मुंगेर. बिहार का मुंगेर जिला. वहां एक ऐसा गवाह खड़ा है, जिसने न जाने कितने राजा-महाराजाओं को आते-जाते देखा, कितने साम्राज्यों को मिट्टी में मिलते देखा और आज भी सीना ताने खड़ा है. हम बात कर रहे हैं एक बरगद के पेड़ की लेकिन ये कोई आम पेड़ नहीं है. साइंस ने मुहर लगा दी है कि यह दुनिया का सबसे बुजुर्ग बरगद का पेड़ है. इसकी उम्र कम से कम 700 साल है. अब आप सोचेंगे कि भला पेड़ की उम्र का अंदाजा कैसे लगा? क्या ये सिर्फ सुनी-सुनाई बातें हैं? बिल्कुल नहीं. पहले लोग दादा-परदादा की कहानियों और लोकगीतों के भरोसे कहते थे कि 'ये पेड़ बहुत पुराना है'. लेकिन इस बार वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है.
लखनऊ के मशहूर 'बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान' की डॉ. तृना बोस और उनकी टीम ने कमाल कर दिखाया है. बिहार वन विभाग के न्योते पर वैज्ञानिकों ने मुंगेर के आईटीसी (ITC) परिसर में खड़े इस बरगद की जांच शुरू की. उन्होंने कोई तुक्का नहीं मारा, बल्कि पेड़ की जड़ों और शाखाओं से लकड़ी के सबसे पुराने हिस्से को निकाला और उसकी 'रेडियोकार्बन डेटिंग' की.
कैसे खुली 700 साल पुरानी उम्र की परतें?
वैसे, गरम देशों में उगने वाले पेड़ों की उम्र बताना लोहे के चने चबाने जैसा होता है. क्यों? क्योंकि इनके तनों में वो रिंग्स या छल्ले साफ-साफ नहीं बनते, जिन्हें गिनकर उम्र बताई जा सके.
लेकिन हमारी वैज्ञानिक टीम ने हार नहीं मानी. उन्होंने बरगद की सबसे पुरानी मुख्य डाल और दूसरे तने की गहराई से सैंपल लिए. फिर उस लकड़ी से 'अल्फा-सेल्यूलोज' निकालकर 'एक्सेलेरेटर मास स्पेक्ट्रोमेट्री' यानी एएमएस (AMS) जैसी हाई-टेक मशीन से टेस्ट किया. जब इस वैज्ञानिक कसौटी पर नतीजे आए, तो सब हैरान रह गए. मुख्य डाल की उम्र करीब 700 साल निकली. यानी जब हमारे देश में मुगलों का दौर भी शुरू नहीं हुआ था, तब से यह बरगद अपनी जड़ें फैला रहा था.

इतिहास की किताबों को बदलना होगा
इस खुलासे ने एक और पुरानी धारणा को सच के मलबे में दबा दिया है. पहले लोग मानते थे कि मुंगेर के ऐतिहासिक 'बड़ा बंगला' (जो करीब 300-350 साल पुराना है) के बनने के वक्त यह पेड़ लगाया गया होगा. लेकिन अब सच सामने है, यह पेड़ तो उस बंगले से भी सदियों पुराना है.
मतलब साफ है, कभी यहां एक घना और विशाल जंगल हुआ करता था. वक्त बदला, जंगल कटे, इंसानों ने इमारतें खड़ी कर दीं, लेकिन कुदरत का यह अनोखा सिपाही अपनी जगह पर अडिग रहा.
सिर्फ पेड़ नहीं, हमारी साझी विरासत है यह
सदियों से यह बरगद सिर्फ पक्षियों और गिलहरियों का आशियाना नहीं रहा, बल्कि यह गवाह रहा है हमारी पंचायत का, राजाओं और आम जनता के बीच हुए संवादों का, तीज-त्योहारों का और हमारी संस्कृति का. इसकी घनी छांव में न जाने कितनी पीढ़ियां खेलकर बड़ी हो गईं.
आज जब विज्ञान ने इस पर अपनी मुहर लगा दी है, तो उम्मीद जगी है कि हम अपनी इस प्राकृतिक विरासत को और बेहतर तरीके से सहेज पाएंगे. यह खोज दुनिया भर के पुराने पेड़ों की उम्र का वैज्ञानिक सच सामने लाने का एक नया रास्ता खोलेगी.
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