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कांग्रेस में सफल तो बीजेपी में फेल क्यों हो जाती है बगावत, क्या कहता है राजनीति में विद्रोह का इतिहास

इन दिनों टीएमसी और शरद पवार की एनसीपी के कांग्रेस में विलय की चर्चा तेज है. लेकिन इन दलों ने इस संभावना से इनकार किया है. लेकिन चर्चाएं रुकने का नाम नहीं ले रही है. भारत में कांग्रेस और बीजेपी में हुई बगावतों की चर्चा कर रहे हैं संकल्प श्रीवास्तव.

कांग्रेस में सफल तो बीजेपी में फेल क्यों हो जाती है बगावत, क्या कहता है राजनीति में विद्रोह का इतिहास
नई दिल्ली:

भारत के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालने से एक पैटर्न सामने आता है. कांग्रेस से अलग होकर कई नेता और गुट बड़ी राजनीतिक ताकत बन गए. वहीं इसके उलट बीजेपी के बागी नेताओं में से ज्यादातर या तो पार्टी में वापस आ गए या राजनीति के मैदान से गायब हो गए. अटकलों का यह नया दौर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नेता संजय राउत के बयान से शुरू हुआ. उन्होंने सुझाव दिया था कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ विपक्ष को मजबूत करने के लिए नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और तृणमूल कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस में विलय कर लेना चाहिए.

क्यों हो रही है विलय की चर्चा

राउत के बयान के बाद कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी, दोनों ने इस सुझाव को खारिज कर दिया. इसके बाद भी इन बयानों पर अटकलों का दौर बंद नहीं हुआ. इसे बल इसलिए भी मिला क्योंकि शरद पवार की बेटी और सांसद सुप्रिया सुले ने इस विचार को पूरी तरह से खारिज नहीं किया.उन्होंने कहा,''संजय राउत मेरे बड़े भाई जैसे हैं. उन्होंने एक अच्छा सुझाव दिया है. आगे क्या होगा और कैसे होगा, यह तो समय ही बताएगा.''

राजनीतिक दलों का ऐसा विलय क्या संभव है, यह एक सवाल है. लेकिन इस बहस ने भारत की दो मुख्य राष्ट्रीय पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस की ओर ध्यान खींचा है. इन दोनों दलों ने अपनी स्थापना के बाद कई बार बगावत देखी है. कांग्रेस से निकल कर कई बार अलग गुट बने हैं. ये गुट आगे चलकर प्रभावशाली क्षेत्रीय दल और राजनीतिक शक्ति बने हैं. वहीं बीजेपी के बागी नेताओं को अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. ऐसे नेता पार्टी से निकलने के कुछ समय बाद वो या तो वापस पार्टी में लौट आते हैं या राजनीति के बियाबान में खो जाते हैं. 

कांग्रेस, जो ​बंटवारे से ही बनी है 

भारत में बहुत कम राजनीतिक दल हैं, जिन्होंने कांग्रेस जितनी बगावत देखी हो. आजादी के आंदोलन के दौरान बनी कांग्रेस ने विचारधारा में मतभेद, नेतृत्व की लड़ाई, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और आपसी झगड़ों की वजह से कई विभाजन देखे हैं. कांग्रेस से निकले कुछ गुट या नेता जल्द ही राजनीति के मैदान से गायब हो गए तो कुछ ने राज्यों का राजनीतिक नक्शा ही बदलकर रख दिया.

इनमें से सबसे शुरुआती और लंबे समय तक टिके रहने वाली 'केरल कांग्रेस' थी. इसे 1964 में केरल में कांग्रेस से निकले केएम जॉर्ज ने बनाई थी. इस बगावत की जड़ 1963 का एक विवाद था. दरअसल उस समय के मुख्यमंत्री आर शंकर ने गृह मंत्री पीटी चाको को अपनी कैबिनेट से हटा दिया था. चाको का 1964 में निधन हो गया. इसके बाद उनके सहयोगियों ने केएम जॉर्ज के नेतृत्व में अविश्वास प्रस्ताव लाकर शंकर की सरकार गिरा दी थी. आज छह दशक बीत जाने के बाद भी केरल कांग्रेस केरल की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बनी हुई है. मई में हुए विधानसभा चुनाव में उसने सात सीटें जीती हैं.  

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आज कांग्रेस का जो नाम है, वह इंदिरा गांधी की बगावत की देन है.

कांग्रेस में इंदिरा गांधी का विद्रोह

इसे कांग्रेस में हुआ सबसे ऐतिहासिक बंटवारा कहा जाता है. यह 1969 में हुआ था. उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस 'सिंडिकेट' के नाम से मशहूर गुट में जबरदस्त टकराव हुआ था. इस वजह से पार्टी में टूट भी हुई थी. लोकसभा में कांग्रेस के 220 सांसद इंदिरा गांधी के साथ आ गए थे. वहीं 'कांग्रेस (ओ)' के नाम से मशहूर इंदिरा विरोधी गुट के साथ 68 सांसद थे. कांग्रेस (ओ) में ओ से आशय 'ऑर्गनाइजेशन' से था. इंदिरा गांधी का गुट 'कांग्रेस (आर)' बना. यहां 'आर' का मतलब शुरू में 'रिक्विजिशनिस्ट्स' था. इंदिरा गांधी ने 1978 में 'इंडियन नेशनल कांग्रेस (आई)' का गठन किया. इंदिरा गुट ने 'हाथ के पंजे ' को अपना चुनाव चिन्ह चुना. यह निशान आज भी कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है. चुनाव आयोग ने 1981 में कांग्रेस (आई) को ही असली 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' के रूप में मान्यता दे दी थी.

कांग्रेस से निकली क्षेत्रीय पार्टियों का उदय

कांग्रेस से अलग हुए कई गुट खत्म हो गए, लेकिन कुछ गुट बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरे. इसका सबसे सफल उदाहरण 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' है. कांग्रेस नेतृत्व से नाराज होकर ममता बनर्जी ने 1998 में यह पार्टी बनाई थी. उनका मानना ​​था कि कांग्रेस 'लेफ्ट फ्रंट' के प्रति बहुत नरम रवैया अपना रही थी, जिसका बंगाल की राजनीति पर दशकों से दबदबा था. ममता की इस बगावत ने भारत में वामपंथ की सबसे पुरानी सरकार को उखाड़कर फेंक दिया था. 

ममता की बगावत के एक साल बाद कांग्रेस में सोनिया गांधी के विदेशी मूल को लेकर एक बगावत हुई. साल 1999 में शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली. अब करीब 25 साल बाद एनसीपी भी दो हिस्से में टूट चुकी है. लेकिन यह पार्टी आज भी महाराष्ट्र की राजनीति की एक ताकत बनी हुई है.

TMC, Mamata Banerjee

1990 के दशक में कांग्रेस में बगावत कर ममता बनर्जी ने तृणणूल कांग्रेस का गठन किया था.

आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी का विद्रोह

आंध्र प्रदेश में कांग्रेस वाईएस राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में 2004 में सत्ता में लौटी. लेकिन 2009 में उनकी मौत के बाद, उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हो गई. उनके बेटे वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने पिता की राजनीतिक विरासत पर दावा ठोका. लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने के रोसैया को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया. इससे नाराज जगन मोहन रेड्डी 2010 में कांग्रेस से अलग हो गए. उन्होंने 2011 में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी का गठन किया. जगन का यह दांव बहुत कामयाब रहा. उनकी पार्टी ने 2019 के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर सरकार बनाई और आंध्र प्रदेश की राजनीति में खुद को एक राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित किया. आज प्रदेश में अपना अस्तित्व बचाने के लिए कांग्रेस वाईएसआर कांग्रेस पार्टी से गठबंधन करने की तैयारी में है. 

पुडुचेरी में भी कुछ ऐसी ही कहानी देखने को मिली. वहां 2008 में मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद रंगासामी ने कांग्रेस से नाराज होकर 2011 के विधानसभा चुनाव से पहले ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस का गठन किया. उनकी यह पार्टी आगे चलकर एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन गई. वह पुडुचेरी की सत्ता में भी रही.

कांग्रेस से अलग हुए नेता और गुट अक्सर अपनी स्वतंत्र पहचान, क्षेत्रीय प्रभाव और चुनावी ताकत की बदौलत मजबूत संगठन बन गए. इनमें से कई ने अपना जनाधार भी बढ़ाया. तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को बदल दिया. एनसीपी महाराष्ट्र की गठबंधन राजनीति में अहम बन गई. वाईएसआरसीपी आंध्र प्रदेश की प्रमुख पार्टी के तौर पर उभरी. ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस ने पुडुचेरी में अपनी जगह बनाई.

बीजेपी में कब-कब हुई बगावत 

बीजेपी में बगावत का इतिहास एक अलग ही तस्वीर पेश करता है. बीजेपी में इस तरह की टूट की शुरुआत भारतीय जनसंघ से हुई, जिसका 1977 में जनता पार्टी में विलय हो गया था. बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था. कांग्रेस के उलट बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम बड़े विभाजन हुए. राजनीतिक विश्लेषक इसकी दो वजहें बताते हैं- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा मजबूत वैचारिक ढांचा और केंद्रित नेतृत्व का ढांचा, खासकर 2014 के बाद.

बीजेपी से अलग होने वाले अधिकांश गुट राष्ट्रीय स्तर के बजाय राज्य-स्तर के रहे हैं. ये गुट आम तौर पर लीडरशिप के झगड़ों, गुटबाजी या टिकट बंटवारे को लेकर मतभेदों की वजह से बने हैं. लेकिन इनके राजनीति की पिच पर टिके रहने का रिकॉर्ड काफी कमजोर है. इसका सबसे ताजा उदाहरण जल्द ही तमिलनाडु में देखने को मिल सकता है. वहां आईपीएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए के अन्नामलाई बीजेपी छोड़ने के बाद एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल बनाने की कोशिशों में जुटे हैं. बीजेपी ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष तक की जिम्मेदारी सौंपी थी.

BJP, Kalyan Singh

कल्याण सिंह कभी राम मंदिर आंदोलन का चेहरा हुआ करते थे, लेकिन पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से तनातनी की वजह से उन्होंने दो बार बीजेपी छोड़ी.

बीजेपी में हुए बड़े विद्रोहों में से एक गुजरात में हुआ था. वहां 1996 में बीजेपी के वरिष्ठ नेता शंकर सिंह वाघेला ने राष्ट्रीय जनता पार्टी का गठन किया था. यह विद्रोह लीडरशिप को लेकर पैदा हुए मतभेदों की वजह से हुआ था. वाघेला ने केशूभाई पटेल को मुख्यमंत्री बनाए जाने का विरोध किया था. इसके बाद राजनीतिक संकट पैदा हो गया. कई विधायकों ने वाघेला का समर्थन किया, लेकिन बीजेपी ने वाघेला को आगे बढ़ाने के बजाय केशूभाई पटेल की जगह सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बना दिया.

इसके बाद वाघेला ने कांग्रेस के समर्थन से अपनी पार्टी बनाई और गुजरात के बारहवें मुख्यमंत्री बने. यह प्रयोग मुश्किल से एक साल तक चला. आखिरकार वाघेला ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया. हालांकि कांग्रेस से उनका साथ भी लंबा नहीं चला. साल 2017 में राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस नेता अहमद पटेल के खिलाफ क्रॉस वोटिंग कर उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 'जन विकल्प मोर्चा' का गठन किया. 

जब बगावत पर उतर आए थे कल्याण सिंह 

बीजेपी में एक और बड़ी बगवात कभी हिंदुत्व का चेहरा रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के नेतृत्व में हुई थी. राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरा और छह दिसंबर 1992 को हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह 1997 के विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने के बाद बीजेपी के अंदरूनी झगड़ों में फंस गए. बीजेपी से निकलने के बाद उन्होंने 1999 में 'राष्ट्रीय क्रांति पार्टी' का गठन किया. हिंदुत्व के एजेंडे पर बनी इस पार्टी ने 2002 के विधानसभा चुनाव में चार सीटें जीतीं और समाजवादी पार्टी के साथ विपक्ष में बैठी. कल्याण सिंह 2004 में फिर से बीजेपी में शामिल हो गए. उन्होंने 2009 में एक बार फिर बगावत करते हुए 'जन क्रांति पार्टी' का गठन किया. यह कोशिश भी तब खत्म हो गई जब 2013 में 'जन क्रांति पार्टी' का BJP में विलय हो गया.

मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने भी बीजेपी से अलग होकर 2006 में 'भारतीय जनशक्ति पार्टी' का गठन किया था. साल 2008 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी पांच सीटें जीतने में कामयाब रही थी. उमा भारती ने सात जून 2011 को भारतीय जनशक्ति पार्टी का बीजेपी में विलय कर लिया था.वहीं गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल ने 2012 में 'गुजरात परिवर्तन पार्टी' नाम से अपना राजनीतिक दल बनाया. लेकिन उनकी पार्टी को लोगों का अधिक समर्थन नहीं मिला.इसके बाद 2014 में वो फिर बीजेपी में लौट आए.

बीजेपी को दक्षिण में भी बगावत का सामना करना पड़ा था. कर्नाटक में वहां के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने 2011 में बीजेपी छोड़कर 'कर्नाटक जनता पक्ष' का गठन किया. साल 2013 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने लिंगायत वोट बैंक में सेंध लगाते हुए छह सीटें जीत ली थीं. इसका घाटा बीजेपी को हुआ. साल 2008 के विधानसभा चुनाव में 110 सीटें जीतने वाली बीजेपी 40 सीटों पर सिमट गई थी. येदियुरप्पा बहुत दिन तक बीजेपी से अलग नहीं रह सके. वो जनवरी 2014 में अपनी पार्टी को भंग कर बीजेपी में लौट गए. 

BJP, Jharkhand, Yashwant Sinha

यशवंत सिन्हा ने भी बीजेपी छोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाई थी, जो सफल नहीं रही.

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने 2018 में 'भारतीय सब लोग पार्टी' का गठन किया था. उनकी पार्टी ने 2020 के झारखंड विधानसभा के चुनाव में 30 सीटों पर चुनाव लड़ा. लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई. उनकी पार्टी का 2022 में लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) में विलय हो गया था.

कांग्रेस और बीजेपी में हुई बगावतों का अंतर 

कांग्रेस और बीजेपी से अलग होकर बनी पार्टियों के बीच का अंतर ऐसा है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. कांग्रेस से निकली कई पार्टियों ने अपनी पहचान और राज्यों में सरकार के साथ-साथ अपना टिकाऊ चुनावी आधार तैयार किया. वहीं बीजेपी से अलग हुई पार्टियों को काफी संघर्ष करना पड़ा. लेकिन स्थायी रूप से उन्हें हासिल कुछ नहीं हुआ. बीजेपी से निकलकर बनी कई पार्टियों को चुनावी तौर पर बहुत कम सफलता मिली. कई पार्टियां अपना वजूद नहीं बना पाईं और कुछ कई साल बाद फिर बीजेपी में मिल गईं. 

विलय में रुकावटें क्या क्या आती हैं 

पिछले दो-तीन दशक में, जिन बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों ने राज्यों में सरकार चलाई है या सरकार में शामिल रही हैं, उन्होंने अपनी स्वतंत्र पहचान को छोड़ने में दिलचस्पी नहीं दिखाई. विलय कर देने से इन पार्टियों के नेताओं की मोल-भाव करने की क्षमता, पहचान और संगठनात्मक नियंत्रण काफी कम हो जाता है. आज जिसे आम तौर पर 'विलय' कहा जाता है, वह अक्सर कुछ और ही होता है यानी अलग-अलग सांसद, विधायक या गुट राजनीतिक अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए पाला बदल लेते हैं. पूरी तरह से संस्थागत विलय बहुत कम होता है. इसका एक बड़ा उदाहरण 2011 में देखने को मिला था, जब अभिनेता से नेता बने आंध्र प्रदेश के चिरंजीवी की प्रजा राज्यम पार्टी का कांग्रेस में विलय हुआ था. प्रजा राज्यम की पकड़ कमजोर हो रही थी. उसे स्वतंत्र रूप से बने रहने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था. वहीं आंध्र प्रदेश में अपनी सरकार की स्थिरता के लिए कांग्रेस को और विधायकों के समर्थन की जरूरत थी. इस विलय से दोनों पक्षों के तात्कालिक लाभ मिला. 

लेकिन आज स्थितियां वैसी नहीं हैं. तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी और अन्य जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के पास अपना वोट बैंक है, अलग राजनीतिक पहचान और मजबूत संगठनात्मक ढांचा है. इनमें से कई के लिए कांग्रेस में विलय का मतलब होगा अपनी पहचान, वोट बैंक और संगठन को छोड़ देना, जिन्हें उन्होंने सालों की स्वतंत्र राजनीति और कड़ी मेहनत से इकट्ठा किया है. यही वजह है कि विपक्ष को एकजुट करने के लिए ऐसे विलय के लिए उठने वाली मांग को लेकर राजनीतिक दल उत्सुकता नहीं दिखाते हैं. इसका इतिहास भी कम ही है. 

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संकल्प श्रीवास्तव
Deputy Executive Producer
With over a decade of experience in Indian television journalism and media research, currently serving as Deputy Executive Producer at NDTV, leading t... और पढ़ें
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