डीएम से लेकर सीएम और बाकी तमाम अधिकारियों के दफ्तर से जब भी कोई तस्वीर सामने आती है तो सभी में एक बात कॉमन होती है, जिस कुर्सी पर महाशय बैठे होते हैं, उसके पीछे चमचमाता हुआ एक सफेद तौलिया लगा होता है. कई अधिकारियों और नेताओं की गाड़ी की सीट पर भी ऐसा ही होता है. हाल ही में तमिलनाडु के नए सीएम बने थलापति विजय ने इस परंपरा को खत्म करते हुए अपनी कुर्सी से सफेद तौलिया हटा दिया, जिसके बाद इस तौलिये को लेकर लोगों के मन में काफी कुछ चलने लगा. लोग पूछने लगे कि आखिर ये तौलिया क्यों लगाया जाता है और इसकी शुरुआत कहां से हुई थी.
सीएम विजय ने क्यों हटाया सफेद तौलिया?
दरअसल मणिपुर की रहने वाली बच्ची लिसिप्रिया कंगुजम ने सीएम विजय से अपील करते हुए कहा था कि सरकारी दफ्तरों में सफेद तौलिये वाली परंपरा को खत्म किया जाना चाहिए, इस अपील को स्वीकार करते हुए विजय ने सफेद तौलिया हटाने का फैसला लिया. लिसिप्रिया कंगुजम एक जानी मानी पर्यावरण एक्टिविस्ट हैं.
कहां से हुई सफेद तौलिये की शुरुआत?
ब्रिटिश सरकार के दौरान इस तौलिये वाली परंपरा की शुरुआत हुई थी. भारत में ब्रिटिश अधिकारियों को काफी गर्मी लगती है और पसीना भी आता था, ऐसे में जब वो कुर्सी पर बैठते तो उनके कपड़ों से पसीना इस पर लग जाता, वहीं बैठे-बैठे भी पीठ पर पसीना आने लगता था. इसका इलाज सफेद कपड़े और बाद में सफेद तौलिये से हुआ, ये सफेद तौलिया गर्मी को कम करता और पसीने को भी सोखने का काम करता था. इससे कुर्सी एकदम नई और साफ रहती थी.
स्टेटस सिंबल बन गया सफेद तौलिया
अंग्रेजों के जमाने में भले ही इसे गर्मी से बचने और हाईजीन के लिए रखा जाता था, लेकिन आज ये स्टेटस सिंबल या फिर वीआईपी कल्चर का एक प्रतीक बन चुका है. कुर्सी पर सफेद तौलिया लगाना एक रुतबे की तरह माना जाता है, यही वजह है कि छोटे से छोटा अधिकारी भी अपनी कुर्सी पर चमकदार सफेद तौलिया रखता है. भले ही आज गर्मी से बचने के लिए सरकारी दफ्तरों में कई एसी लगे हों, लेकिन कुर्सी का वजन दिखाने के लिए इस सफेद तौलिये को जरूर लपेटा जाता है.
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