- भारत में आयोजित होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में रूस, चीन और भारत की तीन प्रमुख महाशक्तियां एक मंच पर नजर आएंगी
- भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को सुलझाने के लिए हाल ही में बातचीत और पाबंदियों में छूट दी गई है
- टैरिफ और पाबंदियों के जवाब में ब्रिक्स देशों की आपसी समझ आर्थिक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है
भारत में ब्रिक्स सम्मेलन का 12 और 13 सितंबर को आयोजन होना है. इसके लिए शुक्रवार तड़के ही व्लादिमीर पुतिन पहुंचने वाले हैं. फिर शनिवार को शी जिनपिंग भी भारत आएंगे. उनके आने या न आने को लेकर कयास लग रहे थे और अंत में शी जिनपिंग भारत आ ही रहे हैं. इस तरह एशिया की तीन महाशक्तियां नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के बहाने एक मंच पर दिखेंगी. इससे पहले शंघाई सहयोग संगठन में भी ऐसा हुआ था. भारत और चीन के बीच पिछले कुछ दिनों में रिश्ते सहज करने की कोशिशें हुई हैं. सीमा विवाद सुलझाने के लिए बैठकें हुई हैं और भारत ने कई पाबंदियां चीन से हटा दी हैं. इस तरह रूस के साथ पहले से ही अच्छे रिश्ते रखने वाला भारत अब चीन के भी करीब जाता दिख रहा है.
यूं तो तीनों देशों की यह आपसी समझ जरूरत, आपूर्ति और मांग के दायरे में विकसित हुई है, लेकिन इसे अमेरिका से भी जोड़कर देखा जा रहा है. जानकारों का मानना है कि अमेरिका के टैरिफ वॉर के जवाब में भी तीनों देशों की यह अंडरस्टैंडिंग महत्वपूर्ण है. ईरान पर हमले, वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाने जैसी हरकतें कर चुके अमेरिका ने रूस पर कड़ी पाबंदियां थोप रखी हैं. इसके अलावा चीन और भारत पर टैरिफ लाद चुका है. ऐसी स्थिति में अकेले पड़े रूस के लिए भारत जरूरी है. वहीं चीन को भारत का बड़ा बाजार दिख रहा है. फिर भारत को रूस से तेल की जरूरत हमेशा रहती है.
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इसके अलावा जिस चीन के खिलाफ अमेरिका ने भारत को संतुलन की नीति साधने के लिए इस्तेमाल किया है. उसका काउंटर करने के लिए भी भारत ने चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश की है. इससे अमेरिका दबाव में आएगा और वह शायद भारत के महत्व को समझ पाएगा. ऐसा इसलिए कि भले ही पाकिस्तान का उपयोग वह ईरान के साथ डील करने जैसी चीजों में कर ले. लेकिन पाकिस्तान का डायस्पोरा ऐसा नहीं है, जैसा भारत का है. इसके अलावा पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भी ऐसी नहीं है, जिसमें निवेश करके अमेरिका कुछ हासिल कर पाएगा.
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ब्रिक्स से पहले ही परेशान रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप
इस बारे में हालात समझने के लिए हमने जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर संदीप कुमार सिंह से भी बात की. उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों की एकता को लेकर पहले भी अमेरिका चिंता जता चुका है. इन देशों की ओर से डॉलर का विकल्प तलाशने की जब बात आई थी तो डोनाल्ड ट्रंप खासे चिढ़ गए थे. इससे स्पष्ट है कि ब्रिक्स उसे दर्द तो देता है. फिर भारत यदि अमेरिकी खेमे की बजाय ब्रिक्स की धुरी बनता है तो उसे परेशानी जरूर होगी. लेकिन भारत के लिए उसके राष्ट्रहित सर्वोपरि हैं. ये हित तभी सुरक्षित होते हैं, जब भारत चीन से लेकर अमेरिका तक दबाव बनाकर रखे. किसी एक के पाले में न जाए, लेकिन किसी को यह भी महसूस न होने दे कि वह किसी भी कीमत पर उसके साथ बना ही रहेगा. इस तरह अपनी क्षमता, जरूरत और परिस्थिति के हिसाब से दबाव की रणनीति जरूरी है. फिलहाल ब्रिक्स का मंच वही संकेत देता दिख रहा है.
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