- अमेरिकी निवेशक फर्म टाइगर ग्लोबल को भारत में टैक्स देने का आदेश दिया है
- विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का विदेशी निवेश पर तुरंत कोई असर नहीं होगा
- हालांकि, कुछ विशेषज्ञ इसके दूरगामी परिणाम की भी बात कर रहे हैं
सुप्रीम कोर्ट का अमेरिकी निवेशक फर्म टाइगर ग्लोबल के फैसले का क्या देश की स्टार्टअप्स इंडस्ट्री को कोई झटका लगेगा? ये सवाल विशेषज्ञों से लेकर कंपनियों के जेहन में है. हालांकि, कई विशेषज्ञ कोर्ट के इस फैसले का तुरंत कोई असर होता नहीं बता रहे हैं लेकिन उद्योग जगत में इसे लेकर वेट एंड वॉच वाली स्थिति बनी हुई है. विशेषज्ञ इस फैसले के बाद ज्यादा असर की बात नहीं कह रहे हैं. उनका मानना है कि शीर्ष अदालत के इस फैसले का असर विदेशी निवेशक (FDI) और विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) के निवेश पर तुरंत नहीं पड़ेगा. हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का दूरगामी असर पड़ सकता है और देश की स्टार्टअप्स कंपनियों को इसपर सतर्क नजर रखनी होगी. सर्वोच्च अदालत का ये फैसला अमेरिकी कंपनी के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है. इस फैसले के जरिए उन कंपनियों को सबक मिलेगा जो मॉरीशस या सिंगापुर के रास्ते भारत में पैसा लगाते हैं. कोर्ट का यह फैसला देश के टैक्स डिपार्टमेंट के लिए जीत है.
क्या तुरंत पड़ेगा कोई असर?
टैक्स कंपास (Tax Compass) के फाउंडर और CEO अजय रोत्ती ने कहा कि इस फैसले का तुरंत कोई असर नहीं पड़ने वाला है. उन्होंने कहा कि अभी जो निवेश भारत में जारी है या कुछ दिन बाद आने वाला है, उसपर कोई असर नहीं पड़ेगा. उन्होंने कहा कि भारत कैपिटन गेन्स पर टैक्स छूट देने का समझौता केवल कुछ देशों के साथ किया है. इसमें मॉरीशस और सिंगापुर जैसे देश शामिल हैं. उन्होंने कहा कि मॉरीशस समझौते पर तो अभी भी बात चल रही है. भारत ने इसके बाद घोषणा की थी कि 1 अप्रैल 2017 के बाद जो ताजा निवेश भारत में आया है तो उसके दो साल के विंडो में 50 फीसदी टैक्स देना ही होगा. यानी 2017 के बाद से मॉरीशस या सिंगापुर से आने वाले निवेश में कोई टैक्स छूट नहीं मिलने वाली है. उन्होंने कहा कि इसका असर लीगेसी ट्रेड या लीगेसी ट्रांजैक्शन पर पड़ेगा.
स्टार्टअप्स कंपनियों को पड़ेगी मार!
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सभी विदेशी निवेशकों की करीबी नजर होगी. इस फैसले का असर भारत के स्टार्टअप्स पर भी पड़ सकता है. इससे भविष्य में होने वाले समझौतों पर असर हो सकता है. वैसे भी पिछले काफी समय से देश की स्टार्टअप्स कंपनियों में विदेशी निवेश घट रही है. मार्केट फर्म ट्रैक्सन इंडिया के अनुसार 2025 में भारतीय स्टार्टअप्स ने 10.5 अरब डॉलर का फंड जुटाया था.ये 2024 की तुलना में विदेशी फंडिंग में करीब 17 फीसदी की गिरावट थी. 2024 में भारतीय स्टार्टअप्स को 12.7 अरब डॉलर की फंडिंग मिली थी. 2023 में भारतीय स्टार्टअप्स कंपनियों को 11 अरब डॉलर की फंडिंग मिली थी. यानी 2025 में जो फंड भारतीय स्टार्टअप को मिले वो 2023 की तुलना में भी 4 प्रतिशत कम है.
स्टार्टअप्स कंपनियां क्या करेगी?
विदेशी फंडिंग का ट्रेंड अलग-अलग स्तर पर अलग हो रहा है. शुरुआती स्टेज की स्टार्टअप्स फंडिंग में भी उतार-चढ़ाव साफ देखा जा रहा है. 2025 में ऐसी कंपनियों को 1.1 अरब डॉलर फंडिंग मिली थी. लेकिन 2024 में ऐसी शुरुआती कंपनियों को 1.5 अरब डॉलर की फंडिंग मिली थी. यानी 2025 में 30 फंडिंग में 30 फीसदी की गिरावट आई. वहीं, 2023 में विदेशी फंडिंग 1.4 अरब डॉलर की रही थी. सीड-स्टेज फंडिंग में 2025 में कुल 1.1 बिलियन डॉलर की राशि प्राप्त हुई, जो 2024 में जुटाई गई 1.5 बिलियन डॉलर की राशि से 30% और 2023 में जुटाई गई 1.4 बिलियन डॉलर की राशि से 25% कम है. रोत्ती बताते हैं कि इस फैसले का अभी हो रहे निवेश या कुछ समय बाद होने वाले निवेश पर कोई असर नहीं पड़ेगा. ऐसे में ये कंपनियां फंडिंग की कोशिश जारी रख सकती हैं.
क्या है पूरा मामला
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से टाइगर ग्लोबल को बड़ा झटका लगा है. सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को अपने फैसले में कहा है कि 2018 में फ्लिपकार्ट से बाहर निकलने के समय उसे हुए मुनाफे पर उसे भारत में टैक्स देना होगा. अदालत ने इस बारे में इनकम टैक्स विभाग के फैसले को सही ठहराते हुए अमेरिकी कंपनी कैपिटल गेन्स देने का आदेश दिया. जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के अगस्त 2024 के फैसले को पलटते हुए कहा कि ये आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टाइगर ग्लोबल के पक्ष में फैसला सुनाया था. अदालत ने कहा था कि एक बार यह साबित हो जाए कि जिन गैर-सूचीबद्ध शेयरों की बिक्री पर करदाता को पूंजीगत लाभ हुआ और उनका हस्तांतरण गैरकानूनी तरीके से किया गया है तो ऐसे टैक्सपेयर भारत-मॉरीशस द्विपक्षीय कर संधि के अनुच्छेद 13(4) के तहत कर छूट का दावा करने के हकदार नहीं हैं.
कब क्या हुआ?
अक्टूबर 2011 से अप्रैल 2015 के बीच टाइगर ग्लोबल ने फ्लिपकार्ट सिंगापुर के शेयर खरीदे और बाद में अपनी हिस्सेदारी लक्जमबर्ग स्थित इकाई फिट होल्डिंग्स एसएआरएल को स्थानांतरित कर दी. वर्ष 2018 में अमेरिकी खुदरा दिग्गज वॉलमार्ट इंक के फ्लिपकार्ट में नियंत्रक हिस्सेदारी खरीदने पर टाइगर ग्लोबल इस निवेश से बाहर निकल गया था. फिर टाइगर ग्लोबल फर्म ने फरवरी, 2019 में आयकर विभाग से इस मामले पर फैसला करने को कहा. प्राधिकरण ने अपने फैसले में कहा था कि टाइगर ग्लोबल समूह की संगठनात्मक संरचना दर्शाती है कि संबंधित इकाइयां कर बचाव योजना में केवल मध्यस्थ के रूप में कार्य कर रही थीं. प्राधिकरण ने कहा था कि करदाता और उससे जुड़ी कंपनियों का वास्तविक नियंत्रण एवं प्रबंधन टीजीएम एलएलसी के पास था जो अमेरिका में है, न कि मॉरीशस में. हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह माना था कि टीजीएम एलएलसी केवल एक निवेश प्रबंधक की भूमिका में था और उसे मूल कंपनी नहीं माना जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने अब उस निर्णय को पलटते हुए राजस्व विभाग के रुख को सही ठहराया है.
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