- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुंगेली के POCSO मामले में केवल पीड़िता की उम्र को आधार मानकर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया.
- ट्रायल कोर्ट ने आरोपी दीपक वैष्णव को 20 साल कैद की सजा सुनाई थी लेकिन हाईकोर्ट ने उसे बरी कर दिया.
- हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने अपनी मर्जी से आरोपी के साथ यात्रा की और कोई जबरदस्ती या दबाव नहीं था.
High Court POCSO Decision: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुंगेली जिले से जुड़े एक चर्चित POCSO मामले में अहम फैसला सुनाते हुए बड़ा संदेश दिया है. कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी मामले में केवल पीड़िता की उम्र को आधार बनाकर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि पूरे घटनाक्रम, साक्ष्यों और परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है. इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को असंगत मानते हुए आरोपी दीपक वैष्णव को बरी कर दिया. कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा.
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 13 सितंबर 2022 का है. मुंगेली जिले की एक नाबालिग लड़की स्कूल जाने के लिए घर से निकली थी, लेकिन वापस नहीं लौटी. काफी तलाश के बाद भी जब उसका कोई पता नहीं चला तो पिता ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई. शिकायत में आशंका जताई गई कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है.
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ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को ठहराया था दोषी
मामले की सुनवाई के बाद विशेष POCSO कोर्ट, मुंगेली ने आरोपी दीपक वैष्णव को IPC की धारा 363 और 366 के साथ-साथ POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी माना था. ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को गंभीर अपराध का दोषी ठहराते हुए 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.
हाईकोर्ट में बचाव पक्ष की दलीलें
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि पीड़िता और आरोपी के बीच पहले से संपर्क था. दोनों के बीच फोन पर बातचीत होती थी और लड़की ने खुद अपनी इच्छा से आरोपी के साथ जाने का फैसला किया. दोनों ने मुंगेली, रायपुर, हैदराबाद और विजयवाड़ा जैसे शहरों की यात्रा की और करीब एक महीने तक साथ रहे. बचाव पक्ष का कहना था कि पूरे मामले में कहीं भी जबरदस्ती, दबाव या लालच के कोई साक्ष्य नहीं हैं.
राज्य पक्ष का तर्क: नाबालिग की सहमति अमान्य
वहीं राज्य सरकार की ओर से अदालत में कहा गया कि पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं है. आरोपी ने उसे उसके माता-पिता की देखरेख से दूर ले जाकर अपराध किया है, जो सीधे तौर पर POCSO एक्ट के तहत दंडनीय है.
हाईकोर्ट की टिप्पणी: “ले जाना” और “साथ जाना” अलग
दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों की गहराई से समीक्षा करने के बाद हाईकोर्ट ने साफ कहा कि “ले जाना” और “साथ जाना” दोनों अलग-अलग बातें हैं. कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने पीड़िता को जबरदस्ती या धोखे से उसके अभिभावकों की देखरेख से दूर किया. कोर्ट के अनुसार, यदि कोई लड़की खुद अपनी मर्जी से किसी के साथ जाती है, तो केवल इसी आधार पर अपहरण का अपराध सिद्ध नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने मेडिकल जांच और FSL रिपोर्ट पर भी गौर किया. रिपोर्ट्स में जबरन शारीरिक संबंध या हिंसा के कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले. इस आधार पर कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों को ठोस साक्ष्यों के साथ साबित करने में विफल रहा है.
POCSO एक्ट को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी
अदालत ने पाया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र करीब 15 वर्ष 10 माह थी. वह नाबालिग जरूर थी, लेकिन कोर्ट ने यह भी कहा कि हर मामले में केवल उम्र के आधार पर दोष तय नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब परिस्थितियां यह दिखाती हों कि पीड़िता अपनी इच्छा से गई थी और कोई जोर-जबरदस्ती नहीं हुई, तो ऐसे मामलों में विशेष सावधानी बरतना जरूरी है.
संदेह से परे साबित नहीं हुए आरोप
हाईकोर्ट ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो पाए. पीड़िता का आचरण और पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि वह अपनी इच्छा से आरोपी के साथ गई थी. इसी आधार पर कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटते हुए आरोपी दीपक वैष्णव को बरी कर दिया.
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