Naxal Mukt Bastar: चार दशकों तक उत्तर बस्तर के घने जंगल नक्सल हिंसा, शहादत और डर के गवाह रहे. 1984 में शुरू हुआ माओवादी आतंक न केवल सुरक्षा बलों के लिए, बल्कि आम ग्रामीणों की ज़िंदगी के लिए भी सबसे बड़ी चुनौती बना. अब लगातार अभियानों और स्थानीय सहयोग से यह इलाका नक्सलवाद के अंत की ओर बढ़ रहा है. नक्सलवाद, एक ऐसा शब्द जिसने पिछले चार दशकों तक बस्तर को डर, हिंसा और अनिश्चितता के साए में रखा. हजारों परिवार उजड़ गए, गांव विकास की दौड़ से पीछे रह गए और पीढ़ियों ने बंदूक की छांव में ज़िंदगी गुजारी. अब जब उत्तर बस्तर नक्सलियों के अंत की ओर बढ़ रहा है, तो यह कहानी सिर्फ हिंसा की नहीं, बल्कि संघर्ष, बलिदान और शांति की उम्मीद की भी है.

Bastar Naxalism: बस्तर में नक्सलियों का खौफ खत्म
क्यों अहम है कांकेर?
उत्तर बस्तर का कांकेर जिला बस्तर का प्रवेश द्वार माना जाता है. महाराष्ट्र, नारायणपुर के अबूझमाड़, मोहला‑मानपुर, धमतरी और कोण्डागांव से सटा यह इलाका करीब 5,285 वर्ग किलोमीटर में फैला है. घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा यह क्षेत्र नक्सलियों के लिए लंबे समय तक सुरक्षित ठिकाना बना रहा, वहीं सुरक्षा बलों के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती भी रहा.
20 दिसंबर 1984: नक्सलियों की पहली दस्तक
उत्तर बस्तर में नक्सलियों की शुरुआत 20 दिसंबर 1984 को मानी जाती है. कांकेर के पखांजूर थाना क्षेत्र के बांदे चौकी अंतर्गत इरपानार गांव में 8 से 10 हथियारबंद लोगों ने कई घरों में डकैती की. जांच में खुलासा हुआ कि ये नक्सली महाराष्ट्र के एटापल्ली इलाके से आए थे. यही घटना उत्तर बस्तर में नक्सल हिंसा की शुरुआती कड़ी बनी. इसके बाद नक्सलियों ने घने जंगलों को अपना सेफ ज़ोन बनाकर समानांतर ‘जनताना सरकार' चलाने की कोशिश शुरू कर दी.
1998: जिला बना और पहला शहीद
मध्य प्रदेश शासनकाल में 1998 में उत्तर बस्तर को अलग जिला बनाया गया. जिला बने कुछ ही महीनों बाद 11 सितंबर 1998 को कोयलीबेड़ा थाना में तैनात प्रधान आरक्षक राजेश पांडे पर नक्सलियों ने घर में घुसकर हमला किया. बहादुरी से मुकाबला करते हुए वे शहीद हो गए. वे उत्तर बस्तर कांकेर के पहले शहीद जवान थे. इसके बाद अब तक नक्सल हिंसा में कांकेर के 92 जवान अपनी जान गंवा चुके हैं.
IED और मुठभेड़ों का दौर
1990 के दशक में नक्सलियों के श्रीलंका के प्रतिबंधित संगठन लिट्टे से संबंधों की चर्चा हुई. इसी दौर में नक्सलियों ने आईईडी जैसे खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल शुरू किया. 25 मार्च 2000 को कोयलीबेड़ा से निकली नक्सल गश्त पार्टी को सुलंगी‑गावड़ेपारा मार्ग पर आईईडी ब्लास्ट का सामना करना पड़ा. दो जवान घायल हुए. यह उत्तर बस्तर में पहला आईईडी हमला था. इसके बाद पूरे बस्तर में इस तरह के हमले आम होते चले गए. आज भी जंगलों में दफन आईईडी सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं.
पहली मुठभेड़ और बढ़ता संघर्ष
उत्तर बस्तर में पहली पुलिस‑नक्सली मुठभेड़ 7 अप्रैल 1999 को रावघाट क्षेत्र के तालबेड़ा के पास हुई. दोनों तरफ से गोलीबारी हुई, हालांकि कोई हताहत नहीं हुआ. इसके बाद मुठभेड़ों का सिलसिला शुरू हुआ, जिसमें कई जवान शहीद हुए. लगातार ऑपरेशन और बेहतर इनपुट के चलते नक्सलियों की पकड़ कमजोर होने लगी, लेकिन उन्होंने जवाब में और ज़्यादा क्रूरता दिखाई.
जन अदालत और ग्रामीणों की हत्याएं
नक्सलियों ने पहली बार ‘जन अदालत' लगाकर पीव्ही‑93 गांव के 28 वर्षीय खगेन्द्र मंडल की पुलिस मुखबिरी के शक में ग्रामीणों के सामने हत्या कर दी. इसके बाद अब तक 277 बेगुनाह ग्रामीणों की हत्या की जा चुकी है. इस हिंसा ने गांवों को खामोश और डरा हुआ बना दिया.
शहादत की पीड़ा: परिवारों की अधूरी ज़िंदगी
शहीद सब‑इंस्पेक्टर शिवलोचन साहू की पत्नी बताती हैं कि 2007 में नारायणपुर में नक्सल मुठभेड़ में पति की शहादत के बाद उनकी दुनिया उजड़ गई. त्योहारों की रौनक खत्म हो गई, बच्चों की जिम्मेदारी बोझ बन गई और हर नई शहादत की खबर पुराने ज़ख्म हरा कर देती है.
अंत की ओर ‘लाल आंतक'
आज स्थिति बदल रही है. लगातार सुरक्षा अभियानों, प्रशासनिक कोशिशों और ग्रामीणों के सहयोग से उत्तर बस्तर नक्सलियों के आखिरी दौर में पहुंच चुका है. सशस्त्र नक्सल गतिविधियों पर लगभग विराम लग चुका है. नक्सलियों के खात्मे के साथ यह उम्मीद जगी है कि अब गांवों में बिना डर के ज़िंदगी चलेगी, विकास पहुंचेगा और आने वाली पीढ़ियां गोलियों नहीं, सपनों की आवाज़ सुनेंगी.
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