देश के सबसे बड़े सुपरस्टार रजनीकांत उस आम इंसान के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए और कहा, "मैं आपको पिता का दर्जा देना चाहता हूं...". यह कहानी फिल्मी नहीं है. यह दास्तान है पालम कल्याणसुंदरम की. आखिर इन्होंने ताउम्र ऐसा क्या किया कि सुपरस्टार रजनी भी इन्हें पिता बनाना चाहते थे?
मां का एक मंतर और ज़िंदगी का अनोखा संकल्प
तमिलनाडु के एक छोटे से गांव मेलकरिवेलमकुलम में जन्मे कल्याणसुंदरम के सिर से बचपन में ही पिता का साया उठ गया था. बेसहारा मां ने अकेले दम पर पाला. मां हमेशा कहती थीं- "बेटा, जितना पाकर जिओगे, वो तो बस पेट भरेगा. लेकिन जो बांटकर जिओगे, वही तुम्हारी असली पहचान बनेगा."
मां की यह सीख कल्याणसुंदरम के दिल में घर कर गई. पढ़ाई में बेहद होनहार कल्याणसुंदरम लाइब्रेरी साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट बने और उन्हें सरकारी कॉलेज में लाइब्रेरियन की नौकरी मिल गई.
पहली सैलरी मिलते ही लिया चौंकाने वाला फैसला
जैसे ही पहली तनख्वाह हाथ में आई, कल्याणसुंदरम ने एक ऐसा फैसला किया जिसे सुनकर पूरा कॉलेज दंग रह गया. उन्होंने ऐलान किया कि वे अपनी नौकरी की एक-एक पाई अनाथ और गरीब बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करेंगे. 35 साल की नौकरी के दौरान उन्होंने अपनी 100% तनख्वाह जरूरतमंदों और अनाथ आश्रमों को दान कर दी.
खुद का पेट कैसे पाला?
अपना गुजारा चलाने के लिए वे रातों को एक स्थानीय होटल में वेटर और सफाईकर्मी का काम करते थे. दिन में कॉलेज के लाइब्रेरियन और रात में होटल के वेटर.
साल 1962 में जब भारत-चीन युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने रेडियो पर देशवासियों से मदद की अपील की, तो यह 22 साल का लड़का सीधे तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज के पास पहुंचा. उनके पास अपनी इकलौती 65 ग्राम की सोने की चेन थी, जिसे उन्होंने बिना एक पल गंवाए नेशनल डिफेंस फंड में दान कर दिया.

30 करोड़ का इनाम भी गरीबों में बांटा
1998 में जब वे रिटायर हुए, तो उन्हें पेंशन और फंड के तौर पर करीब 10 लाख रुपये मिले. उन्होंने वह पूरी रकम भी तुरंत दान कर दी. इसके बाद एक अमेरिकी संस्था ने उन्हें 'मैन ऑफ द मिलेनियम' चुना और 30 करोड़ रुपये का नकद इनाम दिया. कल्याणसुंदरम ने उसमें से एक भी रुपया अपने लिए नहीं रखा और पूरी रकम गरीबों के नाम कर दी.
जब किसी ने पूछा कि आपने इतना बड़ा इनाम क्यों ठुकरा दिया, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "होटल में काम करके मेरा गुजारा आराम से हो जाता है. जब इस दुनिया से जाएंगे, तो साथ क्या लेकर जाएंगे? सब यहीं रह जाना है."
रजनीकांत ने दिया पिता का दर्जा
साल 2012 में जब सुपरस्टार रजनीकांत को कल्याणसुंदरम जी के बारे में पता चला, तो वे इतने भावुक हुए कि उन्होंने सार्वजनिक रूप से उन्हें अपने पिता का दर्जा दे दिया. रजनीकांत ने उनसे अपने साथ महल में रहने की गुजारिश की, लेकिन कल्याणसुंदरम ने प्यार से मना करते हुए कहा- "अभी मेरा काम खत्म नहीं हुआ है." भारत सरकार ने साल 2023 में उन्हें प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान दिया.

फिर कहानी में आया एक और मोड़
आज 84-85 साल की ढलती उम्र में भी वे दिन-रात गरीबों की सेवा कर रहे हैं. लेकिन सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद भी सब कुछ दान कर दिया है. उन्होंने अपनी आंखें और पूरी देह तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज को रिसर्च के लिए दान करने का फैसला कर लिया है.
यानी जो इंसान जीते जी अपनी सांसों को दूसरों के नाम करता रहा, वह इस दुनिया से जाने के बाद भी किसी के काम आएगा. कल्याणसुंदरम की जिंदगी हमें सिखाती है कि दूसरों की मदद करने के लिए जेब से ज्यादा बड़ा दिल होना जरूरी है.
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