साल 1945. दूसरा विश्व युद्ध खत्म हो चुका था. हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरे परमाणु बमों के बाद जापान पूरी तरह तबाह और बर्बाद था. युद्ध जीतने वाले मुल्क (अमेरिका, ब्रिटेन, रूस जैसे मित्र देश) अब जापान के बड़े नेताओं और जनरलों पर मुकदमा चलाने के लिए टोक्यो में जुटे. इसे नाम दिया गया 'टोक्यो ट्रायल्स'. मकसद साफ था, हारे हुए जापान को कठघरे में खड़ा करना और उसके नेताओं को जंग का मुजरिम साबित करना.

अदालत में जब गूंजी एक हिंदुस्तानी जज की आवाज
दुनिया भर के 11 देशों से जज बुलाए गए थे. भारत की तरफ से पहुंचे कलकत्ता हाई कोर्ट के मशहूर जज राधाबिनोद पाल. तकरीबन ढाई साल तक सुनवाई चली. 12 नवंबर 1948 को फैसला सुनाने का दिन आया. एक-एक करके सभी विदेशी जजों ने जापान के नेताओं को मौत की सजा सुनाते हुए कहा, "दोषी (Guilty)"
तभी अदालत के सन्नाटे को चीरती हुई एक भारी आवाज गूंजी "निर्दोष (Not Guilty)". पूरी अदालत सन्न रह गई. यह आवाज थी भारत के जस्टिस राधाबिनोद पाल की. जहां बाकी 10 जज एक तरफ थे, वहीं अकेला यह हिंदुस्तानी जज पूरे सिस्टम के खिलाफ सीना तानकर खड़ा हो गया था.

"यह न्याय नहीं, बदले की भावना है"
जस्टिस पाल ने साफ कहा कि जीतने वाले देश न्याय नहीं कर रहे, बल्कि अपनी जीत का बदला ले रहे हैं. उनका तर्क बिल्कुल सीधा था, अगर जापान ने एशिया में कब्जा किया, तो उसने वही सीखा जो सदियों से पश्चिमी मुल्क (अंग्रेज, डच, फ्रेंच) करते आ रहे थे.
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अगर जंग अपराध है, तो अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराए गए परमाणु बम क्या थे? क्या वो मानवता के खिलाफ अपराध नहीं थे? जस्टिस पाल जापान के जुल्मों से आंखें नहीं मूंद रहे थे, लेकिन उनका कहना था कि जब नियम सबके लिए बराबर नहीं हैं, तो यह इंसाफ नहीं बल्कि 'विजेताओं का घमंड' है.

जापान ने क्यों बनाया मंदिर?
इस एक ऐतिहासिक फैसले ने टूट चुके जापानियों के आत्मसम्मान को नई जिंदगी दे दी. जापान को लगा कि पूरी दुनिया के सामने अकेला एक हिंदुस्तानी था, जिसने सच बोलने की हिम्मत दिखाई. जापान के टोक्यो स्थित प्रसिद्ध यासुकोनी मंदिर (Yasukuni Shrine) में जस्टिस राधाबिनोद पाल का भव्य स्मारक और प्रतिमा बनाई गई है, जहां लोग उन्हें देवता की तरह नमन करते हैं.
1966 में जापान के सम्राट ने उन्हें अपने देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया. जब भी कोई जापानी प्रधानमंत्री (चाहे शिंजो आबे हों या जुनिचिरो कोइज़ुमी) भारत आए, उन्होंने जस्टिस पाल के योगदान को सिर झुकाकर याद किया. शिंजो आबे तो कोलकाता जाकर उनके बेटे से भी मिले थे.
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भारत ने भुला दिया ये हीरो
जिस शख्स को जापान आज भी भगवान का दर्जा देता है, अपने ही देश में उनकी कहानी वक्त की धूल में कहीं दब गई. भारतीय जज को याद करते हुए इरफान खान अभिनीत 'टोक्यो ट्रायल' नाम की मूवी में काम कर चुके हैं. इरफान ने इसमें जज राधाबिनोद का किरदार निभाया है.
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