‘कबिरा सोई पीर है' उपन्यास को खोलते ही आप आप किताब का समर्पण पाठक को अपने पास रोकता है. यह समर्पण “जो अपनी राख से हर बार जन्म लेती रही और लगातार संघर्ष में है ऐसी अस्मिताओं के नाम” यूं ही किसी के जेहन में नहीं आ सकता. इसके लिए एक सुलझी हुई सामाजिक राजनैतिक समझ, परिपक्वता और पक्षधरता की जरूरत होती है. इस समर्पण से उपन्यास और लेखिका का पक्ष स्पष्ट होता है.
जातिभेद की जकड़नें, सामाजिक रूढ़ियाँ, स्त्री अस्मिता की छटपटाहट इस उपन्यास के केंद्र में है. स्त्रियों के मन के भीतर छुपे दर्द, पीड़ा, कसक, दबे हुए सालते हुए दुख, जीवन जीने के ढंग, प्रतिरोध से जुड़े अनुभव बहुत मजबूती से उपन्यास में आए हैं.

प्रेम कुमार
सवर्ण और दलित परिवारों का परिवेश, बुनावट, स्थितियां, मानसिकता, मनोविज्ञान, द्वंद्व विविध पात्रों और घटनाओं के माध्यम से खुलते हैं. इतने सारे पात्रों, घटनाओं और उनके भीतर की गहन यात्रा को एक उपन्यास में साधना आसान नहीं होता. लेकिन लेखिका ने पूरे कौशल के साथ यह किया है. उनका प्रस्तुति का अंदाज और सलीका प्रभावित करता है.
उपन्यास में हर कदम पर कवि उपस्थित है. इस कवि ने उपन्यास के हर हिस्से को बहुत सुंदर बना दिया है. लेखिका पत्रकार, कवि और कथाकार हैं. उनकी इस त्रयी ने उपन्यास को पठनीयता और गहनता दोनों लिहाज से समृद्ध किया है.
अनुभव, सीमा, माँ, पिता, तृप्ति, सुधांशु, कनिका, इंस्पेक्टर चौबे, नर्स सारे किरदार अलग-अलग तरह से अनूठे हैं. हर पात्र अपनी यात्रा और परिवेश के साथ उपस्थित है और इसको पात्रों की भाषा, शब्दावली के जरिये लेखिका ने रखा है. देशज शब्दों का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग अच्छा लगता है. कुछ ऐसे शब्द जो कहीं खो से गए थे उनका प्रयोग लेखिका की रेंज को दिखाता है कि उनकी भाषा पर, समाज पर कितनी बारीक पकड़ है, अवलोकन कितना सूक्ष्म है. वाक्यों में जो उपमाएँ हैं, विशेषण हैं, बिम्ब हैं सबमें एक सच है, सम्प्रेषण है. ये यूं ही सुंदर बनाने के लिए नहीं हैं, इनके बड़े अर्थ हैं.
दलित पृष्ठभूमि पर पहले भी काफी लिखा गया है. लेकिन इस उपन्यास में एक अलग सा अंदाज है, चुभन है, व्यंग्य है, क्रोध है, उबाल है लेकिन तरीका बड़ा सलीके का है. आज के परिवेश में जब एक ऐसा वर्ग खड़ा हो गया है जो यह जानने और मानने से इंकार कर रहा है कि यह भी एक सच्चाई है उसी दौर के घटनाक्रम और पात्रों के जरिये लिखा गया यह उपन्यास महत्वपूर्ण है.
उपन्यास में गांधी, अंबेडकर की घटनाओं का जिक्र भी महत्वपूर्ण है, जो लेखिका की सोच, तार्किकता, परिपक्वता को दिखाता है. यह सब एक लंबी तैयारी से ही संभव है. यह राजनैतिक उपन्यास है जिसमें समाजशास्त्रीय विवेचन घटनाओं और पात्रों के जरिये हुआ है.
यहाँ केंद्र में जाति का मुद्दा तो है ही लेकिन उसके अलावा बहुत से मुद्दे हैं जो मुद्दों की तरह नहीं रोज़मर्रा के जीवन की तरह इसमें खुलते हैं. वह हिस्सा जब छोटी बहन अपने ही भाई के द्वारा यौन शोषित होती है और किसी से कुछ कह नहीं पा रही, फिर दोनों बहनों का संवाद, उनकी सदाशयता घटना की कचोट की परतों को बहुत आहिस्ता से खोलती है. जैसे कोई ज़ख्म साफ करता हो कि दवा भी लग जाय और दर्द भी न हो.
स्त्रियों के संसार की तमाम परतें उपन्यास में खुलती हैं. जहां बड़े सुभीते से लेखिका यह बताने में सफल हैं कि ये जो एक-दूसरे के आमने सामने खड़ी स्त्रियाँ हैं असल में ये सब सताई हुई हैं और जरा सा हाथ बढ़ाने की देर है सब साथ ही हैं. स्त्रियों के हक़ की पूरी लड़ाई है लेकिन कहीं कोई लाउडनेस नहीं है.
प्रकृति के साथ जुड़ाव कदम-कदम पर इतने रूपों मे दिखता है कि आप उस जुड़ाव से जुड़े बगैर नहीं रह सकते. गंगा, गंगा पर पड़ती सूरज की किरनें, रातरानी की उचकती डाल, उसकी ख़ुशबू, चिड़िया सब आपके साथ हो लेते हैं. गंगा का किनारा, शहर ऋषिकेश उपन्यास में किसी पात्र की तरह आता है. गंगा नदी को कैसे सखि के रूप में तब्दील कर लिया है लेखिका ने जिससे कुछ भी कहा सुना जा सकता है. इसमें एक वेदना भी है और सुख है. पूरे उपन्यास में पीड़ा और प्रतिकार एक साथ चलते हैं. प्रकृति इस यात्रा में पात्रों की उदासी पोंछने और ज़ख़्मों पर फाहे रखने, कभी-कभी सपने बुनने के लिए उपस्थित रहती है. कई हिस्सों को पढ़ते हुए सुमित्रानन्दन पंत की याद हो आई.
मुझे उपन्यास में आए हर छोटे बड़े पात्र की उपस्थिति ने जिस तरह सामाजिक ताने-बाने की परतों को खोला है उसने बहुत प्रभावित किया. कोचिंग चलाने वाले विक्रम त्रिपाठी हों या कोचिंग के बाहर छात्रों की बातचीत, वो माहौल. सीमा का अपने होने वाले पति से पहली बार मिलने का अनुभव, सीमा की शादी में आई औरतों का तृप्ति पर किया गया कटाक्ष, भाई का एक्सीडेंट, सीमा का मैरिटल रेप और अस्पताल की नर्स का यह कहना कि, 'घर का है करके छोड़ना मत' इंस्पेक्स्टर चौबे का गुस्सा, चाचा की दलित राजनीति में घुसने की कमजोर सी कोशिश, पापा की रोज की हालत, चपरासी विनोद के ताने और तृप्ति की चुप्पी, उसके फर्स्ट आने पर पिता का माफी मांगना और घर आकर कहना बेटा अब कभी फर्स्ट मत आना, तृप्ति और सीमा की माँ का रात दिन का बड़बड़ाना, सीमा की ससुराल में स्त्रियों का पहले अलग-थलग होना फिर एक होना, कनिका की माँ की पति द्वारा किए गए यौन शोषण की कहानी ये सब समाज की सच्चाई पर पड़े सुनहरी पर्दे को तार-तार करते हैं.

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उपन्यास में एक हिस्सा कश्मीर का भी है
ऐसा लगा वो हिस्सा जैसे लाया गया है, वो न होता तो भी उपन्यास अच्छा ही चल रहा था लेकिन उस हिस्से के अंत में एक बच्चे के कोमल स्पर्श को जिस तरह लाया गया है इस हिस्से का आना अखरता नहीं बल्कि मानीखेज़ हो जाता है. एक बात यह है कि अंत में लगा कि उपन्यास को खत्म करने की जल्दी सी थी लेखिका को. प्रूफ की कुछ गलतियां भी अखरती हैं.
मैंने अरसे बाद कोई उपन्यास पूरा पढ़ा और इसका श्रेय उपन्यास को ही जाता है कि वह खुद को पूरा पढ़ा ले गया. इसे पढ़ते हुए लेखिका की पूरी तैयारी दिखती है. उनके पास समाजशास्त्रीय निगाह है, राजनैतिक समझ है और कोमल मन है. एक एक्टिविस्ट है जो समझाइश भी देता है. उपन्यास के शीर्षक बड़े ही सुंदर शेर के टुकड़े हैं जिनका उस हिस्से से जुड़ाव है. और अंत में वह पूरा शेर भी दिया गया है. यह काफी दिलचस्प है.
उपन्यास के अंतिम पेज पर प्रियदर्शन द्वारा लिखे गए ब्लर्ब की हर पंक्ति से सहमत होते हुए यही कहना चाहता हूँ कि यह एक महत्वपूर्ण उपन्यास है और इसे खूब पढ़ा जाना चाहिए, इस पर बात होनी चाहिए.
पुस्तक- कबिरा सोई पीर है (उपन्यास)
लेखक – प्रतिभा कटियार
प्रकाशक- लोकभारती प्रकाशन
लेखक परिचय (प्रेम कुमार)
प्रेम कुमार साहित्य, समाज और संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय लेखन करते हैं. उनकी रुचि समकालीन हिंदी साहित्य, सामाजिक न्याय, अस्मिता विमर्श और वैचारिक बहसों में रही है. पुस्तक समीक्षा और आलोचनात्मक लेखन के माध्यम से वे साहित्यिक कृतियों को व्यापक सामाजिक संदर्भों में पढ़ने और समझने का प्रयास करते हैं.
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