पूरा उत्तर भारत शीतलहर की चपेट में है और दिल्ली-एनसीआर में भी कड़ाके की सर्दी पड़ रही है. दिल्ली से सटे गुरुग्राम में पारा शून्य डिग्री के आसपास पहुंच गया, जिसके बाद एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें ओंस जमने को बर्फ बताया जा रहा है. इसके बाद से ही सोशल मीडिया पर बर्फ गिरने की बहस तेज हो गई. ऐसे में सवाल है कि क्या शून्य डिग्री तापमान के बाद गुरुग्राम में वाकई बर्फबारी हो सकती है? क्या सिर्फ तापमान ही बर्फबारी का पैमाना होता है या इसके पीछे कोई और वजह छिपी है. इन सवालों का जवाब मौसम के विज्ञान में छिपा है.
सिर्फ 0 डिग्री होना काफी नहीं
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक बर्फबारी के लिए सिर्फ जमीन का तापमान 0 डिग्री होना काफी नहीं होता. बर्फ बनने की असली प्रक्रिया आसमान में बादलों के अंदर होती है. वहां का तापमान अगर माइनस में न हो, तो बर्फ के कण नहीं बन पाते. गुरुग्राम में ठंड ज्यादातर जमीन तक सीमित रहती है, जबकि ऊपर की हवा उतनी ठंडी नहीं हो पाती.
बादलों में बर्फ नहीं बन पाती
बर्फबारी तब होती है जब बादलों में मौजूद पानी की बूंदें जमकर बर्फ के क्रिस्टल बन जाएं. गुरुग्राम के ऊपर बनने वाले बादल आमतौर पर इतने ठंडे नहीं होते. इसी वजह से बारिश या बर्फ की जगह सिर्फ कोहरा देखने को मिलता है.

हवा में नमी की कमी
बर्फबारी के लिए हवा में पर्याप्त नमी होना बेहद जरूरी है. पहाड़ी इलाकों में नमी ज्यादा होती है, जिससे बर्फ आसानी से बन जाती है. वहीं गुरुग्राम जैसे मैदानी इलाकों में सर्दियों के दौरान हवा काफी सूखी रहती है. नमी कम होने की वजह से बर्फ के लिए जरूरी हालात नहीं बन पाते.
मैदानी इलाका होना बड़ी वजह
गुरुग्राम समुद्र तल से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित नहीं है. पहाड़ों में ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान तेजी से गिरता है, जो बर्फबारी के लिए अनुकूल होता है. मैदानी इलाकों में ऐसा नहीं हो पाता, इसलिए यहां बर्फ गिरना मुश्किल हो जाता है.
कमजोर वेस्टर्न डिस्टर्बेंस
उत्तर भारत में सर्दियों की बारिश और बर्फबारी का बड़ा कारण वेस्टर्न डिस्टर्बेंस होता है. गुरुग्राम तक पहुंचते-पहुंचते ये सिस्टम अक्सर कमजोर पड़ जाता है. इसका असर सिर्फ ठंडी हवाओं और कोहरे तक ही सीमित रह जाता है.
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