सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि कोई लिव-इन रिश्ता विवाह की प्रकृति का है और दोनों पक्षों के बीच शादी करने की मंशा थी तो ऐसे मामले में पुरुष के खिलाफ महिला से क्रूरता के आरोप में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि धारा 498A उन लिव-इन रिश्तों पर भी लागू हो सकती है जो शादी जैसे संबंध के रूप में स्थापित हों और जिनमें विवाह करने की इच्छा संबंध का महत्वपूर्ण हिस्सा रही हो. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर लिव-इन संबंध में धारा 498A लागू नहीं होगी. महिला को यह साबित करना होगा कि दोनों पक्षों के बीच शादी करने का इरादा था और उनका संबंध वैवाहिक प्रकृति का था. इसमें दोषी साबित होने पर तीन साल तक की सजा हो सकती है. बता दें कि मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जब कर्नाटक हाईकोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया था. मामले में महिला ने आरोप लगाया था कि युवक ने अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाकर उससे विवाह किया और बाद में उसके साथ दहेज उत्पीड़न, क्रूरता तथा जान से मारने की कोशिश की गई. आरोपी ने दलील दी थी कि कथित दूसरी शादी कानूनी रूप से अमान्य थी इसलिए धारा 498A के तहत उसे पति नहीं माना जा सकता.
अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में दिया है सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू क्रूरता से सुरक्षा देना है और समाज में बदलते संबंधों को देखते हुए कानून की व्याख्या की जानी चाहिए. अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर महिलाओं को सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उनका रिश्ता कानूनी विवाह के बजाय विवाह जैसे संबंध का है। ऐसा अंतर संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के सिद्धांत के खिलाफ होगा. पीठ ने ये भी कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण का कानून, 2005 लिव-इन संबंधों को मान्यता देता है, लेकिन उसमें मुख्य रूप से नागरिक राहत का प्रावधान है. वहीं धारा 498A आपराधिक जिम्मेदारी तय करती है. सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी को लेकर अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने का निर्देश दिया और कहा कि ऐसे मामलों में बिना प्रारंभिक जांच के गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए. अदालत ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए कहा कि इस मामले में आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं है.
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IPC की धारा 498A में क्या हैं प्रावधान
ये धारा पति या पति के रिश्तदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता के लिए लगाई जाती है. इसमे अधिकतकम 3 साल की जेल के साथ जुर्माना लगाया जा सकता है.धारा 498A में क्रूरता में आमतौर पर ऐसे कृत्य शामिल होते हैं, जिसमें महिला को गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान पहुंचने की संभावना हो और दहेज के लिए उत्पीड़न किया जाए. 1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू हो चुकी है धारा 498A IPC के समान प्रावधान अब BNS की धारा 85 में है.
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