- झारखंड के रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, सिंहभूम और लातेहार के जंगलों में रुगड़ा मशरूम मिलता है
- रुगड़ा जमीन के नीचे उगने वाला जंगली मशरूम है जिसे बारिश के बाद उभरी मिट्टी देखकर निकाला जाता है
- रुगड़ा की बाजार में कीमत बारिश के शुरुआती दिनों में दो हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है
Rugda Mushroom: मानसून की पहली अच्छी बारिश होते ही झारखंड के जंगलों में मिलने वाला दुर्लभ सब्जी रुगड़ा लोगों की आजीविका का बड़ा सहारा बन जाता है. स्थानीय भाषा में इसे 'जंगल की सब्जी' या 'सफेद सोना' भी कहा जाता है. झारखण्ड में सबसे अधिक उपलब्धता रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, पश्चिमी सिंहभूम और लातेहार जिला के जंगलों में होती है. रुगड़ा न केवल स्वाद के लिए मशहूर है, बल्कि इसकी ऊंची कीमत ग्रामीण परिवारों, खासकर महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का बड़ा स्रोत बन जाती है.
जमीन के नीचे छिपा होता है रुगड़ा
रुगड़ा किसी पेड़ पर नहीं उगता, बल्कि जमीन के अंदर विकसित होने वाला एक प्रकार का जंगली सब्जी है. बारिश के बाद जंगल की मिट्टी में हल्का उभार दिखाई देता है. अनुभवी ग्रामीण उसी उभरी हुई मिट्टी को देखकर अंदाजा लगा लेते हैं कि नीचे रुगड़ा है. इसके बाद हाथ या छोटी लकड़ी की सहायता से सावधानीपूर्वक मिट्टी हटाकर इसे निकाला जाता है. थोड़ी सी लापरवाही से रुगड़ा टूट सकता है, जिससे उसकी कीमत भी कम हो जाती है.
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निकालने में लगती है कड़ी मेहनत
रुगड़ा निकालना आसान काम नहीं है. महिलाएं सुबह तड़के ही जंगल पहुंच जाती हैं. कई किलोमीटर पैदल चलने के बाद घंटों तक जंगल में खोजबीन करनी पड़ती है. कई बार पूरा दिन मेहनत करने के बाद भी एक-दो किलो रुगड़ा ही मिल पाता है. बारिश, फिसलन, कीड़े-मकोड़े और जंगली जानवरों का खतरा भी बना रहता है.

रुगड़ा जंगलों के बीच मिलने वाली सब्जी है, जो बारिश के मौसम में साल और सखुआ के पेड़ के नीचे उगती है.
ऐसे बिकता है रुगड़ा
जंगल से लाने के बाद रुगड़ा को अच्छी तरह साफ किया जाता है. इसके बाद महिलाएं इसे गांव के हाट, स्थानीय बाजार या शहर की मंडियों में बेचती हैं. कई व्यापारी सीधे गांव पहुंचकर भी खरीदारी करते हैं. सीजन और उपलब्धता के अनुसार, इसकी कीमत सामान्यतः 1200 से 1600 रुपये प्रति किलो तक रहती है. शुरुआती दिनों में इसकी कीमत करीब 2000 रुपए प्रति किलो रहता है.
महिलाओं की आय का मजबूत जरिया
रुगड़ा बेचने आई महिला बुधनी देवी ने एनडीटीवी से बताया कि जंगल से मिलने वाला रुगड़ा उनके परिवार की आजीविका का एक महत्वपूर्ण सहारा है. उन्होंने कहा कि सीजन के दौरान रुगड़ा बेचकर अच्छी आमदनी हो जाती है, जिससे घर-परिवार का खर्च चलाने, बच्चों की पढ़ाई और अन्य जरूरी जरूरतों को पूरा करने में काफी मदद मिलती है. बुधनी देवी के अनुसार, रुगड़ा का सीजन उनके लिए कमाई का सबसे अच्छा समय होता है और मेहनत के बदले उन्हें अच्छा दाम भी मिल जाता है.

Rugda Mushroom: यह आदिवासियों के लिए पोषण और कमाई का बड़ा जरिया है.
एक सीजन में लाखों की कमाई
ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं और परिवार रुगड़ा बेचकर अच्छी कमाई कर लेते हैं. यदि किसी महिला को प्रतिदिन 3 से 5 किलो रुगड़ा मिल जाए और बाजार में अच्छी कीमत मिले, तो वह एक दिन में चार हजार से सात हजार रुपये तक कमा लेती है. पूरे सीजन में कई परिवार पचास हजार से एक लाख रुपये या उससे अधिक की अतिरिक्त आय अर्जित कर लेते हैं. हालांकि यह कमाई जंगल में उपलब्धता और मौसम पर निर्भर करती है.
पोषण से भरपूर है रुगड़ा
रुगड़ा को पोषण का खजाना माना जाता है. इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन और कई आवश्यक खनिज तत्व पाए जाते हैं. यह कम वसा वाला खाद्य पदार्थ है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है. झारखंड में इसकी सब्जी, भुजिया और मसालेदार के रूप में बेहद पसंद की जाती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि रुगड़ा पूरी तरह प्राकृतिक संसाधन है. जंगलों की कटाई, आग और पर्यावरणीय बदलाव से इसका उत्पादन प्रभावित हो रहा है. यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो रुगड़ा भी सुरक्षित रहेगा और इससे हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका भी बनी रहेगी...
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