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This Article is From Jan 05, 2026

अब जनरल कैटेगरी में भी कंपीट कर पाएंगे SC-ST-OBC के कैंडिडेट, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से क्या बदलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने ओपेन कैटेगरी में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को नौकरी देने पर जो फैसला सुनाया है, वह क्या कहता है. क्या बदल रहा है सुप्रीम कोर्ट का रुख.

अब जनरल कैटेगरी में भी कंपीट कर पाएंगे SC-ST-OBC के कैंडिडेट, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से क्या बदलेगा
नई दिल्ली:

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने एक अहम फैसला दिया. देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि मेरिट के आधार पर कट ऑफ से अधिक अंक लाने पर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को सामान्य कैटेगरी में चयनित होने से रोका नहीं जा सकता है.  यह फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि अनारक्षित पद सिर्फ मेरिट के आधार पर भरे जाने चाहिए, चाहें उम्मीदवार किसी भी जाति, वर्ग या पृष्ठभूमि के क्यों न हो. अदालत ने राजस्थान हाई कोर्ट प्रशासन की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया.  सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को ऐतिहासिक माना जा रहा है, यह अब तक के उसके रुख के उलट है.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या कहता है

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह के पीठ ने  27 दिसंबर को यह फैसला सुनाया था. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन की अपील खारिज कर दी. राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन ने 2023 के हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गई थी. हाईकोर्ट ने तब कहा था कि जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और ग्रेड-II क्लर्क के पदों पर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को,ज्यादा अंक लाने के बावजूद,सामान्य सूची से बाहर करना गलत था.सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले की सराहना करते हुए कहा कि उसने खुद की गलती को सुधार कर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की है. 

अदालत ने फैसले में कहा कि अगर आरक्षित वर्ग के किसी उम्मीदवार ने सामान्य वर्ग की कट-ऑफ से ज्यादा अंक हासिल किए हैं, तो उसे सिर्फ उसकी जाति के आधार पर सामान्य सूची से बाहर करना संविधान में दिए गए समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14 और 16) के खिलाफ है.अदालत ने कहा कि कई बार आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार आवेदन करते समय अपना कोटा सिर्फ इसलिए बताते हैं, ताकि नौकरी पाने की संभावना बनी रहे. इसका मतलब यह नहीं कि उनकी मेरिट को नजरअंदाज कर दिया जाए.अदालत ने अपने फैसले में कह कि 'ओपन', 'जनरल' या 'अनारक्षित'श्रेणी के पद किसी भी जाति, वर्ग या लिंग के लिए सुरक्षित नहीं होते. ये सभी के लिए खुले होते हैं. 

आरक्षित वर्ग को दोहरे लाभ की दलील

इस फैसले में अदालत ने उस दलील को भी खारिज कर दिया जिसमें कहा जाता है कि अगर आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार सामान्य सीट पर चुने जाते हैं तो उन्हें 'दोहरा लाभ' मिलता है. कोर्ट ने कहा कि यह सोच गलत और भ्रामक है. अगर इस 'दोहरे लाभ' की दलील को मान लिया जाए, तो इसका मतलब यह होगा कि आरक्षित वर्ग के सबसे योग्य उम्मीदवार भी सिर्फ आरक्षित सीटों तक ही सीमित रह जाएंगे, जो समानता की भावना के खिलाफ है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर गोरखपुर विश्वविद्यालय के विधि विभाग के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर रामनरेश चौधरी कहते हैं कि 1990 से पहले तक सुप्रीम कोर्ट का नजरिया बहुत सकारात्मक रहा है. उनका कहना था कि 1990 से पहले तक सुप्रीम कोर्ट आरक्षण को मौलिक अधिकार से भी अधिक मानता रहा है. वह आरक्षण को आर्टिकल 14 का हिस्सा मानता रहा और उसे उसी रूप में लागू करवाता रहा. लेकिन 1990 के बाद से आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का रुख बदलता रहा है. इन सालों में वह आरक्षण के विरोध में दिखाई देता है. सुप्रीम कोर्ट ने 1997-98 में दिए अपने एक फैसले में तो यहां तक कह दिया कि आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है, उसने आरक्षण को इनेवलिंग प्रोविदन बता दिया था. प्रोफेसर चौधरी कहते हैं कि ओपने कटैगरी में अब तक आरक्षित वर्ग के लोगों को इस आधार पर रोका जाता था कि उन्हें इससे दोहरा लाभ मिलेगा. लेकिन इसके बाद भी आरक्षित वर्ग के लोगों को ओपेन कटैगरी में लिया जाता था, लेकिन बाद से वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने कोई रुलिंग निकालकर उसे बंद कर दिया. लेकिन इस फैसले से अब उस पर रोक लगेगी. 

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले

यह पहला मौका नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है. बीते साल सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में भी कुछ इसी तरह की राय जताई थी.नौ सितंबर को सुनाए फैसले में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा था कि जब तक भर्ती नियमों में स्पष्ट रूप से मना न किया गया हो, आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार जिसने शारीरिक मानकों में छूट ली हो, अगर मेरिट में चयनित होता है तो उसे सामान्य श्रेणी (अनारक्षित) की पोस्ट पर भी नियुक्त किया जा सकता है. यह कहते हुए बेंच ने सामान्य वर्ग के एक उम्मीदवार की याचिका खारिज कर दी थी. याचिका केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के असिस्टेंट कमांडेंट (एक्जीक्यूटिव) भर्ती में एक अंक से चयन चूक जाने वाले अभ्यर्थी ने दायर की थी.

दरअसल 2017 की भर्ती में, अपीलकर्ता (सामान्य वर्ग) को 363 अंक मिले जबकि कटऑफ 364 था. उसने एक एसटी उम्मीदवार की नियुक्ति को चुनौती दी, जिसे 366 अंक मिले थे. उसने सामान्य सीट भरी थी लेकिन शारीरिक मानकों में छूट ली थी. जस्टिस बागची ने अपने फैसले में कहा था कि चूंकि सीआईएसएफ के नियमों में यह स्पष्ट रूप से नहीं लिखा है कि शारीरिक मानकों में छूट लेने पर उम्मीदवार सामान्य वर्ग की सीट पर दावा नहीं कर सकता, इसलिए अपीलकर्ता की दलील खारिज की जाती है.

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