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नेपाल में बाढ़ से तबाही पर दुनिया के सबसे महंगे सैटेलाइट ने अब तक बड़ा डेटा क्यों नहीं भेजा?

नेपाल में ग्लेशियर जलाशयों से मची भयावह बाढ़ के बीच सवाल उस निसार सैटेलाइट पर है जिसे हिमालय के ग्लेशियर, भूस्खलन और जमीन की हलचल देखने के लिए बनाया गया है. उसने इस आपदा में आखिर क्या देखा इसके डेटा अब तक क्यों नहीं आए?

नेपाल में बाढ़ से तबाही पर दुनिया के सबसे महंगे सैटेलाइट ने अब तक बड़ा डेटा क्यों नहीं भेजा?
  • नेपाल में आई फ्लैश फ्लड की तबाही के बीच निसार की खामोशी एक बड़ा सवाल बन गई है.
  • इस 1.3 अरब डॉलर के मिशन से अब तक इस आपदा पर कोई बड़ा सार्वजनिक विश्लेषण सामने नहीं आया है.
  • नासा के वैज्ञानिक ने बताया कि निसार केवल डेटा जुटाता है, खतरे के संकेत को समझने के लिए टाइम सीरीज की जरूरत है.

26 अगस्त को नेपाल में आई फ्लैश फ्लड, ग्लेशियरों के टूटने और उससे मची भारी तबाही को समझने की पूरी दुनिया कोशिश कर रही है. लेकिन इस बीच एक सवाल तेजी से उठने लगा कि आखिर पिछले साल अंतरिक्ष में भेजा गया दुनिया का सबसे महंगा सिविलियन अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट NISAR कहां था? भारत और अमेरिका का यह संयुक्त मिशन लगभग 1.3 अरब डॉलर की लागत से तैयार किया गया यह सैटेलाइट धरती को बेहद बारीकी से देखने और उसकी सतह में होने वाले बदलावों को समझने के लिए बनाया गया है.

इस सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजे गए एक साल से भी अधिक हो गए हैं. तब इसे क्रांतिकारी सैटेलाइट बताया गया था. कहा गया था कि यह सैटेलाइट धरती पर मौजूदा कुछ बहुत बड़ी चुनौतियों को समझने और  निपटने में मदद करेगा.

निसार में अत्याधुनिक रडार लगा है. यह पृथ्वी की सतह में होने वाले बदलावों को मिलीमीटर के स्तर तक माप सकता है. इसे ग्लेशियरों पर नजर रखने, जमीन के खिसकने या उसमें होने वाले बदलावों का पता लगाने, भूस्खलन को ट्रैक करने, भूकंपों का अध्ययन करने और आपदा प्रबंधन के लिए अहम जानकारी देने के लिए तैयार किया गया है.

हिमालय को निसार के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र माना गया था. इसकी वजह यहां तेजी से बदलते ग्लेशियर, अस्थिर पहाड़ियां, लगातार होतीं टेक्टोनिक गतिविधियां और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे मौजूद हैं.

लेकिन अब नेपाल के रासुवा जिले में हुई भयावह फ्लैश फ्लड ने निसार की क्षमताओं और उसके वास्तविक इस्तेमाल को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.

यह आपदा ग्लेशियरों के टूटने, बर्फ, पानी, चट्टानों और मलबे के बड़े पैमाने पर खिसकने की घटनाओं से भारी तबाही में बदल गई. यह घटना ऐसे इलाके में हुई, जिसे निसार जैसे मिशन को देखने और समझने के लिए तैयार किया गया है.

तो फिर निसार कहां था?

यह सवाल अब वैज्ञानिकों, आपदा विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं को असहज कर रहा है कि आखिर दुनिया का सबसे अत्याधुनिक सिविलियन अर्थ इमेजिंग सैटेलाइट जब अपनी कक्षा में मौजूद है तो नेपाल की इतनी बड़ी आपदा को लेकर अब तक उसने (निसार ने) को सार्वजनिक आकलन, चेतावनी या अब तक कोई बड़ा वैज्ञानिक विश्लेषण क्यों नहीं दिया, जिससे इस आपदा को अच्छे से समझा जा सके?

यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि नासा और इसरो ने खुद निसार की क्षमताओं को बेहद महत्वकांक्षी तरीके से पेश किया था.

नासा ने कई बार कहा है कि निसार आपदाओं को ट्रैक करने, इको सिस्टम और फसलों की निगरानी करने, ग्लेशियरों और आइस शीट्स का अध्ययन करने और यह समझने में मदद करेगा कि पृथ्वी की सतह किस तरह बदल रही है.

नासा के मुताबिक निसार से मिलने वाला डेटा लोगों की जान बचाने, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और बदलती पृथ्वी को पहले से कहीं ज्यादा गहराई से समझने में मदद करेगा. इसरो ने भी निरास को लेकर इसी तरह की बड़ी उम्मीदें जताई थीं.

इसरो के मुताबिक निसार हर 12 दिन में दुनिया की जमीन और बर्फ से ढकी सतहों की तस्वीरें लेगा. इसमें द्वीप, समुद्री बर्फ और चुनिंदा समुद्री क्षेत्र भी शामिल हैं.

निसार के प्रमुख उद्देश्यों में जमीन और बर्फ में होने वाले बदलाव, जमीन के इको सिस्टम और उन समुद्री क्षेत्रों का अध्ययन शामिल है, जो भारत और अमेरिका के वैज्ञानिक समुदायों के लिए साझा रुचि वाले हैं.

कार्टोसैट

कार्टोसैट
Photo Credit: ISRO

इसरो के पास दूसरे सैटेलाइट भी हैं

यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि नेपाल की इस त्रासदी की भारतीय सैटेलाइटों ने अंतरिक्ष से निगरानी की है. इसरो ने रिसोर्स सैट-2ए और कार्टोसैट-3ए जैसे रडार और अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को इसके विश्लेषण के लिए इस्तेमाल किया है. प्लानेट लैब्स ने इसकी सैटेलाइट इमेजरी भी जारी की है. पर सवाल ये है कि निसार की तरफ से अब तक सार्वजनिक डोमेन में क्या सामने आया है.

इसरो या नासा की तरफ से नेपाल की इस आपदा को लेकर निसार सैटेलाइट से कोई बड़ा सार्वजनिक विश्लेषण अभी तक सामने नहीं आया है.

निसार से जुड़ी उम्मीदों को नासा के जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के निसार प्रोजेक्ट वैज्ञानिक डॉ. पॉल रोसेन ने लॉन्च से पहले NDTV को दिए इंटरव्यू में साफ शब्दों में बताया था.

उन्होंने कहा था कि निसार केवल एक साइंस का मिशन नहीं है बल्कि यह एक एप्लिकेशन मिशन भी है. इसमें बर्फ और ग्लेशियरों की दुनिया, इकोसिस्टम और भूकंप और भूस्खलन जैसी उन प्राकृतिक आपदाओं का अध्ययन किया जाएगा, जो पृथ्वी की आंतरिक संरचना, टेक्टोनिक प्लेटों की गति और भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के कारण उत्पन्न होती हैं. 

उन्होंने इसे सीधे तौर पर इसे क्लाइमेट मिशन से जोड़ा.

डॉ. रोसेन ने यह भी कहा था कि निसार पृथ्वी की जमीन और बर्फ की हलचल की थ्रीडी फिल्में बनाने में मदद कर सकता है.

उनके मुताबिक पुराने रिमोट सेंसिंग में ऐसा कुछ नहीं है जो इसी तरह पृथ्वी की हलचल को दिखा सके.

उन्होंने निसार की क्षमता समझाते हुए कहा कि यह जमीन में होने वाले बदलावों को मिलीमीटर स्तर तक माप सकेगा. इससे वैज्ञानिकों को भूकंप चक्र को बड़े घटनाक्रम से पहले, उसके दौरान और उसके बाद समझने में मदद मिलेगी.

उन्होंने भूस्खलन और खतरनाक ग्लेशियर जलाशयों से भारी मात्रा में पानी के निकलने की घटना को भी निसार के काम वाले क्षेत्रों में गिनती की.

उनके मुताबिक निसार भूस्खलन से पहले होने वाली जमीन की हलचल को देख सकता है.

साथ ही यह ग्लेशियरों की गतिविधियों पर नजर रखकर, ग्लेशियर की झील में विस्फोट से आई बाढ़ के खतरे का आकलन करने में मदद कर सकता है.

नेपाल में जिस क्षेत्र में यह आपदा हुई, वह बेहद अस्थिर हिमालयी भूभाग है. यहां अस्थिर ढलान, पीछे हटते ग्लेशियर, ग्लेशियल झीलें, टेक्टोनिक गतिविधियां और तेजी से बदलता पहाड़ी भू-दृश्य मौजूद है.

रासुवा की यह तबाही ठीक उसी तरह की घटना है, जिसके अध्ययन के लिए निसार को तैयार किया गया है.

निसार की पहली सालगिरह भी हाल में मनाई गई

निसार की क्षमताओं और नेपाल आपदा के बीच यह विरोधाभास इसलिए भी ज्यादा चर्चा में है क्योंकि नासा और इसरो ने कुछ ही हफ्ते पहले सैटेलाइट के अंतरिक्ष में एक साल पूरे होने का जश्न मनाया था.

4 अगस्त 2026 को दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों ने बेंगलुरु में निसार के एक साल पूरे होने पर एक संयुक्त कार्यक्रम आयोजित किया.

इस कार्यक्रम का नाम था, "निसार – प्रचालन का एक वर्ष: प्रदर्शन का आकलन, विज्ञान को आगे बढ़ाना और साझेदारी को मजबूत करना."

कार्यक्रम में निसार की उपलब्धियों, वैज्ञानिक नतीजों, डेटा के प्रसार और भविष्य में इसके इस्तेमाल की संभावनाओं को सामने रखा गया.

इसरो के चेयरमैन डॉ. वी नारायणन ने इस सहयोग की तारीफ की और वैज्ञानिकों से अपील की कि वे इस मिशन का पूरा फायदा उठाएं और इंसानियत के सामने मौजूद महत्वपूर्ण वैज्ञानिक चुनौतियों को समझने में इसका इस्तेमाल करें.

नासा के अधिकारियों ने भी निसार की वैश्विक अहमियत पर जोर दिया.

नासा के अर्थ साइंस विभाग की डायरेक्टर डॉ. कैरेन एम सेंट जर्मेन ने अर्थ सिस्टम को समझने के लिए निसार से मिलने वाले डेटा को अहम बताया है. नासा के फिल बारेला ने भी इसकी अहमियत पर जोर दिया है. 

31 जुलाई 2026 को नासा के जेट प्रपल्शन लैब ने भी कहा कि निसार को भारत से लॉन्च हुए एक साल हो चुका है और यह पृथ्वी की जमीन और बर्फ से ढकी सतहों का अध्ययन कर रहा है, जिससे यह समझने में मदद मिल रही है कि हमारा ग्रह किस तरह बदल रहा है.

डॉ. रोसेन ने खुद यह भी दिखाया कि निसार का एल-बैंड रडार इकोसिस्टम, क्रायोस्फेयर और सॉलिड अर्थ को किस तरह देख रहा है.

इसरो के वैज्ञानिकों ने जंगल में मौजूद बायोमास यानी कुल मौजूद पेड़-पौधे चाहे वो जीवित हों या मृत, मिट्टी में नमी, धरती पर लगी हुई फसलें, समुद्र की सतह पर हवा, मैंग्रोव, जंगल के इकोसिस्टम में होने वाली क्षति और सतह पर बदलाव जैसे क्षेत्रों में निसार के इस्तेमाल को भी सामने रखा.

यानी सब कुछ यही संकेत दे रहा था कि निसार वही काम कर रहा है, जिसकी उससे उम्मीद की गई थी. लेकिन नेपाल की आपदा ने अब इसे एक कठिन परीक्षा के सामने खड़ा कर दिया है.

क्या निसार से हर आपदा की भविष्यवाणी की उम्मीद की जा सकती है?

यह समझना जरूरी है कि ऐसा कोई सार्वजनिक सबूत मौजूद नहीं है कि निसार को एक चेतावनी देने वाले उपग्रह के तौर पर विकिसित किया गया था, जो हर बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियर के टूटने या भूकंप के पहल की भविष्यवाणी कर सके.

इसी तरह ऐसा भी कोई सार्वजनिक प्रमाण मौजूद नहीं है कि निसार में तकनीकी खराबी आई है, या निसार मिशन तकनीकी रूप से विफल हुआ है.

लेकिन जब नासा और इसरो खुद ग्लेशियरों की निगरानी, भूस्खलन से पहले होने वाली हलचल, जमीन में बदलाव की मिलीमीटर स्तर की माप और आपदा आकलन जैसी क्षमताओं को इस मिशन की अहम खूबियों के रूप में बताते हैं, तब यह सवाल पूछना स्वाभाविक है कि हाल की हिमालयी आपदा के बारे में निसार ने अब तक क्या देखा है.

सवाल सीधे हैं

क्या निसार ने इस क्षेत्र में जमीन की ऐसी हलचल देखी थी, जो आपदा से पहले किसी खतरे का संकेत दे रही हो?

क्या उसने ग्लेशियरों में अस्थिरता को मापने लायक कोई बदलाव देखा?

क्या आपदा से पहले उसे जमीन में कोई बदलाव के संकेत मिले थे?

क्या इस घटना को लेकर कोई शुरुआती वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है?

और अगर ऐसा कोई विश्लेषण मौजूद है, तो उसे अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

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इसरो ने 17 अगस्त को क्या कहा था?

17 अगस्त 2026 को इसरो ने एक सार्वजनिक बयान में कहा था कि निसार पृथ्वी की गतिविधियों को समझने के लिए सुव्यवस्थित तरीके से लगातार महत्वपूर्ण डेटा एकत्र कर रहा है.

इसरो के मुताबिक ये डेटा इकोसिस्टम, सॉलिड अर्थ, क्रायोस्फेयर यानी हिममंडल- जहां पानी ठोस या बर्फ के रूप में मौजूद हो, हाइड्रोलॉजी या जल विज्ञान, ओशियनोग्राफी यानी समुद्र विज्ञान, तटीय प्रक्रियाएं जिससे समुद्र और स्थल के मिलन स्थल पर बदलाव देखे जाते हैं, जीयोसाइंस यानी भू-विज्ञान, और आपदा राहत कार्यों समेत कई वैज्ञानिक क्षेत्रों में प्रगति के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.

इसका मतलब यह भी है कि निसार आपदाओं से जुड़ी वैज्ञानिक समझ में इस्तेमाल हो रहा है. और इसका एक उदाहरण नेपाल से पहले सामने भी आ चुका है.

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वेनेजुएला में निसार ने भूकंप के बाद जमीन का बदलाव दिखाया

29 जून 2026 को नासा के जेपीएल ने बताया था कि वेनेजुएला में आए दो शक्तिशाली भूकंपों के बाद नासा के सैटेलाइट जमीन पर हुए असर को समझने में मदद कर रहे थे.

24 जून को वेनेजुएला में 7.2 तीव्रता का भूकंप आया था.

इसके कुछ ही दिनों बाद नासा ने बताया कि निसार मिशन के डेटा की मदद से एक नक्शा तैयार किया गया है, जिसमें दिखाया गया कि भूकंप के कारण जमीन की सतह किस तरह हिली.

इस डेटा ने इमरजेंसी मैनेजर्स और वैज्ञानिकों को भूकंप के असर को समझने में महत्वपूर्ण जानकारी दी.

यानी यह कहना बिल्कुल भी सही नहीं होगा कि निसार ने अब तक किसी आपदा में मदद ही नहीं की है.

लेकिन नेपाल की त्रासदी में निसार की सार्वजनिक मौजूदगी का सवाल इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि यह घटना उसी हिमालयी क्षेत्र में हुई है, जिसे इस मिशन के प्रमुख अध्ययन क्षेत्रों में माना गया है.

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Photo Credit: AFP

निसार का डेटा सार्वजनिक होना था

एक और महत्वपूर्ण पहलू है. नासा और इसरो ने यह तय किया था कि निसार का डेटा सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराया जाएगा.

लॉन्च से पहले डॉ. रोसेन ने NDTV से कहा था कि डेटा प्रोसेसिंग के बाद लगभग तुरंत बाद इसे पब्लिक आर्काइव में रखा जाएगा.

उन्होंने यह भी कहा था कि नासा और इसरो ने इस पर सहमति जताई है और पूरा रडार डेटा मौजूद रहेगा.

ऐसे में जब नेपाल में सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर हुआ क्या था, तो स्वाभाविक रूप से उम्मीद की जाएगी कि निसार का डेटा इस वैज्ञानिक जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए.

लेकिन नेपाल की आपदा के बाद NDTV को दिए जवाब में डॉ. रोसेन ने इस पूरे मामले की एक अहम सीमा भी स्पष्ट की.

उन्होंने कहा कि निसार सिर्फ डेटा लेता है, उसका विश्लेषण निसार नहीं करता. ये विश्लेषण वैज्ञानिक करते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि वैज्ञानिक अभी उस टाइम सीरीज की शुरुआत कर रहे हैं, जो किसी इलाके में खतरे से पहले होने वाले व्यवहार को समझने के लिए जरूरी है.

उनके मुताबिक जब वैज्ञानिक ऑटोमेटेड टूल विकसित कर लेंगे, जो पूरे हिमालय में सामान्य और असामान्य गतिविधियों को खोज सकें, तभी इस तरह के खतरे की पहचान की उम्मीद की जा सकती है.

डॉ. रोसेन ने यह भी स्पष्ट किया कि निसार अपनी तरह का पहला सैटेलाइट है और इस तरह की घटनाओं की पूर्वानुमान के लिए इसके डेटा और इसकी क्षमता को समझने में कुछ समय लगेगा.

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Photo Credit: NASA

दुनिया की सबसे बड़ी रडार आंख से इतनी उम्मीद क्यों?

निसार कोई सामान्य अर्थ ऑबजर्वेशन सैटेलाइन नहीं है . इसमें लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात अब तक का सबसे बड़ा 12 मीटर का रडार एंटेना लगा है. इससे भारतीय और अमेरिकी रडार तकनीक जुड़े हैं.

फिलहाल स्थिति यही है कि निसार को अंतरिक्ष में गए एक साल से अधिक हो चुके हैं. अपना पहला बर्थडे मनाने के ठीक बाद ही निसार के सामने हिमालय की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक आई लेकिन उसका अब तक विस्तृत विश्लेषण नहीं हो सका है.

हो सकता है कि वैज्ञानिक इसके विस्तृत विश्लेषण पर काम कर रहे हों और जल्द ही वो सामने आ जाए.

यह भी पूरी तरह संभव है कि वैज्ञानिकों को डेटा को प्रॉसेस करने, उसकी पुष्टि करने और किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में समय लग रहा हो.

ये दोनों ही बेहद संभव और तार्किक वजहें हैं.

लेकिन जब तक इन सवालों के जवाब सामने नहीं आते, तब तक एक असहज धारणा बनी रहेगी.

जिस सैटेलाइट को ग्लेशियरों, भूस्खलनों, जमीन की हलचल और जलवायु परिवर्तन से बदलती पृथ्वी को देखने के लिए मानवता की नई खिड़की बताया गया था, वही सैटेलाइट उस समय खामोश दिखाई दे रहा है, जब दुनिया यह जानना चाहती है कि उसने नेपाल की इस तबाही में क्या देखा?

अगर निसार सैटेलाइट का डेटा सामने आता है, तो वह नेपाल की इस आपदा को समझने में मदद करेगा ही, यह भी बताएगा कि भविष्य में हिमालय जैसे बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसी आपदाओं के खतरे को कितनी जल्दी पहचाना जा सकता है.

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