- वैवाहिक विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पति को पत्नी को 10 हजार प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था
- पति की दैनिक आय केवल तीन सौ पच्चीस रुपये बताई गई, जिसके चलते गुजारा भत्ता देने में असमर्थता जताई गई
- पति की ओर से वकील ने कहा, उसकी वित्तीय क्षमता और वर्तमान दायित्वों को ध्यान में रखकर भत्ता निर्धारित किया जाए
सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच झारखंड के एक वैवाहिक विवाद मामले में सुनवाई कर रही थी. पति- पति की ओर से अदालत में बहस चल रही थी कि अदालत ने कहा कि पति अपनी पत्नी को ₹10,000 प्रतिमाह गुज़ारा भत्ता दे. लेकिन पति के वकील ने जो कहा वो अदालत के लिए चौकाने वाला था... उसके वकील ने बताया कि रकम वो नहीं दे सकता, क्योंकि उसकी दैनिक आय मात्र ₹325 है.
...तो फिर पत्नी को साथ रखिए
ये सुनकर पीठ चौंक उठी तो पति के वकील ने दलील दी कि वह एक निजी कंपनी में कार्यरत है और उसकी आय सीमित है. उसने यहां तक कहा कि उसके सहकर्मी भी हलफनामा दायर कर उसकी आय की पुष्टि कर सकते हैं. इस पर पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आप अपनी पत्नी को साथ रखिए, वह आपके और बच्चों के लिए खाना बनाएगी. हालांकि, पति ने जवाब दिया कि पत्नी ने उसके तथा उसके माता-पिता के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई हैं और वैवाहिक संबंध अब सामान्य स्थिति में नहीं हैं. पीठ ने ये भी टिप्पणी की कि लो वह उस कंपनी से संपर्क कर सकती है, जहां पति कार्यरत है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि उसे इतना कम वेतन क्यों दिया जा रहा है?
वकील मे भी जवाब दिया कि ये बाकी कर्मचारियों के लिए भी अच्छा रहेगा. पति की ओर से पेश वकील जॉर्ज पोथन पूथिकोटे ने अदालत में कहा, 'माननीय न्यायालय ने पूर्व में यह स्पष्ट रूप से कहा है कि भरण-पोषण या गुज़ारा भत्ता निर्धारित करते समय पति की वित्तीय क्षमता के साथ-साथ उसके वर्तमान दायित्वों और देनदारियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.'
अदालत ने मामले में फैसला सुरक्षित रखा
पति बोकारो में एक कार शोरूम में काम करता है और रोजाना उसे 325 रुपये मिलते हैं. दोनों की शादी 2002 में हुई थी. साल 2003 में दंपती को पहले बेटा हुआ फिर 2005 में बेटी. 2016 से दोनों अलग रह रहे हैं. दोनों बच्चे पिता के साथ ही रह रहे हैं. तलाक मामले में अदालत ने पति को 6 लाख रुपये बतौर गुजारा भत्ता देने को कहा था. वकील के मुताबिक, ये रुपये पति के पिता ने जमीन बेचकर पत्नी को देने में मदद की थी. लेकिन बाद में पत्नी ने कहा कि ये काफी नहीं है और पति से 30 लाख रुपये एकमुश्त दिलाए जाएं. साथ ही 12500 रुपये प्रतिमाह भी गुजारा भत्ता हो. पति के वकील का कहना है कि वो प्रतिमाह 9750 रुपये ही कमाता है. बाकी वो अपने अभिभावकों व भाइयों की मदद से गुजर-बसर करता है. फिलहाल अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा है.
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