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पहाड़ी विल्सन: वो 'राजा' जिसने हिमालय 'बेच डाला', उत्तराखंड की इस कहानी के आगे बॉलीवुड मूवी भी फेल

सेना से भागा एक 25 साल का ब्रिटिश सिपाही कैसे हर्षिल का बेताज बादशाह बन बैठा और अपने सिक्के तक चला दिए. पढ़िए देवदार के जंगलों को बेचकर अकूत दौलत कमाने वाले 'पहाड़ी विल्सन' की दास्तान, जिसके पूरे वंश को लील गया एक दैवीय श्राप.

पहाड़ी विल्सन: वो 'राजा' जिसने हिमालय 'बेच डाला', उत्तराखंड की इस कहानी के आगे बॉलीवुड मूवी भी फेल
आखिर कौन था हर्षिल का राजा विल्सन, जिसने उत्तराखंड के जंगल तबाह कर दिए.

बात 19वीं सदी के मध्य की है. ब्रिटिश हुकूमत का दौर था और एक अंग्रेज फ्रेडरिक विल्सन भटकते-भटकते हिमालय की ऊंची वादियों में आ पहुंचा. यहां उसने टिहरी-गढ़वाल के राजा से हाथ मिलाया और एक ऐसा सौदा कर डाला जिसने इस पूरे इलाके की तस्वीर बदल दी. विल्सन ने भागीरथी घाटी के उन दुर्गम जंगलों की लीज हासिल कर ली, जहां सदियों से देवदार और चीड़ के गगनचुंबी पेड़ सीना ताने खड़े थे. जो पेड़ सदियों से कुदरत के पहरेदार बने खड़े थे, वे ताश के पत्तों की तरह गिराए जाने लगे. देखते ही देखते हरे-भरे घने जंगल मैदान बनते चले गए. आगे चलकर इलाके का इतिहास बदल दिया. अब सवाल उठता है कि ये फ्रेडरिक विल्सन आखिर था कौन? 

विल्सन दरअसल ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में एक सिपाही बनकर भारत आया था. पहले एंग्लो-अफगान युद्ध के दौरान वह रहस्यमयी हालात में सेना छोड़कर फरार हो गया. किस्से-कहानियां बताते हैं कि भागते-छिपाते वह भागीरथी घाटी के बेहद दूरदराज गांव 'हर्षिल' में जा बसा. यहां उसने पहले शिकार, कस्तूरी और जानवरों की खाल का धंधा शुरू किया और फिर लकड़ियों के बेहिसाब कारोबार के दम पर अथाह दौलत कमाकर खुद को इलाके का अघोषित राजा बना लिया.   

Pahari Wilson The British Army Deserter Who Minted His Own Currency in the Himalayas

मसूरी से भागा 25 साल का भगोड़ा

कहानी शुरू होती है जब फ्रेडरिक ई. विल्सन महज 25 साल का था. वह ब्रिटिश इंडियन आर्मी का सिपाही था, लेकिन मसूरी छावनी से भाग निकला. कहा जाता है कि उसने किसी आपसी झगड़े में अपने ही साथी सैनिक का कत्ल कर दिया था और जान बचाने के लिए उसे भागना पड़ा. उत्तर की तरफ भागते-भागते वह टिहरी गढ़वाल की रियासत में पहुंचा. वहां उसने राजा से काम मांगा. लेकिन टिहरी के राजा अंग्रेजों के वफादार थे. 

उन्हें डर था कि अगर किसी भगोड़े को पनाह दी, तो गोरी हुकूमत नाराज हो जाएगी. राजा ने उसे दुत्कार दिया. अब विल्सन के पास कोई रास्ता नहीं बचा था. वह आगे बढ़ता गया, और घने बीहड़ पहाड़ों को चीरते हुए जा पहुंचा भागीरथी घाटी के 'हर्षिल' में. दुनिया की नजरों से दूर, उसने वहीं अपनी नई जिंदगी शुरू करने की ठानी.

रायमाता, गुलाबी और गोरा बाबू का ठाठ

हर्षिल के करीब मुखवा गांव की एक स्थानीय महिला 'रायमाता' से उसने शादी कर ली. गांव वालों ने भी धीरे-धीरे उसे अपना लिया. गांव के सीधे-साधे लोगों के लिए वह एक रौबदार 'गोरा बाबू' था, जिससे लोग थोड़ा डरते भी थे और खातिरदारी भी पूरी करते थे. बस, मंदिर के पुजारियों को उस पर शक था कि कहीं यह ईसाई मिशनरी बनकर धर्म परिवर्तन न करवाने लगे.

लेकिन विल्सन का मकसद धर्म नहीं, दौलत और हुकूमत थी. जब पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं हुई, तो उसने मुखवा गांव की ही एक और पहाड़ी लड़की 'गुलाबी' से शादी कर ली. गुलाबी से उसके तीन बेटे हुए- नथानिएल (नत्थू), चार्ल्स (चार्ली साहिब) और हेनरी (इंद्री).  

Pahari Wilson The British Army Deserter Who Minted His Own Currency in the Himalayas

विल्सन की दूसरी पत्नी

कस्तूरी मृगों का शिकार और रेलवे ने लगाया 'जैकपॉट'

विल्सन निशानेबाजी में माहिर था. उसने अपने इसी हुनर को कारोबार बना लिया. धीरे-धीरे उसने जंगलों में कत्लेआम मचाना शुरू किया. कस्तूरी मृगों का अंधाधुंध शिकार किया गया और उनकी खाल और कस्तूरी की भारत से बाहर जमकर तस्करी होने लगी.

लेकिन उसकी गिद्ध नजर पड़ी सदियों से खड़े देवदार के विशाल पेड़ों पर. लकड़ी काटने के लिए उसे टिहरी के राजा से लाइसेंस की जरूरत थी, मगर राजा ने पहले इनकार कर दिया. तभी इतिहास ने एक करवट ली. भारत में अंग्रेजों ने रेलवे लाइनें बिछाने का काम तेज कर दिया और पटरियों के नीचे लगने वाले मजबूत लकड़ी के स्लीपरों की भारी मांग पैदा हो गई.

बस, यहीं राजा और विल्सन की लॉटरी लग गई. राजा ने तुरंत लाइसेंस दे दिया. फिर क्या था, दोनों ने उम्मीद से कहीं ज्यादा दौलत बटोरी. विल्सन ने भागीरथी नदी के किनारे बड़ी-बड़ी आरा मशीनें लगाईं और लाखों टन कटी हुई लकड़ियों को नदी के पानी में बहाकर सीधे हरिद्वार पहुंचाना शुरू कर दिया. चिपको आंदोलन के जनक सुंदरलाल बहुगुणा ने बाद में इसी विल्सन को उत्तर भारत के जंगलों के विनाश और दुर्लभ वन्यजीवों के खात्मे का असली गुनहगार माना था. 

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राजा का अहंकार अपनी मुद्रा और सोमेश्वर देवता की तलवारें

अब विल्सन इलाके का बेताज बादशाह बन चुका था. और स्वघोषित राजा बनते ही उसने अपनी रियासत में अपने नाम के सिक्के चलवा दिए, जो आज कलेक्टर्स के लिए बेहद कीमती हैं. उसने हर्षिल में देवदार की लकड़ियों का एक आलीशान महल खड़ा किया.

दौलत और ताकत के नशे में चूर विल्सन का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया. कहा जाता है कि इलाके के पारंपरिक 'सेलकु मेले' के दौरान उसने मुखवा के अधिष्ठाता देवता 'भगवान सोमेश्वर' की शक्ति को खुली चुनौती दे डाली. उसने देवता के पश्वा को अपनी सात नंगी तलवारों की धार पर चलने को ललकारा.

देवता को ललकारना और बेजुबान वन्यजीवों व कुदरत का कत्लेआम करना उसे बहुत भारी पड़ा. मान्यता है कि नाराज होकर भगवान सोमेश्वर ने उसे शाप दे दिया, 'तेरी एक पीढ़ी के बाद तेरे कुल का पूरा नामोनिशान मिट जाएगा और दुनिया तुझे भूल जाएगी.'

खत्म हो गया कुनबा

वक्त का पहिया घूमा. अकूत दौलत कमाने के बाद पहाड़ी विल्सन हर्षिल छोड़कर मसूरी जा बसा, ताकि वह अंग्रेज अफसरों और कुलीनों के बीच रह सके. वह पहाड़ों का सबसे बड़ा जमींदार बन चुका था. ए.ओ. ह्यूम और रुडयार्ड किपलिंग जैसी मशहूर हस्तियां उसकी दोस्त थीं. किपलिंग की मशहूर किताब 'द मैन हू वुड बी किंग' विल्सन की ही जिंदगी से प्रेरित मानी जाती है.

साल 1883 में मसूरी में विल्सन की मौत हो गई. लेकिन अपनी मौत से पहले ही उसने अपने तीन में से दो बेटों को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देखा. उसका इकलौता बचा हुआ बेटा गुमनामी के अंधेरे में खो गया. उसका आखिरी ज्ञात वंशज भारतीय वायुसेना में एक अफसर था, जिसकी 1953 में एक प्लेन क्रैश में मौत हो गई.

इसी के साथ पहाड़ी विल्सन का पूरा वंश हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया. लोग कहते हैं कि यह उसी दैवीय शाप का असर था. क्योंकि कुदरत जब हिसाब मांगती है, तो किसी का रसूख और दौलत काम नहीं आती.

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