- सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) को डिफॉल्टर बिल्डरों को सुविधाएं देने वाला बताया है.
- रेरा को 2017 में लागू भू-संपदा कानून के तहत खरीदारों के अधिकारों की सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए बनाया गया था.
- रेरा के नियमों के अनुसार बिल्डरों को निर्माण के लिए खरीदारों से जमा राशि का 70% अलग बैंक खाते में रखना है.
सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (रेरा) पर गुरुवार को सख्त टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीध जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि रेरा ने डिफॉल्टर बिल्डरों को सुविधाएं देने के अलावा कोई ठोस काम नहीं किया है. अदालत ने तो यहां तक कह दिया कि अब इसके बंद करने का समय आ गया है. इसे बंद कर देने से अदालत को कोई दिक्कत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने यह कड़ी टिप्पणी हिमाचल प्रदेश रेरा से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए की.इसके साथ ही रेरा को लेकर बहस तेज हो गई है.
क्यों बनाया गया था रेरा
इस सदी की पहले दशक में देश में रीयल स्टेट क्षेत्र का तेजी से विस्तार हुआ. अधिकांश राज्यों के बड़े शहरों में बड़ी बिल्डिंगें नजर आने लगी थीं. इनमें फ्लैट बने हुए थे. इसको लेकर कोई अलग से कानून नहीं था. ऐसे में बिल्डरों ने जमकर मनमानी की. इससे खरीदारों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा. लोगों ने जिन परियोजनाओं में लोन लेकर पैसे लगाए, वो समय पर पूरी नहीं हुईं. इससे खरीदारों को समय पर कब्जा नहीं मिला. लेकिन वो लोन की किस्तें चुकाते रहे. हालत यहां तक हो गए थे कि राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के नोएडा एक्सटेंसन में बिल्डरों ने लोगों को हवा में ही फ्लैट बेच दिए. उन्होंने जमीन पर कोई काम नहीं किया था. यह मामला कोर्ट भी गया था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लोगों का काफी देरी से फ्लैट मिला. इससे उन्होंने मानसिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा.
इस पर सरकार ने चिंता की और घर के खरीदारों के अधिकारों की सुरक्षा और पारदर्शिता लाने के वादे के साथ भू-संपदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 को संसद में पेश किया. यह कानून बनने के बाद एक मई 2017 से लागू हो गया.इससे भारत को पहला रियल एस्टेट नियामक संस्था मिली. इसे देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अधिसूचित कर दिया है. केंद्र सरकार के आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के मुताबिक लद्दाख, नगालैंड, सिक्किम, मणिपुर, मिजोरम को छोड़कर देश के बाकी के राज्यों में रेरा का गठन हो गया है.

बिल्डरों ने दिखाया ठेंगा
यह कानून जब बना तो सरकार और इसके समर्थकों ने इसे एक ऐसा कानून बताया जहां उपभोक्ता ही सब कुछ होगा. इसके साथ ही यह कहा गया कि यह कानून जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन को बढ़ावा देगा. इस कानून में प्रावधान है कि बिल्डर खरीददारों से जमा किए गए धनराशि का 70 फीसदी हिस्सा उस परियोजना के निर्माण के लिए एक अलग बैंक खाते में रखेंगे. इस खाते से पैसा आर्किटेक्ट, चार्टर्ड एकाउंटेंट और परियोजना से जुड़े इंजीनियरों की ओर से सत्यापित किए जाने के बाद ही निकल पाएगा. इसका मकसद परियोजना को समय पर पूरा होना सुनिश्चित करना है, क्योंकि पैसा केवल निर्माण उद्देश्य के लिए ही निकाला जा सकता है.इस कानून में 500 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल और आठ अपार्टमेंट से अधिक वाली परियोजनाओं का लॉन्च से पहले रेरा में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया. इसमें यह भी प्रावधान है कि खरीदार के साथ बिक्री समझौता किए बिना डेवलपर कोई भी जमा या अग्रिम राशि नहीं लेगा. पंजीकरण के लिए परियोजना का कारपेट एरिया, लेआउट, समय अवधि जैसी जानकारी देना अनिवार्य है. बिल्डरों के लिए जरूरी है कि वो अपनी परियोजना के विज्ञापन में रेरा का रजिस्ट्रेशन नंबर जिक्र करेंगे.
अपनी स्थापना के कुछ साल बाद ही रेरा की प्रासंगिकता को लेकर सवाल उठाए जाने लगे. बिल्डरों ने रेरा के नियमों को दरकिनार करना शुरू कर दिया. महाराष्ट्र रेरा ने पुणे और पिपंरी चिंचवाड़ की 189 परियोजनाओं में देरी की वजह से फ्लैट की नई बिक्री पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन बिल्डरों ने उसकी नहीं सुनी और उन्होंने फ्लैट की बिक्री जारी रखी. रेरा की कार्रवाई के बाद बिल्डरों के समर्थन में उनका संगठन क्रिडाई खड़ा हो गया था. उसका कहना है कि इन बिल्डरों ने अपनी परियोजनाएं समय पर पूरा कर ली हैं, लेकिन किसी कारण बस कागजात को वो रेरा की बेवसाइट पर अपलोड नहीं कर पाए हैं.

रेरा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
रेरा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कोई नई बात नहीं है. इससे पहले सितंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत और उज्जवल भुयान के पीठ ने भी रेरा पर इसी तरह की टिप्पणी की थी. उस समय अदालत ने कहा था कि रेरा उन पूर्व नौकरशाहों के लिए एक जगह बन गया है, जिन्होंने रेरा कानून को विफल कर दिया है. अदालत ने कहा था, ''हम रेरा के बारे में बात नहीं करना चाहते हैं. यह उन पूर्व नौकरशाहों के लिए पुनर्वास केंद्र बन गया है, जिन्होंने अधिनियम की पूरी योजना को विफल कर दिया है.''
अभी पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने रेरा की स्थिति पर चिंता जताते हुए सख्त टिप्पणी की थी. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन के खंडपीठ ने राज्यों को यह सुनिश्चित करने को कहा था कि रेरा के पास पर्याप्त बुनियादी ढांचा, विशेषज्ञ और संसाधन उपलब्ध हों. अदालत ने कहा था कि हर रेरा में कम से कम एक सदस्य रियल एस्टेट क्षेत्र में सिद्ध विशेषज्ञता वाला कानूनी विशेषज्ञ या उपभोक्ता वकील होना चाहिए. अदालत ने यह भी कहा था कि किसी भी परियोजना को मंजूरी देने से पहले रेरा को पूरी तरह से जांच-पड़ताल करनी चाहिए.
रेरा में शिकायतों का अंबार
रेरा की बेवसाइट के मुताबिक देश भर में एक लाख 58 हजार 856 परियोजनाएं इसमें पंजीकृत हैं. इसके अलावा एक लाख 12 हजार 51 एजेंट भी इससे पंजीकृत हैं. देशभर से रेरा को एक लाख 89 हजार 681 शिकायतें मिली हैं. इसमें से एक लाख 55 हजार 262 शिकायतों का निपटारा कर दिया गया है.

रेरा के मुताबिक देश में सबसे अधिक परियोजनाएं महाराष्ट्र में हैं. महाराष्ट्र की कुल 53 हजार 46 परियोजनाओं में से 50 हजार 487 आवासीय परियोजनाएं हैं. इन आवासीय परियोजनाओं में 47 लाख 13 हजार 290 फ्लैट हैं.इन परियोजनाओं के खिलाफ रेरा को 33 हजार 202 शिकायतें मिली हैं. इनमें से 27 हजार छह शिकायतों का निपटारा कर दिया गया है. वहीं उत्तर प्रदेश में कुल चार हजार 111 प्रोजेक्ट चल रहे हैं. इनमें से तीन हजार 464 आवासीय हैं. इन आवासीय परियोजनाओं में 11 लाख 74 हजार 443 फ्लैट हैं. इन परियोजनाओं के खिलाफ यूपी रेरा को कुल 60 हजार 21 शिकायतें मिलीं. इनमें से 52 हजार 47 शिकायतों का निपटारा कर दिया गया है. इस तरह हम पाते हैं कि रेरा में सबसे अधिक शिकायतें यूपी रेरा को मिलती हैं.
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