- मायावती की बसपा 2012 में सत्ता से विदा हुई और 2022 तक उसकी विधानसभा सीटें घटकर एक ही रह गईं
- 2022 में बसपा को लगभग बारह फीसदी वोट मिले जबकि लोकसभा चुनाव 2024 में यह नौ दशमलव तीन प्रतिशत पर पहुंची
- बसपा का वोट शेयर किसी भी सीट पर जीत नहीं दिला पाया लेकिन चुनाव परिणामों में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है
उत्तर प्रदेश की सत्ता से मायावती 2012 में पूरे 5 साल सरकार चलाने के बाद विदा हुई थीं. 2007 में उनकी पार्टी बसपा 206 सीटों के साथ सत्ता में आई थी. इसलिए जब 2012 में सपा जीती तो शायद उन्हें भरोसा रहा होगा कि 2017 में वह वापस लौट सकती हैं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मायावती गईं तो फिर अब तक लौट नहीं सकी हैं बल्कि उनकी पार्टी लगातार कमजोर होती जा रही है. यहां तक कि 2007 से 2022 तक के सफर में बसपा 206 सीटों के आंकड़े से एक सीट पर आ पहुंचीं. बसपा के एकमात्र विधायक रहे उमाशंकर सिंह के निधन के बाद अब यूपी की विधानसभा से बसपा 'आउट' ही हो गई है. ऐसे में सवाल है कि जब बसपा इतनी कमजोर है तो फिर हाथी की चाल चुनाव में कितना मायने रखेगी.
बसपा को 2022 के विधानसभा चुनाव में करीब 12 फीसदी वोट ही मिले थे. इसके बाद लोकसभा चुनाव 2024 में वह 9.3 पर्सेंट आकर ठहर गई. भले ही बसपा ने एक भी सीट पूरे प्रदेश में नहीं जीती, लेकिन करीब 10 फीसदी वोट पाना आसान नहीं है. बसपा को पूरे राज्य में यह वोट मिला है. यह वोट इतना नहीं था कि उसे एक भी सीट जिता पाए, लेकिन किसी की भी हार या जीत तय करने में अहम है. यही वजह है कि बसपा के और कमजोर होने की संभावना देखते हुए क्या भाजपा, क्या सपा और फिर क्या कांग्रेस, सभी भुना लेना चाहते हैं.
क्यों दलितों के मुद्दे पर मुखर होते जा रहे राहुल गांधी
यूपी की राजनीति को गहराई से समझने वालों का कहना है कि शायद यही वजह है कि राहुल गांधी ने मनु स्मृति, दलित उत्पीड़न और मल्लिकार्जुन खरगे के अपमान जैसे विषय को लगातार उठाने की कोशिश की है. शायद उन्हें लगता है कि इससे कांग्रेस को खोए हुए वोटबैंक का एक हिस्सा मिल सकेगा. कांग्रेस को लेकर यह कहा जाता है कि उसका वोट बैंक लंबे समय तक ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम ही थे. 1990 में मंडल और कमंडल की राजनीति में ध्रुवीकरण बढ़ा तो मुसलमान सपा के साथ चले गए, दलित बसपा के साथ और सवर्ण एवं कुछ अन्य ओबीसी के साथ भाजपा मजबूती से उभरी.

यूपी में अब भी एक्स फैक्टर है मायावती
कुर्मियों का साथ पाकर सपा और कांग्रेस को फायदा, अब जाटवों पर नजर
ऐसे में राहुल गांधी की कांग्रेस को शायद बसपा एक्स फैक्टर लग रही है, जो भले खुद जीतने की स्थिति में न हो, लेकिन किसी की भी हार और जीत तय कर सकती है. ऐसे में राहुल गांधी आक्रामक होकर दलित उत्पीड़न के सवाल उठा रहे हैं. इसके अलावा अखिलेश यादव भी दलित समाज को जोड़ने के लिए सक्रिय हैं. दोनों ही गठबंधन सहयोगियों को लगता है कि जब कुर्मी समाज का एक हिस्सा ही लोकसभा चुनाव में साथ आया तो इतनी बड़ी सफलता मिल गई थी. ऐसे में यदि दलित समाज का इस बार एक बड़ा हिस्सा साथ आया तो नतीजे काफी अंतर डाल सकते हैं.
देखें- 2022 में किस पार्टी का कितना था वोट शेयर

यूपी में बसपा के बेस वोट बैंक की है 10 फीसदी आबादी
दरअसल उत्तर प्रदेश में बसपा के बेस वोटबैंक कहे जाने वाले जाटव समाज की 10 फीसदी आबादी है. माना जा रहा है कि मायावती की बसपा के लगातार कम जोर होने के चलते अब यह समाज भी अपने लिए राजनीतिक विकल्पों की तलाश में है. इसका बड़ा हिस्सा खुद को भाजपा के ज्यादा करीब नहीं पाता. ऐसे में सपा और कांग्रेस को लगता है कि इस वर्ग को समय रहते लुभा लेना चाहिए. भाजपा यूं भी गैर-जाटव दलितों पर दांव लगती रही है. ऐसे में दलितों के बीच ही काउंटर-पोलराइजेशन की कोशिश कांग्रेस और सपा करना चाहते हैं.
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