Mujhe Kyu Padhe: आप दुनिया के किसी भी हिस्से में हों, भोजन का स्वाद बढ़ाने का सबसे आसान तरीका है उसके साथ एक कहानी या किस्सा जोड़ देना. मसलन, मैं आपको मुंबई की किसी दुकान पर ले जाऊँ और बताऊँ कि स्ट्रगल के दिनों में शाहरुख खान यहीं से वड़ापाव खाते थे या इस दुकान की पानीपुरी खाने विराट कोहली आज भी मास्क लगाकर आते हैं, तो आप न सिर्फ़ उस दुकान का खाना खाएँगे, बल्कि वापस जाकर उसके बारे में अपने दोस्तों और साथियों को बताएँगे. दिलचस्प बात यह है कि भारतीय खाने के मामले में इंटरनेट पर फ़ैली ये तमाम कहानियाँ ज़्यादातर आधी-अधूरी, बढ़ा चढ़ाकर कही हुई या पूरी तरह मनगढ़ंत होती हैं. जैसे, आपको यकीन दिलाया जाता है कि बँटवारे की विभीषिका में पुरानी दिल्ली के लोग दबाकर तंदूरी चिकन और बटर चिकन खा रहे थे या शाहजहाँ के समय दिल्ली का हर अमीर-गरीब इंसान रोज़ चाट खाकर पेट ठीक रखता था.
'इतिहास की थाली' लिखने की शुरुआत यही सोचकर हुई कि चलो इन किस्सों की जाँच करते हैं, पता लगाएँ कि कौन सी बात में सच का नमक है और कहाँ सिर्फ़ चाट मसाला डालकर मिथक परोस दिए गए हैं. लेकिन कुछ ही समय में मुझे समझ आ गया कि भारतीय भोजन के इतिहास को सही से समझना, सिर्फ़ दो चार झूठी कहानियों को पकड़ने का नहीं है.
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अपनी पहली किताब ठाकुरबाड़ी लिखते समय मैंने महसूस किया था कि अगर आप इतिहास को सूखी तारीख़ों की जगह कहानी की तरह पढ़ते हैं, तो वह देखते ही देखते हमारे समय का ऐसा आईना बन जाता है, जिसमें आप अपनी की संस्कृति को साफ़-साफ़ देख पाते हैं.
इसके बाद खाने की थाली मेरे लिए टाइम मशीन बन गई. एक प्लेट बिरयानी में मुझे मुग़ल दरबार, रेलगाड़ी, 1947 के रिफ़्यूजी कैंप और आज के फ़ूड डिलीवरी ऐप सब एक साथ दिखने लगे. एक समोसा सिर्फ़ आलू और कुरकुरी पपड़ी का कॉम्बिनेशन नहीं रहा, बल्कि मंगोलों से लेकर मिलेनियल्स तक की सामूहिक स्मृति का प्रतीक हो गया.
देखिए ना, जो मोमो 90s की पीढ़ी को विदेशी लगता था, वही आज कॉलेज कैंटीन में रोज़मर्रा का हिस्सा है. और हाँ, इतिहास की थाली मे एक बात बिल्कुल साफ़ तौर पर समझाई, आप भी गाँठ बाँधकर याद कर लें कि “बिरयानी वेज नहीं होती, वेज तो पुलाव होता है”,कहकर खुद को फूड एक्सपर्ट बुलाने वाले लोग दरअसल भोजन के इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानते, वे सिर्फ़ सोशल मीडिया के हैश-टैग रिपीट करते हैं.

इस किताब को लिखने की प्रक्रिया भी अपने आप में किसी धीमी आँच पर कुछ लजीज़ पकाने जैसी थी. खाने का शौक तो बचपन से था, लेकिन दिल्ली आकर और अकेले रहते हुए पहली बार समझ आया कि रसोई सिर्फ़ गैस और बर्तन का जमावड़ा नहीं, एक तरह की लैब है. यहाँ आप रोज़ प्रयोग करते हैं, कभी नमक ज़्यादा, कभी कम, और धीरे-धीरे आपकी जीभ सिर्फ़ स्वाद नहीं, कहानी भी पहचानने लगती है. इस आदत की जड़ें बहुत पीछे थीं. माँ उस पीढ़ी से थीं जो हर महीने घर में नई-नई पत्रिकाएँ मँगवाती थीं, रेसिपी काटकर संभालती थीं, और फिर उन्हें हमारे ऊपर आज़माती थीं.
अब यह कह सकते हैं कि कभी उनके एक्सपेरिमेंट शानदार होते थे और कभी वीभत्स रस का अहसास कराने वाले. हालाँकि माँ ने खाने-पीने के बारे में कई तरह से सिखाया. वे खाना बनाकर पूछतीं, बताओ, इसमें कौन-कौन से मसाले पड़े हैं, क्या बदलें तो बेहतर हो जाएगा. इस आदत ने स्वाद के साथ साथ-साथ सवाल पूछने और उन्हें समझने की आदत भी डलवाई.
वैसे मेरे जीवन में में “कुछ नया” ट्राय करने का वायरस भी परिवार से आया. 1992 में जब हम नेपाल गए, तब टूरिस्ट की तरह अपना खाना खोजने के बजाय परिवार ने लोकल खाना चखने का फ़ैसला किया. वहीं पहली बार मोमो खाए, और माँ ने रेस्तराँ के किचन में झाँककर, इशारों और अंदाज़े से उसकी रेसिपी पकड़ी. बाद में हमारी रसोई में मोमो के साथ कई प्रयोग हुए.

बहरहाल, यह बताना ज़रूरी है कि इतिहास की थाली पर काम शुरू करने से पहले मैं लगभग 10,000 किलोमीटर अकेले भारत में घूमा. ट्रेन के डिब्बों, बस अड्डों, हॉस्टल, गली के ठेलों और छोटे-बड़े शहरों के गुप्त रेस्तराँ में खड़े होकर मैंने समझा कि इतिहास सिर्फ़ किताबों की आलमारियों से ज़्यादा, थालियों में परोसा रहता है. कहीं कोई बूढ़ा खानसामा आपको बताता है कि उसके दादाजी किस ज़मींदार के यहां पकाते थे और बीच में ही कोई ऐसी घटना निकल आती है जो आपने कभी स्कूल की किताब में नहीं पढ़ी. इसी सफ़र में मेरी मुलाकात इला जोशी से हुई; हम दोनों ने साथ मिलकर मुंबई और पुणे की कई गलियों में खाना, कॉफ़ी और बातचीत के बहाने शहरों को पढ़ा. आज इला मेरी पत्नी है और इस किताब के लिहाज़ से मेरी अनौपचारिक फ़ूड एडिटर भी; कोई भी बड़े दावे वाली लाइन अक्सर पहले उनकी टेबल से पास होती थी.
किताब लिखने के दो सालों में मैंने समझा कि भोजन पर लिखना दरअसल सत्ता, बाज़ार, उपनिवेश, नारीवादी संघर्ष और हमारी सामूहिक भूलने की बीमारी, सब पर लिखना है. इतिहास की थाली में आपको यह भी मिलेगा कि गाँधी जी विदेशी चीज़ों के विरोधी होते हुए भी आलू को अपनाए जाने के समर्थक क्यों थे. इंदिरा गाँधी की एक योजना ने कैसे भारत के फ़ाइन डाइनिंग को बदला और आपके जीवन में दाल मखनी और बटर नान जैसी चीज़ें उपलब्ध हुईं. रसोई को “परंपरा” कहकर कैसे पीढ़ियों तक महिलाओं से बिना वेतन का श्रम कराया गया, और बाद में “आज़ादी” और “फ़ेमिनिज़्म” को बेचने के नाम पर बाज़ार ने नए पैकेज में फिर से हमारा इस्तेमाल कर लिया. इतिहास की थाली लिखते-पढ़ते यह भी साफ़ होता गया कि दुनिया में चल रही बड़ी राजनीति का स्वाद भी अक्सर हमारे निवालों में मौजूद होता है.
हम सोचते हैं कि अमेरिका सिर्फ़ तेल के पीछे पागल है, लेकिन सन् 1854 में, जब तेल की खोज भी नहीं हुई थी, तब वह पक्षियों की बीट पर कब्ज़ा करने के लिए वेनेज़ुएला से लड़ाई करने को तैयार था. यानी सिस्टम की भूख संसाधनों की है, कभी ग्वानो, कभी तेल, कभी डेटा, और कभी दूसरे देशों के होनहार दिमाग. यही वजह है कि उसकी टेक कंपनियों के सीईओ भारतीय मूल के हैं; यह “डायवर्सिटी” की जीत कम, किसी दूसरे देश के अच्छे ह्यूमन रिसोर्स पर कब्ज़ा कर लेने की प्रक्रिया ज़्यादा है.

दूसरी तरफ़, हम हिंदुस्तानियों ने भी अपने इतिहास को कितनी आसानी से भुलाया है. चर्चिल की नीतियों के कारण द्वितीय विश्व युद्ध के समय बंगाल में लगभग तीस लाख लोग भूख से मर गए; यह आँकड़ा सिर्फ़ हिटलर के यहूदी नरसंहार से छोटा है. अंतर यह है कि यहूदियों ने इस त्रासदी को न खुद भुलाया, न दुनिया को भूलने दिया; हमने न खुद याद रखा, न दुनिया को याद दिलाया. बंगाल में चुनाव आते हैं, भाषणों में बहुत कुछ होता है, लेकिन उन तीस लाख को याद करने की बात भी कभी नहीं उठती. इतिहास कभी-कभी सिर्फ़ इसलिए भी हमारे साथ ज़्यादती कर देता है, क्योंकि हम उससे नज़रें मिलाने से कतराते हैं.
इन सबके बीच सबसे कठिन काम मुझे तथ्यों को ढूंढना नहीं, बल्कि उन्हें ऐसी भाषा में बदलना लगा जो थाली की तरह हो, जिसमें कोई भी बैठकर बिना डर के पहला निवाला उठा सके. कई बार किसी चैप्टर में बेहद शानदार लगने वाले पैराग्राफ़ काटने पड़े, क्योंकि कभी टोन उपदेश जैसा लग रहा था, तो कहीं मज़ाक की परत इतनी मोटी हो रही थी कि बात हल्की पड़ जा रही थी.
मेरी हमेशा से शिकायत रही है कि भारत और ख़ासकर हिंदी में हम नॉन-फ़िक्शन को हमेशा कोर्स की किताब या उपदेश देने का ग्रंथ समझते रहे हैं. इसीलिए, जब खुद किताब लिखना शुरू किया, तो कोशिश यही रही कि पाठक को इतिहास बोझिल न लगे, लेकिन वह महज़ ट्रेंडिंग किस्सा बनकर न बन जाए. आसान भाषा में कहें, तो यूपीएससी की तैयारी करने वालों से लेकर सिर्फ़ शौक के लिए पढ़ने वालों तक को कुछ न कुछ मिले और इन सबके साथ-साथ आपको अपनी रसोई, अपना घर, अपना शहर भी याद आए.
इस सफ़र के बीच एक दिन यह भी आया कि भारत में खाने और इतिहास पर लिखने वाले जिन लोगों को मैं प्रणाम करके पढ़ता था, उनमें से ही एक, प्रोफेसर पुष्पेश पंत ने किताब के काम की तारीफ़ की. उनको जब किताब का ड्राफ़्ट भेजा था, तो डर था कहीं डाँट न पड़े, मगर डॉक्टर पंत की बातों के बाद कहीं न कहीं यह भरोसा जगा कि कि शायद यह किताब सिर्फ़ मेरी निजी दीवानगी नहीं, किसी बड़े संवाद की शुरुआत भी हो सकती है. लेखक को अवॉर्ड मिल जाए तो अच्छा लगता है, लेकिन जिस शख्स से आपने अपने स्वाद और समझ की ट्रेनिंग ली हो, उनकी तरफ़ से एक छोटी-सी स्वीकृति भी अपने आप में बहुत बड़ा प्रमाणपत्र बन जाती है.
यह कोशिश कितनी कामयाब रही, यह तो पढ़ने वाले ही बता पाएंगे. हां, इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि जितना अनिमेष मुखर्जी ने इतिहास की थाली को लिखा, उससे कहीं ज़्यादा इतिहास की थाली ने अनिमेष मुखर्जी को लिखा.
- लेखक अनिमेष मुखर्जी
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