- अमेरिका का एफ35 विमान तकनीकी और लागत संबंधी कारणों से भारत के लिए उपयुक्त विकल्प नहीं माना जा रहा है
- फ्रांस से राफेल विमान खरीद में भारत और फ्रांस के बीच उच्च विश्वास और मेड इन इंडिया पहल को महत्व दिया जा रहा है
- राष्ट्रपति पुतिन और पीएम मोदी की बैठक में सुखोई 57 और एस400 या एस500 की डील पर सहमति बनने की संभावना है
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन सुबह नई दिल्ली पहुंच जाएंगे. कल उनकी और पीएम मोदी की द्विपक्षीय बातचीत होगी. दोनों नेताओं के बातचीत में क्रूड ऑयल,ट्रेड कॉरिडोर और डिफेंस प्रोजेक्टस पर फोकस रहेगा. पिछले कई दिनों से सुखोई 57 को लेकर कई तरह की खबरें चल रही हैं. ऐसे में भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल अश्विनी शिवाच से एनडीटीवी ने बात कर जानना चाहा कि क्या सच में भारत सुखोई 57 को लेकर सीरियस है.

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क्या सुखोई 57 भारत के लिए जरूरी?
मेजर जनरल अश्विनी शिवाच ने शुरूआत ही बड़ी साफगोई से की. उन्होंने सवाल किया कि क्या हमारे पास कोई च्वाइस है? 114 राफेल आने हैं, पर उसमें अभी समय लगेगा. तेजस प्रोजेक्ट पूरी तरह से अमेरिकी इंजन पर निर्भर है. एमका बनने में कम से कम 10 साल लगेंगे. आज की डेट में 42 स्क्वाड्रन एयरफोर्स को चाहिए. मगर अभी 28 स्क्वाड्रन ही हैं. ऐसे में फिलहाल भारत को दो मोर्चे या ढाई मोर्चे पर खुद को साबित करने के लिए स्टेल्थ फाइटर जेट की सख्त जरूरत है. फिलहाल दुनिया में सिर्फ 5 स्टेल्थ फाइटर जेट हैं. दो अमेरिका के पास, 2 चीन के पास और एक रूस के पास.
तो एफ 35 क्यों नहीं ले लेते?
मेजर जनरल ने आगे कहा कि अमेरिका भारत को एफ 35 देने के लिए तैयार है. एफ 35 शानदार स्टेल्थ लड़ाकू विमान है. मगर इसमें भी समस्याएं हैं.
- पहला तो ये सुखोई 57 से बहुत महंगा है.
- दूसरा अमेरिका को लेकर विश्वास की कमी है.
- तेजस के लिए इंजन देने में अमेरिका के रवैये को हम परख चुके हैं.
- तीसरा एफ 35 का रख-रखाव और प्रति उड़ान कॉस्ट भी बहुत ज्यादा है.
- चौथा अमेरिका इस विमान को जब चाहे डेड कर सकता है.
- पांचवां और सबसे बड़ा कारण ये है कि अमेरिका ना तो इसकी तकनीक देगा और ना ही इसका सोर्स कोड.

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तो राफेल क्यों ले रहे?
एनडीटीवी ने मेजर जनरल से सवाल किया कि फ्रांस भी तो राफेल की ना तो तकनीक दे रहा है और ना ही सोर्स कोड तो फिर हम राफेल को क्यों ले रहे? इस पर मेजर जनरल ने कहा कि फ्रांस और भारत में विश्वास की कमी नहीं है. फ्रांस ने जब भी जिस विमान को देने का वादा किया है, उसे समय से दे दिया है. साथ ही राफेल एफ 35 इतना महंगा नहीं था. इसके अलावा फ्रांस भी मेड इन इंडिया के तहत राफेल बनाने पर सहमत है. वो इंजन में भी भारत को मदद दे रहा है. इसके साथ ही भारत को सोर्स कोड देने पर अभी बातचीत चल ही रही है.
क्या फिर डील तय है?
मेजर जनरल से पूछा गया कि क्या सुखोई 57 के कुछ स्क्वाड्रन और 114 राफेल आ जाने के बाद भारत एक साथ चीन और पाकिस्तान के खतरे को संभाल पाएगा तो अश्विनी शिवाच ने पूरे विश्वास के साथ कहा कि भारत फिर मजबूत स्थिति में रहेगा. अब डॉग फाइट का जमाना नहीं रह गया है. रूस-यूक्रेन युद्ध हो या अमेरिका-ईरान युद्ध या फिर ऑपरेशन सिंदूर. अब ज्यादातर विमान अपनी सीमा या जल क्षेत्र में रहते हुए ही दूसरे देश पर हमले करेंगे. ऐसे में ये सोचना कि चीन का जे 20 या जे 35 सुखोई 57 से बेहतर है या नहीं, इसका प्रश्न ही नहीं उठता. चीन के जे 35 के बारे में जरूर ये कहा जाता है कि ये पूरी तरह स्टेल्थ है, पर यह किसी दूसरे देश को चीन ने बेचा नहीं है. दूसरा इसने कोई ऑपरेशन भी नहीं किया है. जे 20 पर तो प्रश्नचिन्ह है ही. ऐसे में सुखोई 57 भारत के लिए सबसे बेहतर है. कम से कम इसने ऑपरेशन तो किए हैं. साथ ही इसकी ताकत और कमजोरियां हमें पता हैं.

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आखिर में जब मेजर जनरल से पूछा गया कि क्या सुखोई 57 की डील राष्ट्रपति पुतिन के साथ होने वाली पीएम मोदी की बैठक में हो जाएगी तो मेजर जनरल ने कहा कि संभावना तो पूरी है. हालांकि, घोषणा के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता कि कल कोई घोषणा होगी या नहीं. पर इतना तय है कि कल सहमति बन सकती है. उन्होंने कहा कि भारत 1 से 2 सुखोई 57 स्क्वाड्रन की डील कर सकता है. इसके साथ ही एस 400 के तीन और स्क्वाड्न या एस 500 को लेकर भी सहमति बन सकती है. रूस टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए पहले से तैयार है. ऐसे में दोनों देशों को कल की बातचीत में सिर्फ इस बात का हल निकालना है कि अमेरिका इस खरीद में कोई टांग ना अड़ाए. अमेरिका काट्सा कानून के जरिए भारत पर सैंक्शंस लगा सकता है. अगर इस बात का कोई हल निकल जाता है तो फिर डील हो सकती है.
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