- विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर गंभीर मतभेद जारी हैं जो चुनाव से पहले सुलझने हैं
- 2017 में कांग्रेस को सौ सीटें देने के बावजूद केवल सात पर जीत मिलना सपा के लिए बड़ी निराशा साबित हुआ था
- साहिबाबाद, नोएडा, मेरठ कैंट, वाराणसी कैंट, जेवर, गोरखपुर सदर, कुंडा और अयोध्या दोनों दलों के लिए चुनौती हैं
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर सपा और कांग्रेस के बीच लंबे समय से खींचतान जारी है. अगले कुछ महीनों में चुनाव होने हैं और उससे पहले दोनों दल चाहेंगे कि सीटों की संख्या फाइनल हो जाए. एक तरफ कांग्रेस ज्यादा और जिताऊ सीटों की मांग रख रही है तो वहीं सपा उसे याद दिलाई रही है कि वह कितनी सीटें जीत सकती है. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 100 सीटें देना सपा के लिए झटका माना गया था. इसकी वजह थी कि कांग्रेस इनमें से महज 7 पर ही जीत हासिल कर पाई थी. हालांकि इस खींचतान में एक समस्या ऐसी भी है, जिसका हल निकलने में और कठिनाई होगी.
यह मसला उन सीटों का है, जिन्हें सपा और कांग्रेस दोनों ही जिताऊ नहीं मानते. ऐसे में सीट बंटवारे में कोई भी दल नहीं चाहेगा कि इन सीटों को ले. इन सीटों में साहिबाबाद, गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ कैंट, वाराणसी कैंट, जेवर, गोरखपुर सदर, कुंडा और अयोध्या शामिल हैं. मेरठ की बात करें तो यहां की कैंट सीट पर 1989 से लगातार जीत हासिल कर रही है. यहां बसपा भी एक फैक्टर रही है, लेकिन सपा और कांग्रेस तो खासे कमजोर हैं. ऐसे में देखना होगा कि इस सीट पर सपा और कांग्रेस में से कौन दावा करता है. ऐसी ही एक सीट गाजियाबाद जिले की साहिबाबाद भी है. यह सीट 2012 में अस्तित्व में आई थी. तब बसपा से अमरपाल शर्मा जीते थे.
पश्चिम यूपी की इन सीटों पर भी जलवा
फिर 2017 और 2022 में भाजपा के सुनील कुमार शर्मा को बड़ी जीत मिली. फिलहाल वह योगी सरकार में मंत्री भी हैं. कहा जाता है कि 2012 में भी भाजपा यहां तब हारी थी, जब आपसी कलह बहुत ज्यादा थी. ऐसे में इस सीट पर कौन दावा करेगा, यह भी देखने वाली बात होगी. वहीं नोएडा सीट तो 2012 में अस्तित्व में आने के बाद से अब तक भाजपा का ही गढ़ है. पहली बार यहां से महेश शर्मा विधायक बने थे. फिर 2014 में वह सांसद चुने गए तो फिर बिमला बाथम जीती थीं. 2017 और 2022 में यहां से पंकज सिंह चुनाव जीते थे. माना जा रहा है कि एक बार फिर से उन्हें मौका मिलेगा. ऐसी ही एक सीट नोएडा के जेवर की है. यहां 1991, 1993 और 1996 में भाजपा जीती थी. फिर 2002 से लगातार तीन चुनाव बसपा ने जीते थे. 2017 और 2022 में फिर से भाजपा को जीत मिली. साफ है कि तीन दशकों से ज्यादा वक्त से यहां कांग्रेस या सपा को जीत नहीं मिली है.
गोरखपुर सदर, वाराणसी कैंट से लगातार जीत रही
अब बात करें सीएम योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद कहे जाने वाले गोरखपुर की सदर सीट की. यहां से 1989 से लगातार भाजपा ही जीत रही है. यहां जीत का अंतर भी भाजपा का काफी ज्यादा रहा है. खुद योगी आदित्यनाथ फिलहाल यहां से विधायक हैं. पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की कैंट विधानसभा सीट भी ऐसी है. यहां से भी भाजपा लगातार 1991 से जीत ही रही है. वहीं प्रतापगढ़ जिले की कुंडा सीट भी कांग्रेस या सपा के लिए दूर की कौड़ी रही है. यहां से राजा भैया लगातार जीत रहे हैं. 1993 से ही राजा भैया यहां से जीत रहे हैं. आखिर कुंडा से सपा या कांग्रेस कौन लड़ना चाहेगा. यह भी सोचने वाली बात है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं