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खेती का नया ‘वॉटर मॉडल’! सिर्फ एक तालाब से किसानों की आमदनी 20% तक बढ़ी- रिसर्च

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में हुई रिसर्च में बड़ा खुलासा हुआ है. खेतों में बनाए गए फार्म पॉन्ड यानी कृषि तालाब किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन रहे हैं. अध्ययन के अनुसार तालाब वाले किसानों की शुद्ध आय 20 प्रतिशत से अधिक बढ़ी, जबकि फसल उत्पादन, पशुपालन और रोजगार के अवसरों में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की.

खेती का नया ‘वॉटर मॉडल’! सिर्फ एक तालाब से किसानों की आमदनी 20% तक बढ़ी- रिसर्च
  • बुंदेलखंड के छतरपुर के सलैया पंचायत में खेतों में तालाब बनाकर बारिश के पानी को सहेजने पर खेती में स्थिरता आई.
  • तालाब वाले किसानों की औसत कृषि आय बिना तालाब वाले किसानों से 20% अधिक पाई गई, जिससे आर्थिक स्थिति मजबूत हुई.
  • खेतों में तालाब बनने से फसल दोगुनी हो गई और गेहूं, धान, सोयाबीन जैसी फसलों की उत्पादकता में 20% से ज्यादा हुई.

बुंदेलखंड की पहचान अक्सर सूखे, पानी की कमी और खेती की मुश्किलों से जुड़ी रही है. बरसात के कुछ महीनों को छोड़ दिया जाए तो यहां के किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती खेतों के लिए पानी जुटाने की होती है. लेकिन छतरपुर जिले के एक गांव से आई नई रिसर्च यह भरोसा जगा रही है कि अगर बारिश के पानी को सही तरीके से सहेज लिया जाए, तो खेती की तस्वीर बदल सकती है. 

खेत में बना एक साधारण सा तालाब न सिर्फ फसलों को सूखे से बचा सकता है, बल्कि किसानों की कमाई भी बढ़ा सकता है. हालिया अध्ययन में सामने आया है कि जिन किसानों ने खेतों में तालाब बनाए, उनकी औसत आय 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई. यही वजह है कि अब यह मॉडल बुंदेलखंड जैसे इलाकों के लिए उम्मीद की नई किरण माना जा रहा है.

बुंदेलखंड में खेती के लिए मिली नई राह

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के राजनगर ब्लॉक की सलैया ग्राम पंचायत में वर्ष 2023 से 2025 के बीच यह अध्ययन किया. शोध का उद्देश्य यह समझना था कि खेतों और सामुदायिक स्तर पर बनाए गए तालाब खेती, आय और रोजगार पर कितना असर डालते हैं. अध्ययन में पाया गया कि जहां किसानों के पास पानी संग्रह करने की व्यवस्था थी, वहां खेती कहीं अधिक स्थिर और लाभदायक नजर आई.

बारिश का पानी बना किसानों का सहारा

बुंदेलखंड में खेती काफी हद तक मानसून की बारिश पर निर्भर है. बारिश कम होने या लंबे समय तक सूखा पड़ने पर किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. ऐसे में खेतों में बने तालाबों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इन तालाबों में जमा पानी का उपयोग जरूरत पड़ने पर सिंचाई के लिए किया गया, जिससे फसलों को सूखने से बचाया जा सका.

100 किसान परिवारों पर हुआ अध्ययन

शोधकर्ताओं ने कुल 100 किसान परिवारों का चयन किया. इनमें 50 किसान ऐसे थे जिनके पास सामुदायिक या निजी कृषि तालाब थे, जबकि 50 किसान पारंपरिक तरीके से बिना तालाब के खेती कर रहे थे. दोनों समूहों की खेती, आय, उत्पादन, पशुधन और रोजगार से जुड़ी स्थितियों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया.

दोगुनी हुई फसल लेने की क्षमता

रिसर्च में सबसे बड़ा बदलाव फसल चक्र में देखने को मिला. जिन किसानों के पास तालाब थे, उनकी क्रॉपिंग इंटेंसिटी 200 प्रतिशत तक पहुंच गई. इसका मतलब है कि वे एक ही खेत से साल में दो या उससे अधिक फसलें लेने में सफल रहे. दूसरी ओर, बिना तालाब वाले किसान सामान्य रूप से एक ही फसल तक सीमित रहे.

पैदावार में हुआ उल्लेखनीय इजाफा

तालाबों की वजह से खेतों में समय पर पानी उपलब्ध हुआ, जिसका असर सीधे उत्पादन पर दिखाई दिया. गेहूं, चना, सरसों, सोयाबीन, मूंगफली, तिल और धान जैसी प्रमुख फसलों की उत्पादकता में 12.5 प्रतिशत से लेकर 28.6 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई. इससे किसानों को बेहतर उत्पादन और अधिक मुनाफा मिला.

आमदनी में 20 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी

अध्ययन के अनुसार, जिन किसानों के पास तालाब थे उनकी औसत शुद्ध कृषि आय बिना तालाब वाले किसानों की तुलना में 20.1 प्रतिशत अधिक रही. यह अंतर बताता है कि जल संचयन की छोटी-सी व्यवस्था भी किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.

पशुपालन को भी मिला फायदा

तालाबों का लाभ केवल खेती तक सीमित नहीं रहा. सालभर पानी और हरे चारे की उपलब्धता रहने से पशुपालन को भी मजबूती मिली. अध्ययन में पाया गया कि लाभार्थी परिवारों में पशुओं की संख्या 9.5 प्रतिशत बढ़ी, जबकि दूध उत्पादन में 14.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इससे किसानों की अतिरिक्त आय के स्रोत मजबूत हुए.

पानी की उपलब्धता बढ़ने के बाद कई किसानों ने डेयरी और मछली पालन जैसे सहायक व्यवसाय भी शुरू किए. इससे उनकी आय सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रही. ग्रामीण परिवारों को सालभर रोजगार और अतिरिक्त कमाई के अवसर मिलने लगे.

रोजगार बढ़ा, पलायन घटने की उम्मीद

इस मॉडल का असर रोजगार के क्षेत्र में भी साफ दिखाई दिया. रबी सीजन में खेती का दायरा बढ़ने, सब्जी उत्पादन, पशुपालन और मछली पालन जैसी गतिविधियों के कारण प्रति हेक्टेयर रोजगार के अवसरों में 36.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई. इससे गांवों में स्थानीय स्तर पर काम बढ़ा और लोगों को रोजगार के लिए बाहर जाने की जरूरत कम पड़ सकती है.

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