लेबनान का वो इलाका, जिसे दुनिया 'ब्लू लाइन' कहती है. जहां इजरायल और हिजबुल्ला के बीच जंग जारी है. इस मोर्चे पर करीब 50 सालों से संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना (UNIFIL) डटी हुई थी. इस जांबाज सेना में हमारे भारत के भी 641 जवान शामिल हैं. लेकिन अब खबर आ रही है कि इस साल के अंत तक ये शांति सैनिक लेबनान से विदा ले लेंगे. इटली के मेजर जनरल डियोडाटो अबग्नारा ने इस पर मुहर लगा दी है. पर सवाल यह है कि आखिर हमारे सैनिक वहां करने क्या गए थे? आइए सरल भाषा में समझते हैं.
लेबनान में क्या कर रहे हैं भारतीय सैनिक?
हमारे ये जवान वहां किसी से बंदूक लड़ाने या जंग जीतने नहीं गए थे. वे वहां संयुक्त राष्ट्र की ओर से 'शांति के मसीहा' बनकर गए थे. जब 1978 में इजरायल ने लेबनान पर हमला किया, तब वहां अमन बहाली के लिए इस खास फोर्स का गठन हुआ. भारत हमेशा से वसुधैव कुटुंबकम की राह पर चला है. यही वजह है कि यूएन की इस पीस कीपिंग फोर्स में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में भारत का नाम सबसे ऊपर आता है. लेकिन इस कूटनीतिक कद की हमने भारी कीमत भी चुकाई है. दुनिया में शांति स्थापित करने की कोशिश में सबसे ज्यादा जान गंवाने वाले सैनिक (तकरीबन 179 जवान) भी हमारे ही रहे हैं.
वहां हमारे जवानों का काम केवल सीमा पर नजर रखना नहीं था, बल्कि जब जंग की मार से लोग बेघर हो रहे थे, तब उनके जख्मों पर मरहम लगाना, उन तक खाना-दवाई पहुंचाना और एक ढाल बनकर खड़े रहना था.
यूएन शांति सेना क्या होती है?
संयुक्त राष्ट्र शांति सेना (UN Peacekeeping) दुनिया में अमन-चैन कायम रखने का सबसे बड़ा जरिया है. ये शांतिदूत सिर्फ बंदूकें नहीं थामते, बल्कि वहां चुनाव कराने, बारूदी सुरंगें हटाने और इंसानी अधिकारों की रक्षा करने में भी मदद करते हैं. अब आप सोच रहे होंगे कि जब दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्ला के ठिकानों पर इजरायल ताबड़तोड़ हमले कर रहा है, तो इन सैनिकों की सुरक्षा का क्या? इन हमलों पर भारत सरकार ने भी इस पर गहरी चिंता जताई है और भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे वॉर क्राइम माना था.
इजरायल की जीत कैसे?
फिर इस वापसी को इजरायल की जीत क्यों कहा जा रहा है? दरअसल, इजरायल लगातार यह चाहता था कि यह इलाका खाली हो, ताकि वह हिजबुल्ला के खिलाफ बिना किसी रुकावट के खुलकर एक्शन ले सके. शांति सेना का पीछे हटना इजरायल के लिए उस मोर्चे को पूरी तरह साफ करने जैसा है. अबग्नारा ने खुद यह माना है कि UNIFIL की कुछ चौकियों को लेबनानी सेना के हवाले करना बेहद मुश्किल काम होने वाला है. आखिर ऐसा क्यों है? इनमें से आधी से ज्यादा चौकियां अब उस इलाके में आ चुकी हैं, जहां सीधे तौर पर इजरायली फौज का कब्जा हो चुका है.
अब डर यह है कि अगर UNIFIL वहां से हटती है, तो दक्षिणी लेबनान में संयुक्त राष्ट्र की जो 'तीसरी आंख' है, यानी जो निगरानी और रखवाली का काम है, वह हमेशा के लिए बंद हो जाएगा.
आपको बता दें, भारत केवल लेबनान ही नहीं, बल्कि सूडान, कांगो, गोलन हाइट्स और साइप्रस समेत दुनिया के 9 अशांत देशों में करीब 5500 भारतीय सैनिक तैनात हैं. भारत आज भी कूटनीति की मेज पर खड़ा होकर युद्ध के बीच मानवीय मदद की बात कर रहा है और ईरान तक राहत सामग्री पहुंचा रहा है.
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