World Heritage Site 2026 : भारत ने अपने नाम एक और उपलब्धि हासिल कर ली है. भारत की एक और सांस्कृतिक विरासत को ग्लोबल पहचान मिली है. उत्तर प्रदेश की काशी नगरी यानी वाराणसी स्थित 2500 साल पुराने बौद्ध स्थल सारनाथ (Sarnath) को यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर लिस्ट (World Heritage List) में शामिल किया गया है. इसके साथ ही भारत में विश्व धरोहरों की संख्या बढ़कर 45 हो गई है.
सारनाथ में कौन-कौन से संरचनाएं मौजूद हैं
इस विश्व धरोहर संपत्ति में चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं. इनमें धमेख स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंध कुटी विहार, अशोक स्तंभ समेत कई ऐतिहासिक संरचनाएं मौजूद हैं.
सारनाथ को इस नाम से भी जाना जाता है
बौद्ध परंपरा में सारनाथ को ऋषिपत्तन, इशिपत्तन और मृगदाव जैसे नामों से भी जाना जाता है.
बुद्ध ने पहला उदेश क्या दिया था?
मान्यता प्राप्त यह स्थल वही स्थान है जहां छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश "धर्मचक्र प्रवर्तन" दिया था. इसी घटना को बौद्ध संघ की स्थापना और अष्टांगिक मार्ग के सिद्धांतों की शुरुआत माना जाता है.
भारत अब 45 विश्व धरोहर स्थलों के साथ दुनिया में छठे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर पहुंच गया है. विदित हो कि साल 2025 में "मराठा मिलिट्री लैंडस्केप्स ऑफ इंडिया" को भी वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया गया था.
“Ancient Buddhist Site, Sarnath, Varanasi” becomes India's 45th @UNESCO #WorldHeritage site at #48WHC and now inscribed on the @UNESCO #WorldHeritage List, marking India's 45th World Heritage property!
— India at UNESCO (@IndiaatUNESCO) July 25, 2026
Amb/PR of India to UNESCO, Shri Vishal V Sharma while thanking the World… pic.twitter.com/JDcqKksQq9
बता दें यह फैसला दक्षिण कोरिया के बुसान (Busan) में आयोजित वर्ल्ड हेरिटेज कमिटी (World Heritage Committee) के 48वें सेशन में लिया गया. संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, यह अचीवमेंट भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, स्थापत्य कला और ऐतिहासिक निरंतरता को वैश्विक मान्यता देने के दिशा में बड़ा कदम है.
ऑफिशियल जानकारी के अनुसार, सारनाथ को पहली बार साल 1998 में यूनेस्को की टेंटेटिव (Tentative) लिस्ट में शामिल किया गया था. इसके बाद जनवरी 2025 में वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल करने का प्रपोजल भेजा गया. लगभग 18 महीने तक चली रिव्यू प्रोसेस, एक्सपर्ट्स की मीटिंग और इवैल्यूएशन के बाद 25 जुलाई 2026 को समिति ने इसे विश्व धरोहर घोषित करने का फैसला लिया.
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