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दुनिया भर में संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन क्यों पड़ रहे कमजोर? ये 8 बड़ी वजह हैं अहम

संयुक्त राष्ट्र का शांति मिशन अब दुनिया के कई संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं. UN सुरक्षा परिषद में अब सहमति बनाना मुश्किल होता जा रहा है. अमेरिका, चीन और रूस जैसे स्थायी सदस्य कई मुद्दों पर आमने-सामने हैं. वीटो का इस्तेमाल भी बढ़ गया है.

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शांति सेना में अब सैनिकों की संख्या घट रही है

दुनिया में उभर रही नई विश्व व्यवस्था का सबसे अधिक असर उन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर पड़ा है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया को युद्धों से बचाने और शांति की दिशा में आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गई थीं. संयुक्त राष्ट्र ऐसी ही एक संस्था है, जिसके शांति मिशन दुनिया के कई संघर्षग्रस्त इलाकों में लगातार कमजोर पड़ रहे हैं. शांति सेना में अब सैनिकों की संख्या घट रही है, फंड की कमी बढ़ रही है और बड़ी ताकतों के बीच टकराव फैसलों को प्रभावित कर रहा है.

  1. नई रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में UN शांति मिशनों में तैनात सैनिकों की संख्या घटकर 78,633 रह गई है. यह 2024 के मुकाबले 17 फीसदी कम है, जबकि 2016 के मुकाबले इसमें करीब 49 फीसदी की गिरावट आई है. यह जानकारी स्वीडन के रिसर्च संस्थान स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ने दी है. SIPRI दुनिया में संघर्ष, हथियार और शांति अभियानों पर रिसर्च करता है.

  2. सबसे बड़ी समस्या पैसों की है. जुलाई 2025 तक UN शांति मिशनों पर 2 अरब डॉलर से ज्यादा की फंडिंग कम हो चुकी थी. यह कुल बजट का करीब 35 फीसदी हिस्सा है. कई बड़े देशों ने समय पर पैसा नहीं दिया. कुछ देशों ने पूरा योगदान भी नहीं दिया. इस वजह से कई मिशनों में सैनिकों और संसाधनों में कटौती करनी पड़ी.

  3. अमेरिका लंबे समय से UN शांति अभियानों को सबसे ज्यादा पैसा देता रहा है. लेकिन अब अमेरिका खुद खर्च कम करने के दबाव में है. इसके साथ ही वह कई मिशनों पर सख्त रुख भी अपना रहा है. उदाहरण के तौर पर देखे तो अमेरिका ने लेबनान में तैनात युनाइटेड नेशन्स अस्थायी फोर्स को बंद करने की मांग भी उठाई थी. यह मिशन 1978 से लेबनान में तैनात है. हालांकि, बाद में समझौता हुआ और मिशन को दिसंबर 2026 तक बढ़ा दिया गया.

  4. UN सुरक्षा परिषद में अब सहमति बनाना मुश्किल होता जा रहा है. अमेरिका, चीन और रूस जैसे स्थायी सदस्य कई मुद्दों पर आमने-सामने हैं. वीटो का इस्तेमाल भी बढ़ गया है. इसका असर शांति मिशनों पर पड़ रहा है. कई बार मिशन बढ़ाने या नया मिशन शुरू करने का फैसला अटक जाता है.

  5. हैती में गैंग वॉर और हिंसा तेजी से बढ़ी है. राजधानी पोर्ट-ओ-प्रिंस के कई हिस्सों में सरकार का नियंत्रण कमजोर पड़ गया है. वहीं, यूक्रेन और सूडान जैसे देशों में बड़े संघर्षों में भी प्रभावी यूएन शांति मिशन नहीं दिखे. रिपोर्ट कहती है कि क्षेत्रीय संगठन भी इस कमी को पूरा नहीं कर पा रहे हैं.

  6. अफ्रीकन यूनियन, इकनोमिक कम्युनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीका स्टेटस और ऑर्गेनाइजेशन फॉर सिक्युरिटी एंड कॉपरेशन इन यूरोपजैसे संगठन कुछ जगहों पर सक्रिय हैं. लेकिन इन्हें भी पैसों की कमी और राजनीतिक मतभेदों का सामना करना पड़ रहा है. इस वजह से बड़े संकटों में असरदार कार्रवाई मुश्किल हो रही है.

  7. भारत लंबे समय से UN शांति अभियानों में बड़ी भूमिका निभाता रहा है. 2025 में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में भारत भी शामिल है. युगांडा पहले स्थान पर रहा. इसके बाद नेपाल, बांग्लादेश और भारत का नंबर आया. 1950 के दशक से अब तक भारत के 2.75 लाख से ज्यादा सैनिक और पुलिसकर्मी यूएन मिशनों में सेवा दे चुके हैं.

  8. रिपोर्ट के मुताबिक अगर यही स्थिति जारी रही तो दुनिया में संघर्ष रोकने की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और कमजोर हो सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़ी ताकतों के बीच भरोसे की कमी बढ़ रही है. और यही यूएन शांति अभियानों के भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है.


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