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सिलंबम क्या है और कौन हैं के. पजानिवेल जिन्होंने पीएम मोदी को खड़े होने पर कर दिया मजबूर

आज राष्ट्रपति भवन में पद्म पुरस्कार समारोह का आयोजन किया. इस समारोह में धर्मेंद्र को मरणोपरांत सम्मानित किया गया. हेमा मालिनी ने धर्मेंद्र की तरफ से ये पुरस्कार लिया. इसी तरह के. पजानिवेल को पद्म पुरस्कार दिया गया.

सिलंबम क्या है और कौन हैं के. पजानिवेल जिन्होंने पीएम मोदी को खड़े होने पर कर दिया मजबूर
के. पजानिवेल के आदर का पीएम मोदी ने उतने ही प्यार से जवाब दिया.
  • के. पजानिवेल को पारंपरिक मार्शल आर्ट सिलंबम में उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया
  • के. पजानिवेल ने सिलंबम के संरक्षण, प्रचार और प्रसार में कई दशकों तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
  • उन्होंने कई छात्रों को नि:शुल्क प्रशिक्षण देकर इस प्राचीन तमिल मार्शल आर्ट को भावी पीढ़ियों तक पहुंचाया है
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पुडुचेरी के सिलंबम विशेषज्ञ के. पजानिवेल को पारंपरिक मार्शल आर्ट में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म श्री से आज सम्मानित किया गया. जब वो पद्म श्री लेने आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मंत्रीमंडल के सहयोगियों के साथ बैठे हुए थे. पजानिवेल पीएम मोदी को देखते ही साष्टांग प्रणाम करने लगे. ये देखते ही तुरंत पीएम मोदी खड़े हो गए और उनको उठाकर उनके हाथ पकड़ लिए. इसके बाद पजानिवेल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की तरफ बढ़े. पहुंचते ही उन्होंने राष्ट्रपति के चरण स्पर्श किए और फिर पद्म श्री को ग्रहण किया. 

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कौन हैं के. पजानिवेल

30 जनवरी 1973 को पुडुचेरी के पूरनंकुप्पम में जन्मे पजानिवेल ने मास्टर राजाराम के मार्गदर्शन में सिलंबम की शुरुआत की. कई दशकों के अपने करियर में उन्होंने भारत और विदेशों में इस प्राचीन तमिल मार्शल आर्ट के संरक्षण, प्रचार और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

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एक कुशल अभ्यासी और समर्पित शिक्षक के रूप में, पजानिवेल ने कई छात्रों को नि:शुल्क प्रशिक्षण दिया है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह पारंपरिक कला भावी पीढ़ियों तक पहुंचती रहे. उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शनों, प्रस्तुतियों और प्रतियोगिताओं के माध्यम से सिलंबम का प्रतिनिधित्व भी किया है.

इससे पहले, के. पजानिवेल को 2023 में मार्शल आर्ट्स के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उनके अन्य सम्मानों में 2012 में पुडुचेरी सरकार द्वारा दिया गया कलाइमामणि पुरस्कार, 2004 में नेहरू युवा केंद्र द्वारा दिया गया सर्वश्रेष्ठ युवा पुरस्कार और 2002 में दिया गया सिलंबम अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार शामिल हैं.

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पद्म श्री सम्मान मिलने पर प्रतिक्रिया देते हुए के. पजानिवेल ने आकाशवाणी को बताया कि वे इस सम्मान को चार दशकों से अधिक समय से तमिल विरासत को विश्व स्तर पर ले जाने के लिए प्रोत्साहन मानते हैं. उन्होंने आगे कहा कि सिलंबम को सरकारी सहयोग से स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए और वे वैश्विक स्तर पर सिलंबम को लोकप्रिय बनाने के लिए अपने सभी प्रयास जारी रखेंगे.

सिलंबम को जान लीजिए

सिलंबम भारत के तमिलनाडु राज्य की एक प्राचीन और पारंपरिक हथियार-आधारित मार्शल आर्ट (युद्ध कला) है. यह दुनिया की सबसे पुरानी मार्शल आर्ट्स में से एक है, जिसकी उत्पत्ति लगभग 5,000 साल पुरानी मानी जाती है. सिलंबम शब्द तमिल भाषा के दो शब्दों सिलम (पहाड़) और बाम (बांस) से मिलकर बना है. इसमें एक विशेष प्रकार की बांस की लचीली छड़ी (लाठी) का उपयोग मुख्य हथियार के रूप में किया जाता है. इसका उल्लेख प्राचीन तमिल संगम साहित्य (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में भी मिलता है. चोल, चेर और पांड्य राजाओं के समय से ही इसका उपयोग आत्मरक्षा और युद्ध के लिए किया जाता रहा है. इसमें लाठी को तेजी से घुमाने, हवा में कलाबाजी दिखाने और बेहद फुर्तीले पैरों की चाल का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी कई तकनीकें जानवरों की चालों, जैसे- सांप, बंदर और बाज (हॉक) से प्रेरित हैं. बांस की लाठी के अलावा, इसमें तलवार, कटार, ढाल और 'अरुवा' (हंसिया) जैसे हथियारों का भी प्रशिक्षण दिया जाता है. स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तमिल राजाओं (जैसे वीरपांडिया कट्टाबोम्मन) ने अंग्रेजों के खिलाफ इसका खुलकर इस्तेमाल किया था. इससे डर कर अंग्रेजों ने 18वीं सदी के अंत में इसके अभ्यास पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था.

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