हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को गृहमंत्री अमित शाह ने पुणे में लोकमान्य तिलक पुरस्कार से नवाजा. डोभाल को ये सम्मान देश के रक्षा कवच निर्माण में उनके योगदान के लिए दिया गया. डोभाल ने देश के दुश्मनों को नेस्तनाबूद करने के लिये कई ऑपरेशन चलाए जिनमें से अनेक सफल हुए. ऐसे ही एक ऑपरेशन की रणनीति बनाये जाते वक्त मुंबई पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया था.
जब मुंबई पुलिस ने डोभाल को पकड़ा
बात 11 जुलाई 2005 की है. इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के निदेशक पद से कुछ वक्त पहले रिटायर हुए अजीत डोभाल उस दोपहर दिल्ली के बारह खंभा रोड स्थित एक होटल में दो लोगों के साथ मीटिंग कर रहे थे. अचानक सादे कपडों में करीब मुंबई पुलिस के आधा दर्जन पुलिसकर्मी वहां छापा मारते हैं और डोभाल समेत तीनों लोगों को हिरासत में ले लेते हैं. कुछ देर तक डोभाल और मुंबई पुलिस के उन अफसरों के बीच कहासुनी होती है. इसके बाद जब डोभाल मुंबई पुलिस की तत्कालीन ज्वाइंट कमिश्नर मीरा बोरवणकर से फोन पर बात करके अपना परिचय देते हैं तो उन्हें छोड दिया जाता है. लेकिन उनके साथ मौजूद दोनों शख्स को मुंबई पुलिस अपने साथ ले जाती है.
दाऊद को मारने का मिशन हो गया फेल
डोभाल के लिये ये एक बडा झटका था क्योंकि मुंबई पुलिस की ओर से अचानक की गयी इस कार्रवाई की वजह से उनका एक ऑपरेशन शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया. ये कोई छोटा-मोटा ऑपरेशन नहीं था. ये ऑपरेशन था अंडरवर्लड डॉन और आतंकवादी दाऊद इब्राहिम को कराची में उसके घर में घुसकर मारने का.
क्या था प्लान?
हिंदी की ये कहावत की 'दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त होता है,' खुफिया जगत में काम करने वालों के लिये सबसे बडा मंत्र है. दाऊद भारत का दुश्मन है और दाऊद का दुश्मन छोटा राजन है. वो छोटा राजन जो करीब दो दशक तक दाऊद का दाहिना हाथ बनकर रहा और फिर 1994 से उसका जानी दुश्मन बन गया. ऐसे में भारतीय खुफिया एजेंसियों के लिए दाऊद को खत्म करने की खातिर छोटा राजन से बेहतर स्रोत कौन हो सकता था? दाऊद को खत्म करने के लिये भारतीय एजेंसियों ने छोटा राजन गिरोह से हाथ मिलाया क्योंकि दोनों का टारगेट एक ही था.
उस दोपहर दिल्ली के बारह खंभा रोड पर डोभाल जिन दो लोगों के साथ मीटिंग कर रहे थे उनके नाम थे फरीद तनाशा और विकी मल्होत्रा. तनाशा और मल्होत्रा छोटा राजन के पुराने साथी थे और दाऊद गिरोह के बारे में अच्छी-खासी जानकारी रखते थे. तब ऑस्ट्रेलिया में रह रहे छोटा राजन की मंजूरी से दोनों अजीत डोभाल से मिले. 23 जुलाई 2005 को कराची में दाऊद की बेटी महारूख की शादी पाकिस्तानी क्रिकेटर जावेद मियांदाद के बेटे जुनैद से होनी थी. शादी के जलसे में ही दाऊद का काम तमाम करने की योजना तनाशा और मल्होत्रा की मदद से डोभाल बना रहे थे. मुंबई पुलिस की एंट्री ने लेकिन उनकी योजना पर पानी फेर दिया.
मुंबई पुलिस कैसे पहुंची?
दरअसल विकी मल्होत्रा और फरीद तनाशा बडे हिस्ट्रीशीटर भी थे. उनपर मुंबई में जबरन उगाही, हत्या और हत्या की कोशिश के तमाम मामले दर्ज थे और पुलिस उनकी तलाश कर रही थी. विशेषकर दिल्ली की मीटिंग से कुछ दिनों पहले वे कोलकाता और दिल्ली के नंबरों से मुंबई के एक बडे बिल्डर को जबरन उगाही के लिये धमका रहे थे. उस बिल्डर की शिकायत पर मुंबई क्राइम ब्रांच ने तनाशा और मल्होत्रा के फोन सुनने शुरू किये जिसके आधार पर पता चला कि वे दिल्ली में किसी के साथ मीटिंग करने वाले हैं. इसी जानकारी के आधार पर मुंबई क्राइम ब्रांच के डीसीपी धनंजय कमलाकर और इंस्पेक्टर दिलीप सावंत की अगुवाई में पुलिस की एक टीम दिल्ली पहुंची और दोनों को गिरफ्तार कर लिया. चूंकि अजीत डोभाल भी उनके साथ मौजूद थे इसलिये गलतफहमी की वजह से उन्हें भी गैंगस्टर समझ कर पकड लिया.
तनाशा और मल्होत्रा की मकोका कानून के तहत गिरफ्तारी हुई लेकिन चंद साल बाद दोनों जमानत पर बाहर आ गए. साल 2005 में तनाशा की मुंबई के चेंबूर इलाके में हत्या हो गयी जबकि मल्होत्रा लापता हो गया. ये एक बडी मिसाल थी कि किस तरह से दो एजेंसियों के बीच आपसी तालमेल न होने के कारण दाऊद को खत्म करने के मिशन पर अमल नहीं हो सका.
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