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चीन के नए निर्यात नियमों से क्या भारत का मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर बिखर जाएगा?

आजादी के बाद भारत और चीन कभी दोस्त नहीं रहे. चीन हमेशा से भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानता रहा है. यही कारण है कि जब भी भारत की ताकत बढ़ती है, सीमा पर भी तनाव साफ दिखाई देने लगता है.

चीन के नए निर्यात नियमों से क्या भारत का मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर बिखर जाएगा?
चीन लगातार ऐसे कदम उठा रहा है कि भारत को उससे नुकसान हो.
  • कोविड महामारी के बाद भारत ने खुद को चीन के विकल्प के रूप में विश्व का अगला मैन्यूफैक्चरिंग हब स्थापित किया है
  • चीन ने इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो क्षेत्रों में महत्वपूर्ण मशीनरी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिए हैं
  • भारत सरकार सप्लाई चेन्स की निर्भरता कम करने के लिए औद्योगिक पार्कों और निवेश योजनाओं पर काम कर रही है
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कोविड महामारी के बाद से, भारत ने चीन के विकल्प के तौर पर खुद को दुनिया के अगले कारखाने के रूप में स्थापित किया है. एप्पल ने भारत में अपने कारोबार का विस्तार किया. सेमीकंडक्टर प्लान्स की घोषणा की गई. नए औद्योगिक पार्कों के वादे किए गए. इस प्रयास के सकारात्मक परिणाम भी मिले. भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 2015 में 8.6 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में सर्वकालिक उच्च स्तर 47 अरब डॉलर तक पहुंच गया. इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को उम्मीद है कि 2026 के अंत तक इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 120 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा.

लेकिन जैसे-जैसे भारत मैन्यूफैक्चरिंग पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है, चीन ने उन सप्लाई चेन्स पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है, जो इन कारखानों को शक्ति देती हैं.

चीन के नए निर्यात नियम

बीजिंग के नए स्टेट काउंसिल डिक्री 834 और 835 इन सामानों के निर्यात को प्रतिबंधित करते हैं. 834 और 835 ने भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटो क्षेत्रों में चिंता पैदा कर दी है. उद्योग जगत के लीडर्स ने चेतावनी दी है कि महत्वपूर्ण मशीनरी और कंपोनेंट्स के निर्यात पर चीन के प्रतिबंध से कारखानों के विस्तार योजनाओं में बाधा आ सकती है, निवेश में देरी हो सकती है और चीनी सप्लाई चेन्स पर भारत की निरंतर निर्भरता उजागर हो सकती है.

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चिंता सीधी है: क्या भारत वास्तव में मैन्यूफैक्चरिंग को बड़े पैमाने पर बढ़ा सकता है, यदि चीन उन कारखानों के निर्माण के लिए आवश्यक टूल्स को नियंत्रित करता है?

प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों के लीडर्स ने कहा कि चीन के नए नियमों से कैपिटल इक्वीपमेंट और महत्वपूर्ण कंपोनेंट के शिपमेंट पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह समझने के लिए चीनी सप्लायर्स के साथ पहले से ही बातचीत चल रही है. घरेलू उद्योग ने भी सरकार से संपर्क किया है और MeitY पर संभावित नकारात्मक प्रभावों के बारे में बताया है.

मगर, समय इससे बुरा नहीं हो सकता था.

चीन ने क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ मैटेरियल और एडवांस टेक्नोलॉजी मैन्यूफैक्चरिंग के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय ऐसे समय में किया है, जब भारत इनके सब्स्टीट्यूट को ढूंढ स्थानीय मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए आक्रामक रूप से प्रयासरत है. 

मोदी सरकार भी तैयारी में

शनिवार को केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार महत्वपूर्ण सप्लाई चेन्स में "कुछ भौगोलिक क्षेत्रों" पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से स्पेसिफिक इनवेस्टमेंट प्रमोशन प्लान तैयार कर रही है. केंद्र सरकार औद्योगिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी बड़ा निवेश कर रही है. 33,660 करोड़ रुपये की भारत औद्योगिक विकास योजना (भव्या) के तहत, सरकार अगले तीन वर्षों में 50 औद्योगिक पार्कों को चालू करने की योजना बना रही है.

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लेकिन, चीन के हालिया कदम से इसे झटका दे सकते हैं.

स्मार्टफोन से लेकर इलेक्ट्रिक वाहनों तक, आधुनिक मैन्यूफैक्चरिंग आज भी चीनी मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और कच्चे माल पर काफी हद तक निर्भर है. अकेले ऑटो सेक्टर में ही, वित्त वर्ष 2025 में भारत के कंपोनेंट आयात का लगभग 26 प्रतिशत चीन से आया था, जिसमें से अधिकांश उच्च मूल्य वाले इलेक्ट्रॉनिक्स थे.

चीन के नए नियमों से सभी क्षेत्रों पर दबाव

कार्स अनलिमिटेड के संस्थापक मुस्तफा सिंगापुरवाला ने कहा, "भारत के ऑटोमोटिव जगत की कहानी को सप्लाई चेन्स में नया रूप दिया जा रहा है, न कि केवल शोरूम में." उन्होंने कहा, "आज की कारों में 3,000 तक चिप्स हो सकते हैं. आपूर्ति कम होने पर न केवल कीमतें बढ़ती हैं, बल्कि लॉन्च में देरी, लंबा इंतजार और सुविधाओं में कमी जैसी समस्याएं भी आती हैं." सिंगापुरवाला ने चेतावनी दी कि बीजिंग के नए नियम अब केवल व्यापार बाधाओं तक सीमित नहीं हैं. उन्होंने कहा, "चीन के नए सप्लाई चेन्स संबंधी फरमानों के तहत अब नियामक कंपनियों और यहां तक ​​कि उनके अधिकारियों को भी चीन से उत्पादन बाहर स्थानांतरित करने पर दंडित कर सकते हैं. यह कोई बातचीत की रणनीति नहीं है. यह एक ढांचागत खतरा है."

इस दबाव का असर पहले से ही सभी क्षेत्रों में महसूस किया जा रहा है.

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एनएक्सटीसीईएलएल मोबिलिटी के सीईओ अतुल विवेक ने कहा कि ये प्रतिबंध इस बात की याद दिलाते हैं कि भारत को मजबूत घरेलू आपूर्तिकर्ता नेटवर्क और लचीली सप्लाई चेन की आवश्यकता है. विवेक ने कहा, "इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र ग्लोबल सप्लाई चेन पर निर्भर है; इसलिए सतत विकास के लिए एक कोऑर्डिनेटेड और बैलेंस्ड रणनीति की आवश्यकता है." उन्होंने आगे कहा कि यदि नीतिगत समर्थन, रसद और रिसर्च क्षमताओं में एक साथ सुधार होता है, तो भारत के पास स्थानीय मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने का अवसर है.

अन्य लोग इसे भारत की मैन्यूफैक्चरिंग महत्वाकांक्षाओं के लिए एक निर्णायक क्षण के रूप में देखते हैं.

एलईडीएक्स टेक्नोलॉजी और एक्सट्रीम मीडिया के प्रबंध निदेशक संकेत रामभिया ने कहा, "किसी एक मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता अब टिकाऊ नहीं है." रामभिया ने कहा कि भारत अब केवल असेंबली आधारित विकास पर निर्भर नहीं रह सकता और उसे गहरे कंपोनेंट इको-सिस्टम और दीर्घकालिक तकनीकी क्षमताएं विकसित करनी होंगी. "घरेलू एक्टिव एलईडी डिस्प्ले बाजार का अनुमान पहले से ही लगभग 2,000 करोड़ रुपये है और यह सालाना 15-20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, जबकि वैश्विक ओईएम और ओडीएम चीन से बाहर विविधीकरण की ओर सक्रिय रूप से अग्रसर हैं. इससे भारत के लिए एक विश्वसनीय मैन्यूफैक्चरिंग विकल्प के रूप में उभरने का एक महत्वपूर्ण अवसर पैदा होता है." उनकी कंपनी ने पहले ही गुजरात में 10,000 वर्ग मीटर की एक्टिव एलईडी डिस्प्ले सुविधा के साथ मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता का विस्तार किया है. उन्होंने कहा कि बड़ा अवसर केवल आयात सब्सीट्यूशन नहीं है, बल्कि भारत को "एक विश्वसनीय ग्लोबल मैन्यूफैक्चरिंग पार्टनर" बनाना है. हालांकि, इसमें समय लगेगा.

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