साल 1975 की एक शांत सुबह. उत्तराखंड के पिथौरागढ़ का एक छोटा सा पहाड़ी गांव- बडालू. अचानक सायरन बजाती, धूल उड़ाती सरकारी गाड़ियों का एक लंबा काफिला गांव में दाखिल होता है. जिला प्रशासन के बड़े अफसर, पुलिस और सेना के जवान सीधे गांव की तंग गलियों से होते हुए आगे बढ़ रहे थे. पूरे गांव में सन्नाटा खिंच गया. लोगों के जेहन में सिर्फ एक ही सवाल कौंध रहा था- आखिर माजरा क्या है? लेकिन ये गाड़ियां जाकर रुकीं गांव के एक बेहद सीधे-साधे और बुजुर्ग रिटायर्ड फौजी गजेंद्र सिंह चंद के घर के बाहर. जिन्हें गांव में कोई 'ताऊ' कहता, तो कोई 'चाचा' या 'बड़े भाई' कहकर पुकारता था. तभी दोपहर के वक्त एक और गाड़ी गांव में आकर रुकती है. गाड़ी का दरवाजा खुलता है और उसमें से निकलते हैं दो विदेशी अधिकारी. वे सीधे गजेंद्र सिंह के पास पहुंचते हैं, तनकर खड़े होते हैं और पूरे फौजी अदब के साथ उन्हें जोरदार सैल्यूट ठोकते हैं. फिर गर्मजोशी से हाथ मिलाते हैं.
रूसी अफसरों ने बुजुर्ग को किया सैल्यूट, पूरा गांव हैरान
यह नजारा देखकर गांव वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं. जिस शख्स को लोग सिर्फ एक आम रिटायर्ड फौजी समझते थे, उसे हजारों किलोमीटर दूर मॉस्को से आए सोवियत यूनियन के अफसर इतना बड़ा सम्मान क्यों दे रहे थे? आखिर कौन थे ये गजेंद्र सिंह चंद? ऐसा क्या कर दिखाया था इन्होंने कि दूसरा विश्व युद्ध खत्म होने के 30 साल बाद भी सोवियत संघ इस वीर को नहीं भूला था? आइए, रुख करते हैं इतिहास के उस अनसुने पन्ने की तरफ.
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हिटलर के खौफ में पूरा यूरोप
कहानी का रुख मुड़ता है साल 1939 की तरफ. यूरोप में एडोल्फ हिटलर का खौफ सिर चढ़कर बोल रहा था. 1 सितंबर 1939 को जब जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया, तो पूरी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध की आग में झुलस गई. भारत उस वक्त अंग्रेजों का गुलाम था, इसलिए न चाहते हुए भी लाखों हिंदुस्तानी सैनिकों को जंग के तपते मोर्चों पर झोंक दिया गया. इन्हीं जांबाज सिपाहियों में शामिल थे उत्तराखंड के गजेंद्र सिंह चंद.
पिथौरागढ़ के बडालू गांव की पथरीली जमीन और कठिन जिंदगी ने गजेंद्र सिंह को बचपन से ही चुनौतियों से लड़ना और सीना तानकर खड़े रहना सिखा दिया था. 1936 में वे ब्रिटिश भारतीय सेना की रॉयल इंडियन आर्मी सर्विस कोर (RIASC) में भर्ती हुए. लेकिन जंग के मैदान में उन्हें सिर्फ बंदूक लेकर गोली चलाना नहीं था, बल्कि उन्हें सौंपी गई थी एक ऐसी जिम्मेदारी, जिस पर लाखों सैनिकों की जिंदगी टिकी थी. काम था- मौत के मुंह से गुजरते हुए, दुश्मन की भीषण बमबारी के बीच सोवियत सेना तक हथियारों और रसद की सप्लाई लाइन को जिंदा रखना. अगर एक भी खेप रुक जाती, तो पूरी की पूरी सेना तबाह हो सकती थी.
माइनस 20 डिग्री, बर्फीले पहाड़ और मौत का पहरा
1 मई 1943 की खौफनाक रात. मशहूर रूसी लेखक लियोनिद मित्रोखिन के मुताबिक, हवलदार गजेंद्र सिंह चंद के नेतृत्व में हथियारों और गोला-बारूद से लदे ट्रकों का काफिला एक बेहद खतरनाक मिशन पर निकला.
रास्ता ऐसा कि रूह कांप जाए. एक तरफ सिर उठाए खड़े बर्फीले पहाड़, दूसरी तरफ हजारों फीट गहरी खाई, कड़ाके की ठंड जिसमें पारा शून्य से 20 डिग्री नीचे (-20°C) पहुंच चुका था, और ऊपर से दुश्मन की नजरों से बचने के लिए ट्रकों की हेडलाइट्स पूरी तरह बंद. घुप अंधेरे में गजेंद्र सिंह सबसे आगे वाले ट्रक की स्टेयरिंग थामे मौत के रास्तों को नाप रहे थे.
सफर शुरू ही हुआ था कि आसमान से जर्मन लड़ाकू विमानों ने मौत बरसाना शुरू कर दिया. चारों तरफ गोलियों की तड़तड़ाहट और बमों के धमाके. लेकिन गजेंद्र सिंह के कदम नहीं डगमगाए. दिन में ट्रकों को विशाल चट्टानों की आड़ में छिपाते और रात के अंधेरे में फिर मौत को चकमा देकर आगे बढ़ निकलते.
काफिला सही-सलामत सोवियत मोर्चे तक पहुंच गया. लेकिन असली इम्तिहान अभी बाकी था. जैसे ही ट्रकों से बारूद उतारा जा रहा था, जर्मन सैनिकों ने अचानक धावा बोल दिया. अफरातफरी के बीच एक जर्मन फौजी ने गजेंद्र सिंह पर संगीन (बेयोनेट) से जानलेवा हमला कर दिया. संगीन आर-पार हो गई. गजेंद्र सिंह खून से लथपथ होकर गिर पड़े.
साथियों ने किसी तरह दुश्मन को खदेड़ा और गंभीर रूप से घायल गजेंद्र सिंह को अस्पताल पहुंचाया. मौत को मात देकर जब वे होश में आए, तो डॉक्टरों ने उन्हें आराम के लिए भारत लौटने की सलाह दी. लेकिन इस फौलादी जिगर वाले वीर का जवाब रोंगटे खड़े कर देने वाला था. उन्होंने दो टूक कहा- "जब तक मेरे साथी मोर्चे पर लड़ रहे हैं, मैं पीठ दिखाकर घर नहीं जाऊंगा. ठीक होते ही मुझे वापस उसी मोर्चे पर भेजा जाए."
इस अदम्य साहस, जांबाजी और फौलादी हौसले के आगे सोवियत संघ नतमस्तक हो गया. रूस ने उन्हें अपने सर्वोच्च और प्रतिष्ठित सैन्य सम्मान 'ऑर्डर ऑफ द रेड स्टार' (Order of the Red Star) से नवाजा.
30 साल बाद मॉस्को से बुलावा
साल 1945 में महायुद्ध थमा. 1960 में गजेंद्र सिंह नायब सूबेदार के पद से रिटायर होकर अपने गांव बडालू लौट आए. एक साधारण किसान की तरह खेती-बाड़ी करने लगे. हैरत की बात यह थी कि इतना बड़ा सम्मान पाने के बावजूद उन्होंने कभी अपने गांव तो क्या, अपने परिवार तक के सामने इसका ढोल नहीं पीटा. उनकी बहादुरी गांव की खामोश वादियों में दफन होकर रह गई.
लेकिन कहते हैं ना, शोहरत भले ही खामोश रहे, इतिहास कभी सच को छिपने नहीं देता. 1970 के दशक में जब रूसी शोधकर्ता लियोनिद मित्रोखिन भारत-रूस संबंधों पर काम कर रहे थे, तो पुराने फौजी दस्तावेजों को खंगालते वक्त उनकी नजर इस नाम पर पड़ी. वे दंग रह गए कि जिस जांबाज को रूस का सबसे बड़ा मेडल मिला, वो कहां है? तलाश करते-करते वे पिथौरागढ़ की वादियों में जा पहुंचे.
जब 1975 में मॉस्को से आए प्रतिनिधियों ने बडालू गांव पहुंचकर उन्हें नाजियों पर जीत की 30वीं वर्षगांठ पर विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया, तब जाकर दुनिया को पता चला कि उनके बीच खाट पर बैठा साधारण सा दिखने वाला बुजुर्ग दरअसल अंतरराष्ट्रीय स्तर का महानायक है.
आज गजेंद्र सिंह चंद हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वीरता की दास्तान भारत और रूस के रिश्तों की वो अनमोल विरासत है, जो हमें सिखाती है कि असली वीर कभी अपनी गाथाओं का ढोल नहीं पीटते, उनका काम ही उनका इतिहास लिख देता है.
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