एक दौर वह भी था जब हमारे देश के दूध उत्पादक किसान पाई-पाई के मोहताज थे. सुबह से शाम तक खटने के बाद भी हाथ में कुछ नहीं आता था. वजह? बिचौलियों का वह खूनी शिकंजा, जो औने-पौने दाम पर दूध खरीदता और बाजार में चांदी काटता. मजबूरी यह थी कि दूध जल्दी खराब होने वाली चीज है, फ्रिज उस जमाने में थे नहीं, तो जो मिला, उसी में फेंकना पड़ा. गुजरात का खेड़ा जिला, जिसे आज हम 'आणंद' के नाम से जानते हैं, वहां का किसान भी इसी दर्द से कराह रहा था. 1945 में जब बॉम्बे मिल्क स्कीम शुरू हुई, तो लगा शायद तकदीर बदलेगी. पर हुआ ठीक उलटा. सरकार ने ठेका दे दिया एक निजी कंपनी पॉलसंस को. मतलब यह कि व्यवस्था बदली, पर किसान का शोषण नहीं बदला.
जब सरदार पटेल ने दिखाया रास्ता
तब खेड़ा के किसान नेता त्रिभुवन दास पटेल ने आवाज उठाई. वह पहुंचे सीधे सरदार वल्लभभाई पटेल के पास. सरदार पटेल ने दो टूक सलाह दी, "हक मांगो मत, छीन लो. बिचौलियों को बाहर का रास्ता दिखाओ. अपनी खुद की कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाओ, अपना प्लांट लगाओ और सीधे बंबई दूध सप्लाई करो." मशविरा तो क्रांतिकारी था, लेकिन क्या अंग्रेज हुकूमत किसानों को अपनी यूनियन बनाने देती?

4 जनवरी 1946 को सरदार पटेल के निर्देश पर मोरारजी देसाई खेड़ा पहुंचे. किसानों को एकजुट किया और एक फैसला हुआ. अगर सरकार नहीं मानी, तो हड़ताल होगी. और हुआ भी यही. किसानों ने दूध देना बंद कर दिया. 15 दिनों तक बंबई को दूध की एक बूंद तक नहीं गई. आखिरकार, अंग्रेजी हुकूमत को घुटने टेकने पड़े.
14 दिसंबर 1946 को जन्म हुआ 'खेड़ा डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर यूनियन' का. शुरुआत सिर्फ दो गांवों और 250 लीटर दूध से हुई थी, लेकिन छह महीने के अंदर 400 से ज्यादा किसान जुड़े और रोजाना 4 हजार लीटर दूध पहुंचने लगा.
अमेरिका से लौटे इंजीनियर वर्गीज कुरियन की एंट्री
कहानी में सबसे बड़ा मोड़ आया 1949 में. अमेरिका से मैकेनिकल और डेयरी इंजीनियरिंग पढ़कर लौटा 30 साल का एक नौजवान सरकारी बांड के तहत खेड़ा की सरकारी क्रीमरी में पहुंचा. नाम था वर्गीज कुरियन. आज ही के दिन 9 सितंबर 2012 को इनका निधन हुआ था.

सच कहें तो कुरियन का खेड़ा में बिल्कुल मन नहीं लग रहा था. वह किसी बड़े शहर जाना चाहते थे. साल के अंत में जब उनका ट्रांसफर होने लगा, तो त्रिभुवन दास पटेल किसानों के साथ उनके सामने आ खड़े हुए. उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "साहब, आपके बिना यह डेयरी नहीं चल पाएगी. हमें आपके जैसे पढ़े-लिखे लीडर की जरूरत है." किसान नेता का यह समर्पण कुरियन के दिल को छू गया. एक जनवरी 1950 को उन्होंने यूनियन के जनरल मैनेजर का पद संभाल लिया.
जब भैंस के दूध ने रचा नया इतिहास
कुरियन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि सर्दियों में दूध का उत्पादन दोगुना हो जाता था, जिसे खपाना नामुमकिन हो रहा था. पश्चिमी दुनिया कहती थी कि केवल गाय के दूध से ही मिल्क पाउडर या कंडेंस्ड मिल्क बन सकता है.
कुरियन और उनके साथी इंजीनियर एच. एम. दलाया ने हार नहीं मानी. दलाया ने वो कर दिखाया जिसे दुनिया नामुमकिन मानती थी. उन्होंने भैंस के दूध से स्किम मिल्क पाउडर और कंडेंस्ड मिल्क बनाकर दिखा दिया. अब इस क्रांति के तीन मजबूत स्तंभ थे. त्रिभुवन दास पटेल (किसानों का नेतृत्व), वर्गीज कुरियन (कुशल प्रबंधन) और एच. एम. दलाया (तकनीकी जानकार).

AMUL की शुरुआत
1955 में इसे नाम मिला 'अमूल' (AMUL - Anand Milk Union Limited). 1956 तक अमूल रोजाना एक लाख लीटर दूध प्रोसेस करने लगा और पूरे गुजरात में इसका जाल फैल गया.
जब लाल बहादुर शास्त्री गांव की जमीन पर उतरे
1964 में जब अमूल का नया कैटल-फीड प्लांट बना, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री उद्घाटन के लिए खेड़ा पहुंचे. शास्त्रीजी ने प्रोटोकॉल तोड़कर रात एक आम किसान के घर गुजारी. सुबह उन्होंने कुरियन से पूछा, "मैं पूरे देश में घूमा हूं, लेकिन खेड़ा जैसा खुशहाल और संपन्न किसान मुझे कहीं नहीं दिखा. इसका राज क्या है?"

जवाब मिला- "यहां कोई बिचौलिया नहीं है. बाजार की कीमत का 80 फीसदी हिस्सा सीधे किसान की जेब में जाता है." शास्त्रीजी ने तुरंत कहा, "मुझे यही मॉडल पूरे देश में चाहिए. आप इसका ब्लूप्रिंट लेकर दिल्ली आइए."
ऑपरेशन फ्लड: सफेद क्रांति का आगाज
शास्त्रीजी के निर्देश पर NDDB (राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) बना और कुरियन उसके चेयरमैन बने. 1970 में शुरू हुआ दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी डेवलपमेंट प्रोग्राम 'ऑपरेशन फ्लड'.
जब यूरोप से मुफ्त मिल्क पाउडर और बटर ऑयल भारत आने लगा, तो कुरियन ने सरकार से कहा कि इसे मुफ्त बांटने के बजाय हमें दीजिए. हम इसे प्रोसेस करके बेचेंगे और जो पैसा आएगा, उससे पूरे देश में डेयरी नेटवर्क खड़ा करेंगे.
तीन चरणों में चले इस मिशन ने पूरे देश की तस्वीर बदल दी.
फेज-1 (1970-1980): 13 डेयरी प्लांट और आधुनिक सप्लाई चेन.
फेज-2 (1980-1990): वर्ल्ड बैंक के सहयोग से 170 डेयरी प्लांट और 32 पशु आहार प्लांट.
फेज-3 (1990-1996): कमजोर सोसायटियों का पुनरुद्धार और गांव-शहर तक वेंडिंग नेटवर्क.
दूध की कमी वाले देश से 'दूध के सबसे बड़े उत्पादक' तक
नतीजा क्या निकला? 1998 आते-आते भारत दुनिया में सबसे ज्यादा दूध उत्पादन करने वाला देश बन गया. डॉ. वर्गीज कुरियन को दुनिया ने 'श्वेत क्रांति का जनक' (Father of the White Revolution) माना.
रूस, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका जैसे देशों ने कुरियन से मदद मांगी. यहां तक कि चीन ने भी अधिकारियों को भेजकर अमूल के मॉडल को समझा और अपने यहां डेयरी क्रांति की शुरुआत की. खेड़ा के चंद किसानों की जिद और सरदार पटेल के एक विजन से शुरू हुआ यह सफर आज भारत के हर घर की सुबह का हिस्सा है. AMUL के बनने और डॉक्टर वर्गीज कुरियन पर 1976 में श्याम बेनेगल ने ‘मंथन' फिल्म को बनाई थी.

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