"वो हमारी मां हैं... वे शायद हमारे बिना रह सकती हैं, लेकिन हम अपनी मां के बिना एक पल भी नहीं रह सकते. माता-पिता के बीच झगड़ा है, इसमें हमारा क्या दोष है?"
यह दर्द भरी पुकार उन दो मासूम भाई-बहनों की है, जिनकी उम्र महज 14 और 12 साल है. खेलने-कूदने और पढ़ाई करने की उम्र में ये बच्चे अपने बिखरे हुए परिवार को समेटने के लिए अदालत की चौखट पर पहुंच गए हैं. ये मामला मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के आमला का है. जहां माता-पिता के आपसी विवाद के बीच बच्चों ने अपने सुरक्षित भविष्य और मां-बाप के प्यार के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में गुहार लगाई है.
दो साल से चल रहा है मां-बाप के बीच विवाद
जानकारी के मुताबिक, बच्चों के माता-पिता के बीच पिछले करीब दो वर्षों से अनबन चल रही है. दोनों का विवाद इतना बढ़ गया कि मामला अदालत की चौखट तक पहुंच गया. इस मामले में मां ने अलग होकर तलाक की याचिका दाखिल कर दी है तो वहीं वहीं, पिता ने पत्नी को साथ रखने के लिए अदालत में याचिका लगाई हुई है.दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर अलग-अलग तरीके के आरोप लगा रहे हैं, जिनकी सुनवाई अदालत में जारी है. लेकिन माता-पिता की इस खींचतान में नुकसान उन दो बच्चों का हो रहा है, जिनका बचपन इस कलह की भेंट चढ़ रहा है.
पिता कर रहे मजदूरी, पंचायत सचिव के साथ रह रही है मां
मिली जानकारी के अनुसार, बच्चों का पिता आमला ब्लॉक का ही रहने वाला है. पहले वह पेशे से ड्राइवर था, लेकिन अब मजदूरी करके किसी तरह अपने दोनों बच्चों की परवरिश कर रहा है. दोनों मासूम इस वक्त अपने पिता के साथ ही रह रहे हैं. वहीं, बच्चों की मां उन्हें और पिता को छोड़कर छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव ब्लॉक के एक पंचायत सचिव के साथ लिव-इन में रह रही है. बच्चों की अदालत से सबसे बड़ी यही गुहार है कि उनकी मां उस रिश्ते से वापस अपने परिवार और बच्चों के पास लौट आएं ताकि उनका उजड़ता घर फिर से बस सके.
"हमें मां और पिता दोनों का प्यार चाहिए"
बच्चों की तरफ से उनके वकील शिवम उपाध्याय ने आमला की अदालत में अर्जी लगाई है. बच्चों ने बेहद भावुक अंदाज में कहा कि उन्हें अपनी मां और पिता दोनों का प्यार और सहारा चाहिए.बच्चों का कहना है कि उनकी मां उनके साथ आकर रहें और उनके माता-पिता के रिश्ते में किसी तीसरे बाहरी व्यक्ति की दखलअंदाजी न हो. बच्चों की गंभीर स्थिति और संवेदनशीलता को देखते हुए वकील ने अदालत से वॉट्सऐप के जरिए सूचना पत्र भेजने की मांग की थी, जिसे अदालत ने मंजूर कर लिया है.
बच्चों की भलाई सबसे ऊपर: वकील अनिल पाठक और राजेंद्र उपाध्याय
इस पूरे मामले पर वकील अनिल पाठक और वरिष्ठ वकील राजेंद्र उपाध्याय का कहना है कि जब भी बच्चों की देखरेख या उनके साथ रहने का फैसला होता है, तो अदालत के लिए सबसे अहम बात बच्चे की भलाई और उसका भविष्य होती है.कानून के मुताबिक, अगर बच्चे इतने समझदार हैं कि वे अपनी पसंद और जरूरत को समझ सकें, तो अदालत उनकी राय और इच्छा पर गंभीरता से विचार करती है. हालांकि, अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे का भविष्य, पढ़ाई-लिखाई और मानसिक विकास कहां सबसे ज्यादा सुरक्षित है.वकीलों का साफ मानना है कि बड़े लोगों के विवाद की सजा मासूम बच्चों को कभी नहीं मिलनी चाहिए. अगर बच्चे माता-पिता दोनों का साथ चाहते हैं, तो उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए जिससे उनका बचपन और भविष्य बिखरने से बच सके.
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