलांटिक महासागर  और प्रशांत महासागर को जोड़ती है. इसकी वजह से समुद्री व्यापार में लगे जहाजों का समय बचता है,लागत घटती है और सप्लाई चेन को दुरूस्त रखने में मदद मिलती है. पनामा नहर बन जाने की वजह से अमेरिका की ओर जाने वाले व्यापारिक जहाजों का 15 से 20 दिन का वक्त बच जाता है. 160 से ज्यादा देश पनामा नहर से व्यापार करते हैं. साल में 14000 जहाज पनामा नहर से पार होते हैं. पनामा नहर अमेरिका चीन जापान और साउथ अमेरिका के बीच में प्रमुख लिंक है.अमेरिका के कंटेनर ट्रेड का 40% पनामा नहर से गुजरता है.अमेरिका की इंडो पैसफिक और अटलांटिक डिफेंस स्ट्रेटजी के लिए भी पनामा नहर बहुत ही संवेदनशील है. ये केवल बिजनेस रूट नहीं है बल्कि अमेरिका के लिए ग्लोबल पॉवर बैलेंस टूल भी है. पनामा नहर पर कोई भी अड़चन अमेरिका की सुरक्षा, इकॉनमी, डॉलर और पेट्रोलियम के लिए खतरनाक है. ऐसी नहर के पैसफिक साइड में स्थित बालबोअ और एटलांटिक साइड में स्थित क्रिस्टोबल के कंटेनर डीपो का काम हॉंगकॉंग से चलने वाली कंपनी संभालने लगी थी. इसे अमेरिका ने चीन का कब्जा कह दिया. इसके बाद पनामा नहर का मैनेजमेट फिर से आपने हाथ में लेने की धमकी दी. पनामा नहर का निर्माण अमेरिका ने 1914 में पूरा किया. 1999 तक मैनेज किया और फिर पनामा को सौंप दिया था.

वेनेजुएला

जहां चीन वहां अमेरिका और वहीं युद्ध की थ्योरी को एक और उदाहरण से समझते हैं. लैटिन अमेरिका के नक्शे में एक देश है वेनेजुएला. इसकी खासियत ये है कि इसकी जमीन के नीचे दुनिया का सबसे ज्यादा क्रूड ऑयल भंडार है. 2016 में चीन ने वेनेजुएला से तेल के बदले कर्ज करार किया. इसमें पैसा एडवांस दिया जाता था और तेल बाद में लिया जाता था. वेनेजुएला से चीन के आयात का दो तिहाई हिस्सा तेल उत्पाद थे. लेन देन अमेरिकी डॉलर की जगह चीनी मुद्रा युआन में होने लगा था. तेल निकालने में भी चीनी कंपनियों की भूमिका बढ़ने लगी थी. चीन की दो कंपनी CNPC और SINOPEC के पास विदेश में तेल निकालने के सबसे ज्यादा अधिकार हैं.

वेनेजुएला में यही काम पहले अमेरिकी कंपनी करती थीं. 2007 में वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने "तेल राष्ट्रवाद" के तहत वेनेजुएला में काम कर रही बड़ी तेल परियोजनाओं का राष्ट्रीयकरण कर दिया. देसी या विदेशी हर कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी 60% अनिवार्य कर दी. जो नहीं माना उसकी संपत्ति जब्त कर ली. इससे वेनेजुएला की ऑयल फील्ड्स में अमेरिका का बिजनेस प्रिवलेज खत्म हो गया. 2019 में निकोलस मादुरो ने भी ऐसे प्रतिबंध लगाए कि बची खुची अमेरिकी कंपनियों का काम रुक गया. अमेरिका छटपटाने लगा. घाव पर नमक ये कि तेल क्षेत्र में चीन का रुतबा बढ़ा. वेनेजुएला में चीन ने सैटेलाइट ट्रैकिंग स्टेशन बनाए. मिलिट्री और स्पेस सेक्टर में भी काम किया. चीन ने वेनेजुएला को सैन्य उपकरण भी बेचे जो कि लातिन अमेरिका में सबसे ज्यादा थे. वेनेजुएला में चीन के ये कदम अमेरिका की सुरक्षा और बिजनेस रणनीति के खिलाफ थे, नतीजा अमेरिका का बड़ा प्लान सामने आया. वेनेजुएला के खिलाफ ड्रग्स तस्करी को मुद्दा बनाया गया. वेनेजुएला के समुद्र पर नावों से हमला हुआ. कहा गया ड्रग्स तस्करी में शामिल हैं. फिर वेनेजुएला पर हमला हुआ. वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरों को उन्हीं के देश में घुस कर अमेरिका ने अरेस्ट किया. अमेरिका ले आया. अब उन पर अमेरिका में मुकदमा चल रहा है. वेनेजुएला की बागड़ोर अमेरिका समर्थक हाथों को सौंप दी गयी. मतलब साफ है जहां चीन के पांव फैले वहीं अमेरिका अपने हाथ लंबे कर देता है.

ईरान

वर्ल्ड डिप्लोमेसी एक्सपर्ट का मानना है कि त्रिशक्ति का संघर्ष ईरान के युद्ध में भी दिखता है. ईरान से अमेरिका और ब्रिटेन की लड़ाई भी तेल के कुओं पर कब्जे को लेकर शुरू हुई थी.1979 से पहले ब्रिटेन ही ईरान के तेल का मैनेजर था. ईरान में अयातुल्लाह खामेनेई के नेतृत्व में इस्लामिक क्रांति हुई. अमेरिका समर्थित शाह की सरकार को देश  निकाला मिला. मर जाए अमेरिका का नारा बुलंद हुआ. ईरान की इस्लामिक क्रांति जन्म से अमेरिका विरोधी हो गयी. ईरान के तेल कुओं का राष्ट्रीयकरण हुआ. ब्रिटेन को भागना पड़ा. तभी से अमेरिका के साथ ईरान की तनातनी शुरू हुई. अमेरिका समझ गया कि ईरान उसके लिए खतरनाक दुश्मन है. अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में ईरान के चारों ओर अपने डिफेंस के तंबू गाड़े. इज़रायल के साथ आयरन क्लैड सिक्योरिटी एग्रीमेंट किया. सुरक्षा गारंटी दी. मिडिल ईस्ट में इज़रायल अमेरिका का सेनापति बन गया. जॉर्डन के साथ डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट किया. वहां पर अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. सऊदी अरब को हथियार बेचे. मिसाइल और एयर डिफेंस सुरक्षा दी. हांलाकि औपचारिक रक्षा संधि नहीं की है. कुवैत में अमेरिका का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक/ग्राउंड सपोर्ट सेंटर है, जो ईरान और इराक के खिलाफ महत्वपूर्ण है. 

कतर में तो अमेरिकी सेना का मिडिल ईस्ट हेडक्वार्टर है. जिसे CENTCOM के नाम से जानते हैं. इनका एयर डिफेंस और फोर्स प्रोजेक्शन अमेरिका के पास है. बहरीन में अमेरिकी नेवी का मुख्यालय है. संयुक्त अरब अमीरात यानी यूएई के साथ हथियार और सुरक्षा सहयोग है. इराक,ओमान और मिस्र के साथ भी अमेरिका का सुरक्षा सहयोग है. ईरान, सीरिया, यमन और लेबनान अमेरिका के सुरक्षा चक्र से बाहर हैं. ऐसे घेरेबंदी के बाद अमेरिका को क्या हासिल हुआ? मिडिल ईस्ट से लगे परशियन गल्फ और लाल सागर में दुनिया के समुद्री व्यापार के दो प्रमुख दरवाजे हैं. परशियन गल्फ और ओमान की खाड़ी के बीच में होर्मुज स्ट्रेट और दूसरा है लाल सागर स्वेज कनाल से नीचे यमन और इथोपिया के बीच में बाब अल मंदेब स्ट्रेट. यहां भी ईरान और मिडिल ईस्ट में चीन की भूमिका है.

मिडिल ईस्ट के सऊदी अरब जैसे देश भी चीन के साथ व्यापार बढ़ा रहे हैं. इससे अमेरिका के पेट्रो-डॉलर का बादशाहत को चुनौती मिल रही है. चीन ने अफ्रीका के जिबूती में ब़डा मिलिट्री बेस भी तैयार किया है. ये जगह बाब अल मंदेब के करीब है. चीन अपनी महत्वाकांक्षी इंटरनेशनल योजना वन रोड वन बेल्ट के छाते तले मिडिल ईस्ट में कर्ज और निवेश बढ़ा रहा था. चीन तेल के बदले डॉलर की जगह युआन को प्रचलित कर रहा था. चीन की ऊर्जा जरूरत का 80% हिस्सा होर्मुज से आ रहा था. ईरान के साथ पूरा व्यापार यूआन में हो रहा था. ऐसे में अमेरिका मिडिल ईस्ट और ईरान में चीन के बढ़ते असर और ड़ॉलर को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए आक्रामक हो गया. परिणाम ये कि इज़रायल के साथ ऑपरेशन एपिक फ्यूरी लांच हुआ. जिसमें चेहरा बना ईरान का मिसाइल और एटॉमिक प्रोग्राम.


अमेरिका को लगा बड़े नेताओं को मार देंगे तो कौन युद्ध लड़ेगा. दांव पलट गया. नेता मरते गए लेकिन युद्ध नहीं रुका. ईरान ने एक के बाद एक ऐसे हथियार निकाले कि अमेरिका और इजरायल को बार बार रणनीति बदलनी पड़ी. इजरायल और अमेरिका के मिसाइल डिफेंस सिस्टम और एयरबॉर्न अटैक डिफेंस सिस्टम को धोखा देकर ईरान की मिसाइलें  मिडिल ईस्ट में बने अमेरिकी सेना के बेस पर गिरीं. ईरान की वो मिसाइल चर्चा का विषय बनीं जो टारगेट से पहले अपने रास्ता बदल लेती थीं, एक ही मिसाइल एक के बाद एक कई विस्फोटक छोड़ती थी. माना गया ये तकनीकी ईरान को चीन ने दी है और मिसाइल के एक्यूरेट अटैक की सूचना रूस से मिल रही है. लिहाजा अमेरिका ने स्टाइल बदली उसने चीन की दुखती रग पर हाथ रख दिया. युद्ध ईरान के आकाश और जमीन से निकल कर होर्मुज स्ट्रेट और तेल पर पहुंच गया. चीन का तेल फंस गया. दुनिया की गैस रुक गयी. इसके फौरन बाद ही होर्मुज के गतिरोध को तोड़ने के लिए पाकिस्तान और चीन सामने आए. सीज़फायर टाक्स शुरू हुईं.

हम सब जानते हैं कि पाकिस्तान जितना अमेरिका को प्रिय है उतना ही चीन के करीब है. तो क्या ये माना जाए कि वार्ता ईरान और अमेरिका से ज्यादा चीन और अमेरिका की जरूरत थीं? क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट में इन्हीं दोनों के इंट्रेस्ट फंसे हैं. होर्मुज के कंट्रोल पर अमेरिका और चीन मल्लयुद्ध शुरू हुआ. चीन का होल्ड देखिए कि जब वो सक्रिय हुआ तभी सीज़फायर की तारीखों का ऐलान हो सका था. चीन की गारंटी पर ही ईरान के नेता अमेरिका से बात करने इस्लामाबाद गए. होर्मुज स्ट्रेट पर जब अमेरिका ने ब्लॉकएड किया तो भी चीन के दखल से ही तनाव घटा. ये बात अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने आधिकारिक बयान में कही थी.इसे कुछ एक्सपर्ट न्यू वर्ल्डऑर्डर की शुरूआत की तरह भी देख रहे हैं. कुछ अमेरिकी सिस्टम के अंत का आरंभ भी कह रहे हैं और कुछ का कहना है कि अमेरिकी डॉलर की सत्ता के लिए गंभीर संकट खड़ा हो चुका है.
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अमेरिकी डॉलर और पावर के लिए ईरान युद्ध एक चुनौती

इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलिए.1971 में तेहरान एग्रीमेंट हुआ. ईरान, इराक, कुवैत, सऊदीअरब, UAE सहित 22 इंटरनेशनल तेल उत्पादक देशों का गठबंधन बना नाम था OPEC. इसके बाद 1950 से चला आ रहा सिस्टम टूटा. अब तक पश्चिमी देशों की तेल कंपनियां ही क्रूडऑयल और रेट मैनेज करती थीं. लेकिन 1971 के बाद ओपेक ने क्रूड ऑयल सिस्टम की कमान संभाल ली. कीमत और टैक्स पर नियंत्रण शुरू कर दिया. तेल की कीमत बढ़ा दी गयी. तेल कंपनी पर 50% टैक्स लगाया. इसके साथ ही ओपेक ने ऐलान कर दिया कि अगर डॉलर कमजोर पड़ा तो हम अपना घाटा मिटाने और लाभ पाने के लिए तेल के दाम बढ़ा देंगे. इसी के बाद से तेल की कीमत में राजनीति और डॉलर के रेट की एंट्री हो गयी. 1971 में अमेरिका के राष्ट्रपति निक्सन ने बम गिरा दिया. डॉलर के बदले सोने का रिजर्व रखने की व्यवस्था खत्म कर दी. पहले उतना ही डॉलर छपता था जितना सोना होता था. डॉलर कमजोर पड़ा. OPEC देशों की परचेजिंग पॉवर घटने लगी. तेल कंपनियों ने तेल के दाम बढ़ाए. इसी बीच 1973 में अरब-इजरायल युद्ध हुआ. इसे यौम किप्पूर युद्ध के नाम से जानते हैं. अरब देशों ने अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के तेल बेचना बंद कर दिया. इसे ऑयल इम्बार्गो के नाम से जानते है. तेल की कीमत चार गुना बढ़ा दी. पूरी दुनिया में हाहाकर मच गया. अमेरिका परेशान हो गया. लेकिन 1971 से 1973 के बीच समझदारों ने समझ लिया कि दुनिया की राजनीति में तेल को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. इस दौरान मिडिल ईस्ट में चार बड़ी बाते हुईं.

  • पहली:- यमन,इराक,सीरिया में सैन्य क्रांति हुई. कट्टरपंथी शासन आया.
  • दूसरा:-अरब राष्ट्रवाद के जोश में तेलधन को पश्चिमी देशों के कब्जे से मुक्त करने का दबाव बढ़ा.
  • तीसरा:- अरब देशों पर पूंजीवादी अमेरिका के दुश्मन साम्यवादी सोवियतसंघ का प्रभाव बढ़ रहा था.
  • चौथा:- ईरान-इराक के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा था. ईरान पर अमेरिका का प्रभाव था. इराक पर सोवियत संघ का. दोनो देश तेल निर्यात के लिए इस्तेमाल होने वाले शत्त-अल-अरब विवाद में उलझे हुए थे. इराक पूरे रास्ते पर दावा करता था जबकि ईरान आधे आधे की मांग कर रहा था. इरान में सत्ता के खिलाफ कुर्द विद्रोह हुआ जिसके पीछे ईरान का हाथ माना गया.

ऐसे में एक बार फिर रूस-अमेरिका ही आमने सामने थे. अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के रिचर्ड निक्सन और उनके बाद जेराल्ड फोर्ड राष्ट्रपति बने. निक्सन के समय में ही अमेरिका ने दांव चला सऊदी अरब की राजशाही को डर था कि उनके खिलाफ विद्रोह होगा. तब अमेरिका ने उसकी कमजोर नस पकड़ी. सऊदी से कहा कि तुम अपने तेल अमेरिकी डॉलर में बेचो. बदले में हम पूरी दुनिया से तुम्हारी रक्षा करेंगे. बदले में सऊदी अरब अपना पैसा अमेरिका में निवेश करेगा. इस चतुर संधि का सेहरा बंधा अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर और वित्तमंत्री विलियम साइमन के सिर.
इसके बाद ओपेक देशों ने भी डॉलर के बदले तेल की खरीद बिक्री का सिस्टम स्वीकार कर लिया. पूरा मिडिल ईस्ट और दुनिया इस सिस्टम से बंधती गयी. अमेरिका का डॉलर तेल की ताकत से मजबूत होता गया. अमेरिका अप्रत्यक्ष रूप से तेल के दाम रेग्यूलेट करने लगा.

तेल के खेल में चीन की एंट्री

तेल के बिना किसी का काम नहीं चलता लिहाजा डॉलर और तेल के कॉकटेल ने पूरी दुनिया में अमेरिका को सुपरपॉवर बनाने में बहुत मदद की. ऐसी स्थिति में चीन ने अमेरिकी मनी और मिलिट्री दोनो को गंभीर चैलेंज दिया. डॉलर की जगह युआन से तेल खरीदने लगा. ईरान को होर्मुज कंट्रोल करने की ताकत दी. ईरान को मिलिट्री टेक्नालॉजी दी. मिसाइल विकास में सहयोग किया. अब जरा 1974 से 2026 के बीच के वक्त को सोचिए और फिर देखिए कि दुनिया के सिस्टम में कितना बड़ा बदलाव आकार ले चुका है. ऐसे में टकराव तो होना ही है. इसलिए हो रहा है.

कनाडा

कनाडा में भी चीन ने तेजी से पैर फैलाने शुरू किए थे. खासकर टेलीकम्यूनिकेशन के क्षेत्र में, जिसके जरिए जासूसी करने के आरोप चीन पर लगते हैं. इसे झटका लगा जबकि चीन की प्रसिद्ध कंपनी हुवेई के सीईओ को कनाडा में अरेस्ट किया गया. जिसके बाद 2018 से 23 के बीच रिश्ते बहुत खराब हो गए थे. 2025 में मार्क जोसेफ कार्नी कनाडा के नए पीएम बने. इसके बाद चीन के प्रति कनाडा का रूख बदलने लगा. 2025 में ट्रंप ने कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की धमकी दे दी. जनवरी 2026 में कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने चीन की यात्रा की. दोनो देशों के बीच अबतक का सबसे ठोस आर्थिक रिश्तों का ढांचा तैयार हुआ. कनाडा और चीन के बीच व्यापार का बाकायदा एक रोडमैप बनाया गया है. इसने कनाडा के प्रति ट्रंप की धमकियों को बढ़ा दिया. कनाडा में भी चीन की चहल कदमी से अमेरिका का ब्लडप्रेशर बढ़ गया और हालात तनावपूर्ण हो गए थे.

लड़ाई चीन-रूस और अमेरिका की प्रॉक्सी पूरी दुनिया है?

वॉर की मास्टर माइंड त्रिमूर्ति की वजह से पूरी दुनिया प्रॉक्सीस मे कन्वर्ट हो रही है. जो देश दावा करते हैं कि वो न्यूट्रल हैं उनको भी विवाद के लक्ष्मण रेखा से बाहर रहने की आजादी नहीं है. घूम फिर कर वो घिर ही जाते हैं. कभी आर्थिक संकट तो कभी एनर्जी संकट. अभी युद्ध की वजह से होने वाले पर्यावरण संकट की बात तो कोई कर ही नहीं रहा है. ईरान एक देश है लेकिन अमेरिका के खिलाफ चीन और रूस के फ्रंट की तरह भी काम कर रहा है. ईरान ने इजरायल के खिलाफ हूती, हिज्बुल्ला, हमास और एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस को प्रॉक्सी की तरह तैयार किया. जिसने अमेरिका के सेनापति को घेरा. दुनिया के प्रमुख समुद्री व्यापार मार्ग में अमेरिका के लिए चुनौती बनकर उभरे. ईरान युद्ध में चीन ने एक गोली नहीं चलायी लेकिन अमेरिका के हथियार और शाख को इतना नुकसान पहुंचा दिया कि  अमेरिका ने ऑटोमोबाइल कंपनियों को आदेश दिया है कि वो सैनिक हथियार बनाए. ऐसी इमरजेंसी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार देखी गयी जबकि अमेरिका ने असैनिक उद्योगों को सैनिक ड्यूटी में लगा दिया है.

युद्ध का ट्रेडरूट कनेक्शन

चीन, अमेरिका और रूस, दुनिया के समुद्र में उन रास्तों के इर्दगिर्द बहुत एक्टिव हैं जहां से समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है. अगर आप दुनिया के नक्शे में देखे तो होर्मुज, बाब-अल-मांदेब, स्वेज कनाल, पनामा कनाल, जिब्राल्टर, बारबोरस स्ट्रेट, मलक्का स्ट्रेट और साउथ चाइना सी दिखते हैं. इसके अलावा कुछ और प्रमुख समुद्रिक जगहों पर चीन-रूस और अमेरिका आपस में टकराते हुए दिखते हैं.

त्रिशक्ति का टेक वॉर

चीन-रूस-अमेरिका अपनी श्रेष्ठता की लड़ाई केवल युद्ध के मैदान में नही लड़ते हैं बल्कि ये बिजनेस और इनोवेशन में भी एक दूसरे को नीचा दिखाने का मौका नहीं चूकते हैं. ऑपरेशन सिंदूर याद होगा. पहलगाम हमले की सजा देने के लिए जब भारत ने पाकिस्तान पर प्रहार किया तो वहां पाकिस्तान की खाल में चीन छिपा बैठा था. चीन बुरी तरह पिट गया. तो उसने भारत के रफाल विमानो के बारे में झूठ फैलाया. रफाल विमान भारत ने फ्रांस से खरीदे हैं, जो कि अमेरिका का मित्र और रूस का दुश्मन है. तो चीन ने फ्रांस की डिफेंस इंडस्ट्री को खराब बताया गया. चीन के लुटे पिटे विमानों के समर्थन में झूठा कैंपेन चला. इसके अलावा सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, चिप तकनीकी, इलेक्ट्रॉनिक व्हीकिल, लीथियम बैट्री और आर्टीफिशिएल इंटेलीजेंस के क्षेत्र में भी चीन-रूस अमेरिका टकरा रहे हैं. 

दुनिया के नक्शे में कई ऐसे देश हैं जो महाशक्तियों की मुक्केबाजी का मंच बने हैं. जैसे ताईवान, साउथ कोरिया, यूक्रेन, सऊदी अरब और इजरायल. अगर इनके पीछे से महाशक्तियों का सपोर्ट हट जाए तो इनका स्टेटस चेंज हो जाएगा. जिन्हें इस दावे पर शंका है वो इतिहास में इराक, सीरिया और लीबिया के चैप्टर खोल कर पढ़ लें. महाशक्तियों को चुनौती देने के चक्कर में इनकी दुर्दशा हो चुकी है.अब कोई नहीं जानता की इनके तेल और सरकार का असली मैनेजर कौन है? यूक्रेन युद्ध को देख लें जहां रूस और यूक्रेन की लड़ाई हुई तो अमेरिका और नाटो देशों ने यूक्रेन की खुल कर मदद की,सेना नहीं भेजी लेकिन हथियार और तकनीकी दी. बदले में अमेरिका ने यूक्रेन से रेयर अर्थ मिनरल की डील करने को कहा.

दुनिया में खतरे का बैरोमीटर ये तीन मुल्क हैं. अगर कहीं इनके इन्ट्रेस्ट टकरा रहे हैं तो समझ लीजिए वहीं पर जंग होगी. इस जंग का चेहरा बम वाला भी हो सकता है या फिर बिजनेस वाला भी. यहां एक बात और ध्यान रखें वो ये कि ये तीन सीधे नहीं लड़ेंगे. तीनो के पास परमाणु बम हैं. ऐसी स्थिति में एक नेचुरल डिटरेंस बना हुआ है. ऐसी स्थिति में होगा ये कि मोहरा कोई देश या बिजनेस होगा लेकिन चाल यही तीनो चलेंगे. ऐसी स्थिति में आज ईरान है तो कल क्यूबा हो सकता है. आज तेल है तो कल चिप या बैट्री हो सकती है.

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