
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत पर 50% रेसिप्रोकल टैरिफ लगा दिए हैं. इसमें 25% बेस टैरिफ और 25% टैरिफ रूस से तेल खरीदने पर लगाया है. साथ ही अमेरिका की तरफ से कई आरोप भी भारत पर लगे हैं, जैसे भारत ने रूस-यूक्रेन वॉर में पुतिन की फाइनेंशियली मदद की है. साथ ही अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल भारत इस कच्चे तेल को खरीदने के लिए करता है. आज हम इस खबर में 10 सवालों के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी करते हैं. आपको अमेरिकी आरोपों में कितनी सच्चाई है, इसके बारे में जानकारी देते हैं.
सवाल 1. क्या भारत ने पुतिन से तेल खरीदकर उन्हें फाइनेंशियली मदद की?
नहीं. भारत ने एक वैश्विक संकट को रोका है. रूस दुनिया के लगभग 10% तेल की आपूर्ति करता है, अगर भारत खरीदना बंद कर दे, तो कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं. तेल का फ्लो बनाए रखकर भारत ने बाज़ारों को स्थिर किया और वैश्विक स्तर पर लोगों की मदद की है. इतना ही नहीं अमेरिकी वित्त मंत्री जेनेट येलेन और दूसरे लोगों ने भारत की इस भूमिका की सराहना की.
सवाल 2. क्या भारत रूसी तेल खरीदने के लिए अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल कर रहा है?
गलत. भारत रूसी तेल के लिए अमेरिकी डॉलर का उपयोग नहीं करता है. खरीदारी तीसरे देशों के व्यापारियों के जरिए की जाती है. वहीं पेमेंट संयुक्त अरब अमीरात दिरहम (AED) जैसी करेंसी में किया जाता है.
सवाल 3. क्या भारत तेल की कालाबाजारी कर रहा है?
कोई कालाबाज़ारी नहीं है. रूसी तेल पर ईरानी या वेनेज़ुएला के तेल की तरह प्रतिबंध नहीं हैं. तेल को पश्चिमी देशों ने मुनाफाखोरी रोकने के लिए बनाई गई प्राइस-सेलिंग सिस्टम के तहत बेचा जाता है. अगर अमेरिका रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाना चाहता, तो उसने प्रतिबंध लगा दिए होते. उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसे बाजार में रूसी तेल की जरूरत है.
सवाल 4. क्या भारत ने मुनाफा कमाने के लिए अचानक रूसी आयात बढ़ा दिया?
नहीं. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 137 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाने के बावजूद, भारत ने अपने नागरिकों के लिए फ्यूल की कीमतें कम की. सरकारी तेल कंपनियों को 21,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ, जबकि सरकार ने मुनाफाखोरी रोकने के लिए एक्सपोर्ट पर टैक्स लगाया. भारत के इंपोर्ट ने वैश्विक स्तर पर महंगाई को रोका.
सवाल 5. क्या भारत रूसी तेल के लिए रिफाइनर हब बन गया है?
नहीं. भारत दशकों से दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर रहा है. कच्चे तेल को रिफाइन करना और ईंधन का निर्यात करना ही वैश्विक व्यवस्था का तरीका है. रूसी कच्चे तेल पर प्रतिबंध लगाने के बाद, यूरोप खुद भारतीय डीजल और जेट ईंधन पर निर्भर हो गया. यह स्थिर होने का प्रोसेस है.
सवाल 6. क्या भारत के रिफाइनर पुतिन के मुनाफे को विदेश भेज रहे हैं?
गलत. लगभग 70% रिफाइंड ईंधन घरेलू मांग को पूरा करने के लिए भारत में ही रहता है. रिलायंस की एक रिफाइनरी साल 2006 से ही एक्सपोर्ट पर फोकस किए हुए है, तब तो ये मामला ही नहीं था. घरेलू स्तर पर इसका इस्तेमाल बढ़ने के साथ ही रिफाइंड ईंधन का एक्सपोर्ट कम हुआ है. कच्चा तेल और उसके बने प्रोडक्ट्स को एक्सचेंज के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं.
सवाल 7. क्या भारत रूस को फंडिंग करते हुए अमेरिकी एक्सपोर्टर्स पर टैरिफ लगा रहा है?
ट्रेड डेफिसिट की बात यहां सही नहीं है. अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और मेक्सिको के साथ कहीं अधिक घाटे में है. भारत का 50 अरब डॉलर का घाटा इसकी तुलना में बहुत कम है. इस बीच, भारत अरबों डॉलर के अमेरिकी विमान, LNG, रक्षा उपकरण और तकनीक खरीद रहा है.
सवाल 8. क्या भारत अमेरिकी डिफेंस का फ्री में फायदा उठा रहा है?
नहीं. भारत GE के साथ जेट इंजन का को-प्रोडक्शन कर रहा है, MQ-9 ड्रोन खरीद रहा है, और QUAD के साथ इंडो पैसिफिक के लिए आगे आ रहा है. भारत एशिया में चीन का सैन्य रूप से मुकाबला करने वाला अकेला देश है.
सवाल 9. क्या यूक्रेन में शांति का रास्ता नई दिल्ली से होकर गुजरना चाहिए?
शांति बलि का बकरा बनाकर नहीं आ सकती. यूरोप अभी भी रूसी गैस खरीदता है और अमेरिका अभी भी रूसी यूरेनियम का आयात करता है. भारत ने जिम्मेदारी से काम किया, वैश्विक नियमों का पालन किया और कीमतों को बढ़ने से रोका है.
सवाल 10. सच्चाई क्या है?
भारत ने रूस को वित्तीय मदद नहीं दी. भारत ने अपने और दुनिया के लिए बाजारों को स्थिर, ईंधन को किफायती और महंगाई को कंट्रोल में रखा है.
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