- नीट पेपर लीक के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर करीब एक महीने से युवा लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं
- विरोध प्रदर्शन के बावजूद राजनीतिक दल आंदोलन से दूरी बनाए हुए हैं और मंच साझा करने से बच रहे हैं
- आगामी विधानसभा चुनावों में जाति और धर्म के आधार पर वोटिंग पैटर्न युवा आंदोलनों से अलग प्रभाव दिखा सकते हैं
नीट पेपर लीक के विरोध के नाम पर हजारों युवा (CJP Protest) सड़कों पर उतरे हैं. राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर करीब एक महीने से डटे आंदोलनकारी सोमवार को उग्र हो गए और मार्च संसद के दरवाजे तक पहुंच गया. सरकार और दिल्ली पुलिस की तमाम कोशिशों के बाद भी विरोध प्रदर्शन जारी है. अस्पताल से ही सोनम वांगचुक अनशन पर हैं तो वहीं जंतर-मंतर पर भी भीड़ छंटी नहीं है. ऐसे में यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि क्या इसका असर आने वाले चुनाव पर भी दिखेगा. अगले कुछ महीनों में यूपी, पंजाब, उत्तराखंड समेत देश के 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. क्या इसका असर सीधे वहां दिखेगा? इस सवाल का जवाब स्पष्ट तौर पर विपक्ष के पक्ष में नहीं जाता.
इसके कई कारण नजर आते हैं. जनता में भले ही किसी कारण से गुस्सा पनपा हो, लेकिन उसे भुनाना उसी के लिए संभव है, जिसका जमीन पर संगठन मजबूत हो और नैरेटिव उसके पक्ष में हो. मौजूदा हालात ऐसे हैं कि प्रदर्शनकारी खुलकर राजनीतिक दलों को साथ नहीं लाना चाहते. ऐसा इसलिए क्योंकि उनके साथ मंच साझा करने से आंदोलन की विश्वसनीयता ही खतरे में पड़ जाती है. अब यदि विपक्ष की विश्वसनीयता ही इस तरह की है तो फिर चुनाव में कैसे फायदा मिल सकेगा. यह विचार करने की जरूरत है. यूपी में अखिलेश यादव हों या फिर राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी. इन आंदोलनों में सीधे तौर पर उनकी भूमिका नहीं रही है. राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर कुछ विरोध किया है, लेकिन सड़क पर नहीं उतरे. इसके अलावा अखिलेश यादव ने तो इस मुद्दे की नब्ज ही तब पकड़ी, जब सड़क पर विरोध गहराने लगा.
फिर जब चुनाव हुए तो पंजाब में भाजपा की हालत कमोबेश पहले जैसी ही रही. हरियाणा में खूब कयास लगे कि अबकी बार, कांग्रेस सरकार. लेकिन ऐसा नहीं हुआ और भाजपा चौंकाते हुए 48 सीटें जीतकर सत्ता में लौट आई. इसके अलावा बीते यूपी चुनाव में भी पश्चिम यूपी में भाजपा को अच्छे वोट मिले. यूपी का यही इलाका था, जो किसान आंदोलन से प्रभावित था. फिर भी भाजपा को यहां खूब सीटें मिलीं तो साफ था कि चुनाव में इसका असर नहीं दिखा. वजह यह कि चुनाव आने तक पश्चिम यूपी में मुद्दा किसानी की बजाय सुरक्षा की चिंता का हो गया था. जिस जाट समाज की नाराजगी की बात कही जा रही थी, उसका ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में ही दिखा.
क्या 2029 में दोहराया जाएगा 2014?
एक बात यह भी है कि भले ही नरेंद्र मोदी सरकार या राज्यों में भाजपा की किसी सरकार से जनता में नाराजगी हो, लेकिन विपक्ष से भी वह बहुत उम्मीद शायद नहीं रखता. यही कारण है कि सरकार के प्रति पनपा गुस्सा विपक्ष के पक्ष में फलीभूत नहीं हो पाता. एक चुनौती मोमेंटम कायम रखने की भी है, जैसा 2014 के चुनाव में हुआ था. तब अन्ना आंदोलन 2011 में हुआ था और चुनाव तीन साल दूर थे. लेकिन भाजपा और संघ परिवार ने उस माहौल को अगले तीन सालों तक बनाए रखा. इसी का असर था कि नरेंद्र मोदी एक चेहरा बने और सरकार विरोधी लहर पूरी तरह उनके पक्ष में कैपिटलाइज हो गई. दिल्ली में यही काम अरविंद केजरीवाल ने अपने पक्ष में कर लिया था. देखना होगा कि 2029 में 2014 दोहराया जाएगा या नहीं. ऐसा कुछ हो पाने की संभावना कितनी है, इसकी पता 2027 में यूपी समेत 5 राज्यों के चुनाव नतीजों से पता चलेगा.
(डिस्क्लेमर- इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है)
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