प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में एनडीए की दूसरी सरकार आने के कुछ महीनों बाद 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और धारा 35A को खत्म कर दिया गया. यह भारतीय राजनीति के इतिहास में सबसे सीक्रेट रणनीतिक मिशन में से एक था. इस पूरे मिशन की जानकारी पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल समेत कुछ चुनिंदा अफसरों तक ही सीमित रखी गई. किसी को कानोंकान खबर नहीं लगी कि सरकार इतने बड़े मिशन को अंजाम देने वाली है. आइए उन सात अफसरों के बारे में जानिए....
1. एनएसए अजीत डोभाल कुशल रणनीतिकार
अनुच्छेद 370 हटाने फैसले से पहले और तुरंत बाद अजीत डोभाल ने खुद श्रीनगर में मोर्चा संभाला. उन्होंने स्थानीय अफसरों, सुरक्षाबलों के साथ समन्वय बनाकर कश्मीर में हालात को शांतिपूर्ण रखा. वो कई हफ्तों तक घाटी में रहे. केरल कैडर के 1968 बैच के IPS इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के पूर्व निदेशक रहे हैं. डोभाल भारत के सबसे तेजतर्रार खुफिया और राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों में शुमार हैं. उन्हें मिजोरम, पंजाब और पूर्वोत्तर में उग्रवाद के खिलाफ अभियान और 1999 के कंधार विमान अपहरण में मुख्य वार्ताकार जैसी चुनौतियां पूरी कीं.
2. बीवीआर सुब्रह्मण्यम: तत्कालीन मुख्य सचिव, जम्मू-कश्मीर
जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्य सचिव बीवीआर सुब्रह्मण्यम थे. उनके पास प्रशासनिक कमान और ऑपरेशन को जमीनी स्तर पर उतारने की जिम्मेदारी थी. 1987 बैच के IAS अफसर सुब्रह्मण्यम को खासतौर पर इस मिशन के लिए जम्मू-कश्मीर भेजा गया था. उन्होंने स्थानीय पुलिस, प्रशासन और केंद्रीय एजेंसियों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी बखूबी निभाई. बीवी आर सुब्रह्मण्यम छत्तीसगढ़ कैडर के 1987 बैच के अफसर हैं. वो पहले प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) में मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी दोनों टीम में काम कर चुके थे. छत्तीसगढ़ में अपर मुख्य सचिव (गृह) रहते हुए नक्सल विरोधी अभियानों और प्रशासनिक सुधारों में अहम भूमिका निभाई. उन्हें धारा 370 हटाने से ठीक एक साल पहले जून 2018 में खास तौर पर जम्मू-कश्मीर का मुख्य सचिव बनाकर भेजा गया था. उन्होंने फैसले के वक्त प्रशासन, नागरिक सुरक्षा और संचार समन्वय को बखूबी पूरा किया.

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3. राजीव गौबा: तत्कालीन गृह सचिव
तत्कालीन केंद्रीय गृह सचिव राजीव गौबा के पास केंद्र और जम्मू-कश्मीर के बीच प्रशासनिक संवाद और गृह मंत्रालय के समन्वय की भूमिका निभाई. केंद्रीय गृह मंत्रालय के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर उन्होंने बिल के मसौदे और अतिरिक्त सुरक्षाबलों की त्वरित तैनाती की निगरानी की. झारखंड कैडर के 1982 बैच के अफसर कुशल प्रशासनिक नेतृत्व दक्षता और क्राइसिस मैनेजमेंट में माहिर हैं. केंद्रीय गृह सचिव के रूप में उन्होंने धारा 370 में गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में विधायी और प्रशासनिक ड्राफ्ट की सीधे निगरानी की. अर्धसैनिक बलों (CRPF, BSF) की तैनाती और मंत्रालयों के बीच समन्वय किया. वो कैबिनेट सचिव भी रहे.
4. केके वेणुगोपाल: तत्कालीन अटॉर्नी जनरल
तत्कालीन अटॉर्नी जनरल के तौर पर केके वेणुगोपाल ने अनुच्छेद 370 को हटाने से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों की कानूनी समीक्षा और ड्राफ्टिंग की ताकि अदालती या किसी अन्य कसौटी पर उसे खरा उतारा जा सके. गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय की कोर टीम ने अटॉर्नी जनरल के साथ मिलकर संवैधानिक बारीकियों को परखा. सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में इस पर मुहर लगाई. केके वेणुगोपाल वरिष्ठ अधिवक्ता और संवैधानिक विशेषज्ञ हैं. उन्हें 2017 में भारत का अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया गया था. सुप्रीम कोर्ट में भी इस फैसले के बचाव की उन्होंने जोरदार पैरवी की.
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5. के विजय कुमार: राज्यपाल के सलाहकार
तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार ने ग्राउंड पर 24/7 सुरक्षा समीक्षा की जिम्मेदारी संभाली. पूर्व IPS अफसर के विजय कुमार ने राज्यपाल सत्यपाल मलिक के सलाहकार के तौर पर सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती का ब्लूप्रिंट तैयार किया. के. विजय कुमार देश के जांबाज पुलिस अधिकारियों में से एक हैं. वो 2004 में चंदन तस्कर वीरप्पन को ढेर करने वाले ऑपरेशन ककून के चीफ थे. CRPF महानिदेशक और गृह मंत्रालय में नक्सल विरोधी मामलों में वो सलाहकार रहे हैं.
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6. दिलबाग सिंह तत्कालीन डीजीपी
दिलबाग सिंह उस वक्त जम्मू-कश्मीर के पुलिस महानिदेशक थे. उन्होंने स्थानीय पुलिसबलों की कमान संभाली. संदिग्धों पर नजर, अराजकतत्वों पर अंकुश के साथ किसी भी हिंसक गतिविधि को नाकाम करने के लिए सेना और अर्धसैनिक बलों के साथ पुलिस ने बड़ी भूमिका निभाई. कश्मीर में धारा 144 लागू कराने और हालात नियंत्रण में रखने का काम किया. दिलबाग सिंह ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में दशकों तक काम किया था और उन्हें स्थानीय खुफिया जानकारी और पुलिस बल का गहरा अनुभव था. स्थानीय नेताओं को नजरबंद करने, धारा 144 लागू करने और संवेदनशील इलाकों में जम्मू-कश्मीर पुलिस की कमान संभाली.
7. आलोक श्रीवास्तव- तत्कालीन कानून सचिव
तत्कालीन कानून सचिव और मध्य प्रदेश कैडर के 1984 बैच के अफसर आलोक श्रीवास्तव ने अटॉर्नी जनरल के साथ इस संवैधानिक संशोधन के बिल को तैयार करने में दिन रात एक किया.न्याय विभाग और कानून मंत्रालय में लंबे समय तक रहे उन्होंने जटिल विधायी सुधारों पर काम किया.कानून सचिव के तौर पर उन्होंने गृह मंत्रालय के साथ जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 और राष्ट्रपति के आदेश के दस्तावेज और ड्राफ्टिंग को अंतिम रूप दिया. गोपनीय तरीके से ड्राफ्टिंग और कानूनी भाषा लिखने की जिम्मेदारी उन पर थी.
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संविधान में सीधे संशोधन करने के बजाय राष्ट्रपति के अध्यादेश के जरिये अनुच्छेद 367 में संशोधन किया गया. जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा शब्द की व्याख्या 'विधानसभा' के तौर पर की गई.जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन के कारण विधानसभा के अधिकार संसद के पास आ गए.सरकार ने राष्ट्रपति के आदेश के बाद संसद से बड़े ही सुनोयिजित ढंग से ये प्रस्ताव पास करा लिया.
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