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This Article is From Oct 02, 2025

दशहरे पर रावण के साथ खड़े दो लोग कौन होते हैं? जिनका हर बार जलाया जाता है पुतला

Dussehra 2026: दशहरे के मेले में आपने कई बार रावण जलते हुए देखा होगा, लेकिन रावण के अलावा भी दो पुतले खड़े होते हैं, जिनके बारे में कुछ लोग नहीं जानते हैं. इन्हें जलाने से पहले इनके बारे में जान लीजिए.

दशहरे पर रावण के साथ खड़े दो लोग कौन होते हैं? जिनका हर बार जलाया जाता है पुतला
रावण के साथ जलाए जाते हैं ये पुतले

Dussehra 2026: हर साल की तरह इस साल भी दशहरे का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है. बुराई पर अच्छाई की जीत को लेकर ये त्योहार मनाया जाता है और लोग रावण दहन करते हैं. पिछले कई दशकों से दशहरे के मौके पर रावण दहन हो रहा है, जिससे लोगों को हर बार यही मैसेज दिया जाता है कि बुराई चाहे कितनी भी ताकतवर हो, आखिर में जीत अच्छाई की होती है. दशहरे पर 10 सिर वाले रावण के अलग-बगल दो पुतले और खड़े होते हैं, जिन्हें भी साथ में जलाया जाता है. कुछ लोगों को ये पता नहीं होता है कि आखिर ये दो लोग कौन होते हैं. 

रावण के साथ जलते हैं दो पुतले

देशभर में दशहरे के दौरान रावण के कई फीट ऊंचे पुतले जलाए जाते हैं, लेकिन तमाम बड़ी जगहों पर रावण के साथ-साथ दो और पुतलों का ऑर्डर दिया जाता है. सबसे बड़ा रावण होता है और उसकी दोनों तरफ ये थोड़े छोटे दिखने वाले पुतले खड़े किए जाते हैं. रावण दहन के साथ इनका भी दहन किया जाता है. कुछ जगहों पर इनकी संख्या ज्यादा भी हो सकती है.

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कौन हैं ये दो लोग?

रावण के साथ जलने वाले ये दो लोग उसी के परिवार के हैं. पहला पुतला रावण के पुत्र मेघनाद का होता है, जिसे इंद्रजीत के नाम से भी जाना जाता है. वहीं दूसरा पुतला रावण के भाई कुंभकरण का होता है, जो काफी खतरनाक और विशालकाय था. मेघनाद का वध श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने किया था, वहीं कुंभकरण को खुद प्रभु श्रीराम ने मारा था. 

इनके अलावा कई लोग अहिरावण, ताड़िका, देवांतक, प्रहस्त, अक्षय कुमार, सुबाहु आदि के पुतले भी बनवाते हैं, जिनकी लंबाई 10 से 15 फीट तक होती है. इन सभी पुतलों को एक सात दशहरे की शाम जलाया जाता है. 

जान लीजिए इतिहास 

रावण के अंत पर जश्न की प्रथा सदियों से चली आ रही है, हालांकि मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में ये त्योहार भव्य रूप से नहीं मनाया जाता था. आजादी के बाद से भारत के तमाम हिस्सों में दशहरा धूमधाम से मनाया जाने लगा. बताया जाता है कि झारखंड के रांची में पहली बार सामूहिक रावण दहन किया गया था. हालांकि राजा महाराजाओं के जमाने में दशहरे के मौके पर मेले का आयोजन किया जाता था, जो परंपरा आज भी चली आ रही है. 
 

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