जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर पेपर लीक को लेकर हुए छात्रों के विरोध-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में जेन-जी (Gen Z) ने हिस्सा लिया. यह भारत के उन सबसे बड़े आंदोलनों में से एक था, जिसमें भविष्य के मतदाताओं ने अपनी आवाज बुलंद की. छात्रों ने अपनी पसंद के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल अपनी बात रखने के लिए किया. उन्होंने वायरल ट्रेंड पर रील बनाई, नारे लगाए, गाने गाए और नाचकर अपनी मांगों को लोगों तक पहुंचाया. यह प्रदर्शन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हो गया, लेकिन इसका असर संसद तक में नजर आया.
संसद में गंजी जेन-जी की भाषा
प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक का मुद्दा जब संसद में उठा, तो सांसदों ने ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जो आमतौर पर संसद में सुनने को नहीं मिलती. सांसदों ने अपनी बात रखने के लिए जेन-जी की बोलचाल की भाषा अपनाई. सरकार का बचाव करते हुए बीजेपी सांसद बांसुरी स्वराज ने कहा,''मोदी जी ने इसे समय रहते समझ लिया (Modiji clocked it) और इसका कानूनी समाधान दिया.'' उन्होंने सरकार की ओर से पेश लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक-2026 को बदलाव लाने वाला संशोधन बताया.
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वहीं शिव सेना के श्रीकांत शिंदे ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्र आंदोलन के पहले 37 दिनों तक विपक्ष 'MIA' (यानी गायब) रहा और बाद में 'FOMO' (यानी मौका हाथ से निकल जाने का डर) होने पर प्रदर्शन करने पहुंच गया. सरकार की आलोचना करते हुए शरद पवार की एनसीपी की सुप्रिया सुले ने सरकार की नीतियों को 'Delulu' (हकीकत से दूर या भ्रम में रहने वाला) बताया.संसद में हुई बहस के दौरान कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी छात्रों के प्रदर्शन के दौरान लोकप्रिय हुए मीम 'वास्ते-गुना-हुइया' का इस्तेमाल कर सरकार पर तंज कसा.
भाषा में आया यह बदलाव केवल संसद तक सीमित नहीं रहा. जिस तरह छात्र अपनी बात रखने के लिए रील बना रहे थे, उसी तरह प्रधानमंत्री ने भी देर रात रील साझा कर प्रदर्शन कर रहे छात्रों से बातचीत की. उन्होंने सेल्फी स्टाइल में वीडियो रिकॉर्ड किए और जेन-जी छात्रों को 'दोस्त' कहकर संबोधित किया.
इस बदलाव को कैसे देखती है जेन-जी
नेताओं के पारंपरिक राजनीतिक भाषा छोड़कर जेन-ज़ी की भाषा बोलने के सवाल पर एनडीटीवी ने छात्रों से उनकी राय जानने की कोशिश की.
दिल्ली की छात्रा निकिता सिंह ने कहा कि नेताओं का अचानक जेन-ज़ी की भाषा बोलना सिर्फ दिखावा लगता है. उन्होंने कहा,''नेताओं को वही रहना चाहिए जो वे हैं. उन्हें किसी और जैसा बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. हमारी पीढ़ी की उनसे बस इतनी उम्मीद है कि वे ईमानदार हों, अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाएं और भ्रष्टाचार न करें. हमारी मांगें बहुत बुनियादी हैं, इसके अलावा कोई उम्मीद नहीं है.'' निकिता का कहना है कि केवल जेन जी की भाषा बोलने से बात नहीं बनेगी. नेताओं को सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म का सही तरीके से इस्तेमाल कर युवाओं से जुड़ना चाहिए.
ललित कुमार नाम के एक छात्र ने कहा कि नेता अक्सर जेन-जी की सोच को समझ नहीं पाते हैं. वे उनकी बेफिक्र शैली को गैर-जिम्मेदारी समझ लेते हैं. ललित ने कहा,''सांसद जेन-जी की मानसिकता नहीं समझते हैं. उन्हें लगता है कि वे विरोध प्रदर्शन को दबा सकते हैं. जेन-जी आराम से रहने वाली पीढ़ी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह काम नहीं करती है. पेपर लीक सिर्फ एक वजह थी, असली बात यह थी कि युवाओं में सरकार के खिलाफ नाराजगी थी.'' उन्होंने कहा कि नेताओं को इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन उन्हें केवल युवाओं की नकल करने की जगह उनकी असली समस्याओं का समाधान भी करना चाहिए.
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में पढ़ने वाली आंचल कपूर ने कहा कि राजनीति में युवाओं तक पहुंच बनाने के लिए उनकी बातें सुनना बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा,''नेताओं को जेन-जी की राय समझनी चाहिए, छात्रों की जरूरतों को सुनना चाहिए और उनका साथ देना चाहिए. हल्की-फुल्की और आसान भाषा अच्छी लगती है क्योंकि हम उसी से जुड़ते हैं, लेकिन केवल भाषा बदलने से काम नहीं चलेगा, हमें वास्तविक समर्थन भी चाहिए.''
क्या जंतर-मंतर पर छात्रों की भाषा असभ्य थी
हाल के प्रदर्शनों में छात्रों की मांगों के साथ-साथ उनकी भाषा पर भी काफी चर्चा हुई. कई लोगों ने आरोप लगाया कि कुछ नारों,पोस्टरों और बयानों में नेताओं के प्रति इस्तेमाल की गई भाषा उचित नहीं थी. जेन जी की इस भाषा पर आरनवी जैन कहती हैं,''जेन-जी अपनी बात साफ-साफ कहती है. वह बात घुमाकर नहीं करती, इसलिए कई बार उसकी भाषा लोगों को कठोर लग सकती है. लेकिन अगर उनकी सोच से देखें तो उसमें कुछ गलत नहीं है.'' वहीं मन्नत बैंस कहती हैं कि युवा किसी से डरते नहीं हैं, लेकिन विरोध की भी एक सीमा होनी चाहिए. उन्होंने कहा,''जेन-जी किसी से नहीं डरती, लेकिन विरोध ऐसा नहीं होना चाहिए जिससे किसी की बेइज्जती हो या किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे. दूसरी पीढ़ियों को हमारी भाषा अलग लग सकती है, लेकिन हमारे लिए यह सामान्य है. हालांकि, दोनों पक्षों को एक मर्यादा का पालन करना चाहिए.''
भले ही नेताओं और जेन-जी के बीच उम्र और भाषा का अंतर हो, लेकिन एक बात साफ है कि अगर किसी नेता को आगे बढ़ना है और चुनाव जीतना है, तो उसे उन युवाओं की भाषा और सोच को समझना होगा, जो भविष्य में तय करेंगे कि देश की सत्ता किसके हाथ में होगी.
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