- शी जिनपिंग आखिरी बार अक्टूबर 2016 में चेन्नई में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के लिए भारत आए थे
- 2020 में गलवान विवाद के बाद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हुए लेकिन धीरे-धीरे सुधार की दिशा में बढ़े
- प्रधानमंत्री मोदी और शी जिनपिंग ने द्विपक्षीय संबंधों में किसी भी कठोर बयान से बचकर शांति कायम रखी
आखिरकार इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का भारत दौरा भी कंफर्म हो गया. इस कंफर्मेशन के साथ ही अब ये क्लियर हो गया कि ब्रिक्स 2026 बहुत ही महत्वपूर्ण होने जा रहा है. इस शिखर सम्मेलन पर दुनिया की पहले ही नजरें गड़ी हुईं थीं, मगर अब इस समिट की एक-एक बात पर दुनिया की सभी खुफिया एजेंसियों के साथ ही राष्ट्राध्यक्ष भी नजर रखेंगे.
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आज घोषणा की, 'भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निमंत्रण पर, राष्ट्रपति शी जिनपिंग 12 से 13 सितंबर तक नई दिल्ली में होने वाले 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होंगे.'
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आखिरी बार कब आए जिनपिंग भारत
शी जिनपिंग आखिरी बार 11-12 अक्तूबर 2016 को भारत आए थे. यह दौरा चेन्नई के महाबलीपुरम में हुआ थी. प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच यह दूसरा अनौपचारिक शिखर सम्मेलन था. इससे पहले, उन्होंने 2014 में भारत का अपना पहला दौरा किया था और पीएम मोदी के साथ विस्तृत बातचीत की थी. इसके बाद, 2016 में वे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए गोवा गए थे. 2014 का यह दौरा दोनों नेताओं के कार्यकाल के शुरुआती दौर में हुआ था.
मगर इसके बाद 2020 में गलवान की घटना हुई और दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हो गए. हालांकि, दोनों देशों ने अपने सभ्यागत संबंधों को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे तनाव को कम किया. सबसे खास बात ये रही कि पीएम मोदी और प्रेसीडेंट जिनपिंग की तरफ से कभी भी कोई कठोर बयान नहीं दिया गया.
इस दौरे के एक अहम कूटनीतिक कार्यक्रम होने की उम्मीद है. इसका असर इन दो एशियाई ताकतों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर करने की कोशिशों पर तो पड़ेगा ही, साथ ही अस्थिर वैश्विक हालात—खासकर पश्चिम एशिया के टकराव और रूस-यूक्रेन युद्ध—के बीच ब्रिक्स (BRICS) सहयोग पर भी इसका असर होगा.
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