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रामलला के लिए नए डिजाइनर मनीष त्रिपाठी, जानिए ये कौन हैं?

डिजाइनर मनीष त्रिपाठी ने NDTV को बताया कि रामनवमी या दीपावली जैसे विशेष उत्सवों पर प्रभु पीतांबर धारण करते हैं. इन वस्त्रों में देश के अलग-अलग राज्यों के हैंडलूम, हस्तकरघा और पारंपरिक कढ़ाई-छपाई का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.

रामलला के लिए नए डिजाइनर मनीष त्रिपाठी, जानिए ये कौन हैं?
मनीष त्रिपाठी राम लला का परिधान करेंगे डिजाइन
नई दिल्ली:

डिजाइनर मनीष त्रिपाठी एक बार फिर चर्चाओं में हैं. इस बार वो रामलला के परिधानों को लेकर सुर्खियां बटोर रहे हैं. अयोध्या के भव्य मंदिर में रामलला के वस्त्रों को जिस बारीकी और भक्ति भाव से तैयार किया जा रहा है, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. रामनवमी के पावन अवसर पर प्रभु किस स्वरूप में दर्शन देंगे, ये भी सभी की जिज्ञासा है. आपको बता दें कि मनीष त्रिपाठी भारतीय क्रिकेट टीम की जर्सी और अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला के मिशन बैज को भी डिजाइन कर अपनी रचनात्मकता का पहले ही लोहा मनवा चुके हैं. अब उन्हें रामलला का परिधान तैयार करने का मौका मिला है. इसे लेकर NDTV ने डिजाइनर मनीष त्रिपाठी ने बातचीत की. 

मनीष त्रिपाठी के अनुसार, प्राण प्रतिष्ठा के बाद यह संकल्प लिया गया था कि प्रभु रामलला केवल भारतीय पारंपरिक परिधान ही धारण करेंगे. मंदिर में भगवान के वस्त्रों के लिए दिनों के आधार पर और हर दिन के हिसाब से सोमवार को सफेद, मंगल वार को लाल,  बुद्धवार को हरा, बृहस्पति को पीला, शुक्रवार को क्रीम, शनिवार को नीला, और रविवार को गुलाबी पहनते हैं.. इन रंगों के आधार पर ही रामलला पोशाक पहनते हैं.

डिजाइनर मनीष त्रिपाठी ने NDTV को बताया कि रामनवमी या दीपावली जैसे विशेष उत्सवों पर प्रभु पीतांबर धारण करते हैं. इन वस्त्रों में देश के अलग-अलग राज्यों के हैंडलूम, हस्तकरघा और पारंपरिक कढ़ाई-छपाई का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.एक डिजाइनर के तौर पर इस अनुभव को मनीष त्रिपाठी एक 'चुनौती' नहीं बल्कि 'ईश्वरीय सेवा' मानते हैं. उनका कहना है कि मैं केवल एक निमित्त मात्र हूँ, जिसे भगवान ने इस सेवा के लिए चुना है. मेरा प्रयास है कि मैं अपनी कला के माध्यम से देश की सांस्कृतिक पहचान और धरोहर को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत कर सकूं. 

​पश्चिमी प्रभाव पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने कहा कि भारत का डिजाइन बैंक दुनिया में सबसे पुराना है. जब 1800 के दशक में यूरोपीय देश कपड़ों को रंगना सीख रहे थे, तब भारत से नील यानी Indigo  का निर्यात हो रहा था. पारंपरिक बुनाई और आधुनिकता के मेल पर मनीष ने बताया कि जनजातीय कार्य मंत्रालय के तहत 'रीसा' जैसे ब्रांड्स के माध्यम से भारतीय ट्राइब फेस्ट की कला को आधुनिक ट्रेंड के अनुसार ढाला जा रहा है.

वे कहते हैं कि हमारे बुनकर केवल मजदूर नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति के असली संरक्षक हैं. आज बुनकरों को केवल मानदेय नहीं, बल्कि कार्यों में सक्रिय सहभागिता मिल रही है. यह वही लोग हैं जिन्होंने सदियों से हमारी पूजा-पाठ की संस्कृति और कला को जीवित रखा है. आज मौका है कि आधुनिकता के साथ हम उनकी इस विरासत को पूरी दुनिया को दिखाएं. 

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