What is Anti-Defection Law : राज्यसभा चुनाव का नाम आते ही सबसे पहले जेहन में एक ही शब्द आता है 'क्रॉस वोटिंग'. अक्सर हम देखते हैं कि किसी पार्टी के विधायक अपनी ही पार्टी के कैंडिडेट को वोट न देकर दूसरी पार्टी को वोट दे देते हैं. इसे ही राजनीति में 'बगावत' या 'अंतरात्मा की आवाज' कहा जाता है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन बागियों का बाद में क्या होता है? क्या इन पर Anti-Defection Law (दल-बदल कानून) लागू होता है? आइए इसे आगे आर्टिकल में आसान भाषा में समझते हैं.
क्या होती है क्रॉस वोटिंग?
सरल शब्दों में कहें तो जब कोई विधायक या सांसद अपनी पार्टी के उम्मीदवार को वोट न देकर विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार को वोट दे देता है, तो इसे क्रॉस वोटिंग कहा जाता है. दुनिया भर के लोकतंत्र में ऐसा होता है, लेकिन भारत में राज्यसभा चुनावों के दौरान यह पार्टियों के लिए सिरदर्द बन जाता है.
क्या दलबदल कानून (Anti-Defection Law) लागू होगा?
आम तौर पर अगर कोई विधायक विधानसभा में पार्टी के आदेश (व्हिप) के खिलाफ वोट करता है, तो उसकी सदस्यता जा सकती है. लेकिन राज्यसभा चुनाव का मामला थोड़ा पेचीदा है.
संविधान का नियम
राज्यसभा चुनावों में 'दलबदल कानून' यानी 10वीं अनुसूची लागू नहीं होती है.
व्हिप का असरपार्टियां अपने विधायकों को व्हिप तो जारी करती हैं, लेकिन चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के मुताबिक, राज्यसभा चुनाव में व्हिप का उल्लंघन करने पर विधायक को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता.
खुली वोटिंगराज्यसभा में विधायक को अपना वोट अपनी पार्टी के एथोराइज्ड एजेंट को दिखाना पड़ता है. अगर वह किसी और को वोट देता है, तो पार्टी को तुरंत पता चल जाता है, लेकिन इससे उसकी सीट नहीं छिनती.
फिर बागी विधायकों का क्या होगा?भले ही संविधान उनकी विधायकी न छीन सके, लेकिन उनकी अपनी पार्टी उनके खिलाफ सख्त कदम उठा सकती है-
पार्टी से हो सकते हैं निलंबितपार्टी नेतृत्व ऐसे विधायकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर सकता है. अगर जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो उन्हें पार्टी से निलंबित या बर्खास्त किया जा सकता है.
पदों से हाथ धोनासांगठनिक पदों से हटा दिया जा सकता है
पार्टी से कट सकता है टिकटऐसे विधायकों को अगली बार पार्टी से टिकट मिलना नामुमकिन हो जाता है.
बागी विधायकों का क्या होता है?कुल मिलाकर राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करने वाले विधायकों की कुर्सी सुरक्षित रहती है, लेकिन उनकी राजनीतिक साख दांव पर लग जाती है. पार्टियां उन्हें बाहर का रास्ता तो दिखा सकती हैं, पर विधानसभा से बेदखल नहीं कर सकतीं.
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