- पंजाब में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के संभावित गठबंधन को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है
- बीजेपी के आंतरिक सर्वे में यह पाया गया है कि दोनों दल मिलकर 80 से अधिक सीटें जीत सकते हैं
- गठबंधन में देरी को लेकर पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं और समय रहते घोषणा की मांग है
पंजाब में बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल के संभावित गठबंधन को लेकर अभी तक तस्वीर साफ नहीं हो सकी है. इस बीच, बीजेपी का अपना आकलन है कि अगर दोनों दल एक साथ आते हैं तो राज्य में सरकार बना सकते हैं. सूत्रों के अनुसार, बीजेपी के आंतरिक सर्वे में यह बात सामने आई है कि बीजेपी और अकाली दल अगर मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो राज्य की 117 में से 80 से अधिक सीटें जीत सकते हैं.
सूत्रों के अनुसार, इस गठबंधन की घोषणा में देरी को लेकर भी अब पार्टी के भीतर से सवाल उठ रहे हैं. कई नेताओं का मानना है कि गठबंधन की घोषणा में देरी नहीं होनी चाहिए, ताकि जमीन पर कार्यकर्ताओं को इसके लिए तैयार किया जा सके. साथ ही, सीटों के बंटवारे के बाद प्राथमिकता के अनुसार अपने-अपने हिस्से की सीटों पर तैयारी भी शुरू की जा सके. वैसे तो आधिकारिक तौर पर बीजेपी सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की बात कह रही है, लेकिन अंदरखाते इस दावे को अधिकतम सीटों पर दावेदारी की तौर पर देखा जा रहा है.
बीजेपी के कुछ नेताओं का मानना है कि अब अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी करने का समय नहीं बचा है. ऐसे में अकाली दल और कुछ अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ना ही बेहतर होगा अन्यथा अलग लड़ने से आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को फायदा मिल सकता है. वे कहते हैं कि पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनाव के परिणाम इस बात की गवाही देते हैं कि बीजेपी और अकाली दल अपने-अपने इलाकों में मजबूत हैं और अगर वे साथ आते हैं तो पहले की तरह फिर सरकार बना सकते हैं.
किस आधार पर बन रहा मूड
बीजेपी नेताओं के मुताबिक पिछले लोकसभा चुनाव में अकाली दल को करीब 18 लाख यानी 13.42 प्रतिशत वोट मिले. वहीं बीजेपी को 25 लाख यानी 18.56 प्रतिशत वोट मिले. अगर दोनों पार्टियों के वोटों को मिला दिया जाए तो यह आंकड़ा 43 लाख तक पहुंचता है. वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो तब अकाली दल को 28.61 लाख यानी 18.38 प्रतिशत वोट मिले थे. इसमें बीएसपी के वोट नहीं जोड़े गए, जिसके साथ अकाली दल ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था. जबकि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को 12 लाख यानी 8 प्रतिशत वोट मिले थे. यानी पिछले विधानसभा चुनाव में अकाली और बीजेपी को वोट मिला दें तब भी यह आंकड़ा करीब 41 लाख तक पहुंचता है.
हालांकि सूत्रों के अनुसार, अभी तीन मुद्दों पर गठबंधन की बातचीत अटकी हुई है. यह तीन प्रमुख मुद्दे हैं - सीटों की संख्या, सीटों की पहचान और मुख्यमंत्री-उपमुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार. सूत्रों के मुताबिक, यह तय है कि बीजेपी पहले की तरह गठबंधन में 25 से कम सीटों पर नहीं लड़ेगी. गौरतलब है कि बीजेपी ने अकाली दल के साथ गठबंधन में अभी तक जो विधानसभा चुनाव लड़े, उनमें बीजेपी जूनियर पार्टनर रही. बीजेपी इस गठबंधन में 117 में से केवल 23 सीटों पर ही लड़ती आई है. पिछले लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन के आधार पर बीजेपी इस बार अधिक सीटों का दावा कर रही है.
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 18.56 प्रतिशत वोट मिले थे. बीजेपी को 23 विधानसभा सीटों पर बढ़त थी. छह सीटों पर वह दूसरे और 16 सीटों पर तीसरे नंबर पर आई थी. इस तरह 45 विधानसभा सीटों पर वह अकाली दल से आगे रही.
वहीं अकाली दल को 13.42 प्रतिशत वोट मिले थे और उसे एक सीट पर जीत मिली थी. अकाली दल नौ विधानसभा सीटों पर पहले नंबर पर, पांच पर दूसरे और पांच पर ही तीसरे नंबर पर रहा था. इस तरह दोनों दलों के मिला कर करीब 32 प्रतिशत वोट मिले और 64 सीटों पर उपस्थिति दर्ज कराई. बीजेपी का आकलन है कि अगर दोनों दल साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़े होते तो यह गठबंधन 57 विधानसभा सीटों पर बढ़त ले सकता था, जो बहुमत के आंकड़े से केवल दो कम है. यानी दोनों दलों के साथ आने पर उन्हें फ़्लोटिंग वोट भी मिल सकता है. इसी आधार पर कुछ अतिरिक्त वोट जुड़ने पर यह गठबंधन सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को कड़ी टक्कर दे सकता है, जो बीजेपी नेताओं के अनुसार सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है.
दोनों अलग लड़कर जान चुके हैं अपनी ताकत
गौरतलब है कि दोनों दलों के बीच 1996 से 2020 तक गठबंधन रहा. 1997 में इस गठबंधन को प्रचंड विजय मिली थी. तब अकाली दल ने 75 और बीजेपी ने 18 सीटें जीती थीं. 2007 में भी इस गठबंधन को जीत मिली थी. तब अकाली दल ने 49 और बीजेपी ने 19 सीटें जीती थीं. 2012 में लगातार दूसरी बार जीत हासिल कर इतिहास रचा था. तब अकाली दल ने 56 और बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसे में यह गठबंधन एक बार फिर कागज पर मजबूत दिखाई दे रहा है. सूत्रों के अनुसार, दोनों दलों में इसी जमीनी हकीकत को सामने रख साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर चर्चा हो रही है. दरअसल, दोनों दल अकेले लड़कर देख चुके हैं कि वे चुनावी सफलता हासिल नहीं कर पा रहे.
एक पेंच यह भी है कि किस सीट पर किस दल का उम्मीदवार होगा? अमूमन बीजेपी शहरी और अकाली दल ग्रामीण क्षेत्रों में चुनाव लड़ता आया है. इस बार अकाली दल सेमी अर्बन सीटों पर भी चुनाव लड़ने की योजना बना रहा है, जहां बीजेपी मजबूत मानी जाती है. ऐसे में दोनों दलों को इन सीटों को लेकर भी सहमति बनानी होगी. जहां तक मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव मैदान में उतरने का मुद्दा है, इसे लेकर बीजेपी बहुत अधिक उत्साहित नहीं दिख रही. अकाली दल चाहेगी कि पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल गठबंधन के सीएम उम्मीदवार हों. लेकिन बीजेपी के कुछ नेताओं को लगता है कि इसमें उनकी छवि आड़े आ सकती है.
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