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जहां कभी थी नक्सलियों की गोलियों की गूंज, वहां अब जंगली भैंसों की धमक, कान्हा में 100 साल बाद वापसी

Asian Wild Buffalo in MP: मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में 100 साल बाद 'जंगली भैंसों' की ऐतिहासिक वापसी हो रही है. कभी नक्सलियों का गढ़ रहे सुपखार रेंज में अब प्रकृति का नया सवेरा होगा. असम से आने वाले इन मेहमानों और एमपी-असम वाइल्डलाइफ एक्सचेंज की पूरी कहानी पढ़ें."

जहां कभी थी नक्सलियों की गोलियों की गूंज, वहां अब जंगली भैंसों की धमक, कान्हा में 100 साल बाद वापसी

Kanha Tiger Reserve Buffalo News: जहां कभी नक्सलियों की बंदूकों से गोलियां बरसती थीं, अब वहां एक सदी बाद 'जंगली भैंसों' की दहाड़ गूंजने वाली है. दरअसल मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व की 'सुपखार रेंज', जो दशकों तक लाल आतंक का अजेय किला रही,अब देश के सबसे बड़े वन्यजीव पुनर्वास (Wildlife Reintroduction) की गवाह बनने जा रही है. असम से आने वाले इन खास मेहमानों के साथ न केवल 100 साल का इंतजार खत्म होगा, बल्कि यह 'टाइगर स्टेट' के ईको-सिस्टम में एक नए युग की शुरुआत भी मानी जा रही है. दिसंबर 2025 में नक्सल मुक्त घोषित होने के बाद अब यह जंगल नए सिरे से गुलजार होने जा रहा है.

लाल आतंक का अंत और एक नया सवेरा

बता दें कि कान्हा टाइगर रिजर्व की 'सुपखार रेंज' इतिहास में नक्सलियों की 'केबी डिविजन' (मंडला-डिंडोरी-उमरिया-अनूपपुर) के विस्तार का मुख्य केंद्र रही है. खटिया मोचा, भोरमदेव और बोरला जैसे तीन खूंखार दलमों के जरिए नक्सली अमरकंटक के पठार तक अपनी पैठ बनाना चाहते थे. लेकिन दिसंबर 2025 में प्रशासन की बड़ी कार्रवाई और नक्सलियों के सफाए व आत्मसमर्पण के बाद यह इलाका अब पूरी तरह सुरक्षित है. इसी सुरक्षा का नतीजा है कि वन विभाग अब यहां जंगली भैंसों के पुनर्वास जैसी महत्वाकांक्षी योजना को जमीन पर उतारने जा रहा है.

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असम से आएगा पहला जत्था 

फरवरी-मार्च 2026 तक असम के जंगलों से 10 जंगली भैंसों का पहला बैच मध्य प्रदेश पहुंचेगा. यह 'टाइगर स्टेट' के लिए एक ऐतिहासिक क्षण होगा. मध्य प्रदेश और असम के बीच वन्यजीवों की इस अदला-बदली में केवल भैंसे ही नहीं, बल्कि कई और मेहमान भी शामिल हैं. अगले 5 सालों में 50 जंगली भैंसों के अलावा, असम से गैंडे का एक जोड़ा और 3 कोबरा भी मध्य प्रदेश आएंगे. गैंडे और कोबरा भोपाल के वन विहार नेशनल पार्क की शोभा बढ़ाएंगे. बदले में मध्य प्रदेश से बाघों का एक जोड़ा और 6 मगरमच्छ असम भेजे जाएंगे. सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी और केंद्र सरकार ने इस प्रोजेक्ट को अपनी अंतिम हरी झंडी दे दी है.

वैज्ञानिक तैयारी और 150 हेक्टेयर का सुरक्षित घेरा

डीएफओ पुनीत गोयल के मुताबिक, इन जंगली भैंसों को सड़क मार्ग से लाने में लगभग 2 से 3 दिन का समय लगेगा, जिसके लिए पड़ोसी राज्यों से समन्वय किया जा रहा है. कान्हा में इनके लिए 150 हेक्टेयर का एक विशाल बाड़ा बनाया जाएगा, जिसे भविष्य में बढ़ाया जा सकता है. वैज्ञानिकों ने कान्हा को ही इसके लिए क्यों चुना, इसकी बड़ी वजह यहां की घास के मैदानों की गुणवत्ता, भरपूर जल स्रोत और न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप है. वन विभाग उन भैंसों को लाने पर ध्यान दे रहा है जो प्रजनन के लिए सही उम्र के हों, ताकि उनकी आबादी को तेजी से बढ़ाया जा सके.

जंगल की 'सेहत' सुधारेंगे ये गजराज जैसे भैंसे

एक पक्ष ये भी है कि जंगली भैंसों की वापसी केवल संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि पूरे जंगल की सेहत सुधारने के लिए है. ये जीव घास के मैदानों और आर्द्रभूमियों (Wetlands) के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभाते हैं. अपनी चराई के जरिए ये झाड़ियों के अतिक्रमण को रोकते हैं और जमीन में पोषक तत्वों के चक्र को बनाए रखते हैं. इससे हिरण जैसे अन्य शाकाहारी जीवों के लिए बेहतर आवास बनता है और अंततः बाघों के लिए भोजन की श्रृंखला मजबूत होती है. एक सदी पहले तक ये मध्य प्रदेश का अभिन्न हिस्सा थे और अब इनकी वापसी से 'फूड चेन' का वह अधूरा हिस्सा फिर से पूरा होने जा रहा है.

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