देश में अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति के लोगों को जाति के आधार पर होने वाले उत्पीड़न से बचाने के लिए एससी-एसटी एक्ट 1989 बनाया गया था. इस कानून का पूरा नाम अनुसूचित जाति- अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम-1989 है. इस कानून को 30 जनवरी 1990 को जम्मू कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया था. लेकिन अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटने के बाद से यह कानून केंद्र शासित जम्मू कश्मीर में भी लागू हो गया. इस कानून में अब तक 2015 और 2018 में दो बड़े संशोधन किए गए हैं. आइए देखते हैं कि क्या है ये कानून, इसके तहत मुकदमा कौन दर्ज करा सकता है. इसमें गिरफ्तारी और सजा के प्रावधान क्या हैं.
कब लगता है एससी-एसटी एक्ट
एससी-एसटी एक्ट अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को जाति के नाम पर सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक शोषण से बचाने का प्रावधान करता है. इसका उद्देश्य पीड़ितों को न्याय, मुआवजा और पुनर्वास है. एससी-एसटी एक्ट के तहत कई तरह के अपराध शामिल हैं. साल 2015 में हुए संशोधन के बाद इस कानून में कुल 26 तरह के कृत्यों को अपराध की श्रेणी में डाला गया. इनमें से प्रमुख हैं-
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के मुंह में अखाद्य या अप्रिय पदार्थ डालना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के कब्जे वाले स्थान के प्रवेश द्वार पर या उसके अंदर मल-मूत्र, शव या कोई अन्य घृणित पदार्थ डालना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को जूतों की माला पहनाना,उन्हें नंगा करके या आधा नंगा करके चलने के लिए मजबूर करना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य का जबरन मुंडन करना या उनकी मूंछें काटना या हटाना, उनकी सहमति के बिना उनके शरीर को अपमानजनक तरीके से रंगना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य से संबंधित या उन्हें आवंटित जमीन पर अवैध कब्जा करना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के किसी व्यक्ति को शव ढोने या कब्र खोदने के लिए मजबूर करना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को हाथ से मैला ढोने के काम में लगाने के लिए प्रेरित करना या दूसरों को ऐसा करने की अनुमति देना.
- एससी-एसटी वर्ग की महिलाओं को देवदासी या इसी तरह की अन्य भूमिकाओं में काम करने के लिए मजबूर करना.
- एससी-एसटी वर्ग के लोगों को डराना-धमकाना या उन पर किसी विशेष तरीके से मतदान करने या न करने का दबाव डालना, या उन्हें उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन दाखिल करने से रोकना या उसे वापस लेना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को मंदिर, अस्पताल और स्कूल जैसी सार्वजनिक जगहों तक पहुंचने या वहां से गुजरने के अधिकार से वंचित करना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को सार्वजनिक तौर पर लोगों के सामने कोई भी कारण बताकर अपमानित करना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य की पवित्र वस्तुओं का अपमान करना.
- एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य के खिलाफ यौन प्रकृति के शब्दों, कृत्यों या इशारों का प्रयोग करना.
कैसे दर्ज कराएं शिकायत
एससी-एसटी वर्ग के किसी सदस्य को अगर लगता है कि उसके साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव, अपमान, हिंसा या अत्याचार किया जा रहा है, तो वह पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकता है.इस कानून के तहत एससी-एसटी वर्ग का कोई व्यक्ति एससी-एसटी वर्ग के किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं करा सकता है. इस कानून में एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी की गिरफ्तारी का प्रावधान है. इसका मकसद पीड़ित की सुरक्षा है. कई बार अदालतों ने यह साफ किया है कि अगर कोई व्यक्ति एसटी-एसटी वर्ग के व्यक्ति की जाति का नाम लेता है या अकेले में उसकी बात करता है, तो वह अपराध नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसमें दोष सिद्धि के लिए अपमान करने की मंशा का साबित होना जरूरी है.

एससी-एसटी के तहत दर्ज होने वाले मामलों में तेजी से सुनवाई के लिए जिला स्तर पर विशेष अदालतें बनाई गई हैं, ताकि इन मामलों का जल्द से जल्द निपटारा हो सके. इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर छह माह से लेकर उम्रकैद तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. संज्ञेय श्रेणी का मामला होने की वजह से इस कानून के तहत दर्ज मामलों में अदालत से बाहर समझौते का कोई प्रावधान नहीं है.
एससी-एसटी एक्ट में जमानत
किसी व्यक्ति के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट में केस दर्ज होने के बाद, उसे संज्ञेय अपराध माना जाता है. इस मामले में पहले अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं था, लेकिन संशोधन के बाद यह फैसला किया गया कि मजिस्ट्रेट द्वारा विचार करने के बाद इस केस में जमानत दी जा सकती है. इन मामलों में पुलिस अगर किसी को गिरफ्तार करती है, तो गिरफ्तारी के दो महीने के भीतर उसे चार्जशीट दाखिल करनी होगी. इस कानून के तहत दर्ज मामलों की संख्या बढ़ने और इसके दुरुपयोग के मामले सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस कानून के तहत दर्ज मामलों की जांच डिप्टी एसपी रैंक के अधिकारी करेंगे. केस दर्ज होने के बाद आरोपी को अग्रिम जमानत दी जा सकती है. लेकिन जमानत देना या न देना मजिस्ट्रेट के विवेक पर निर्भर होगा. सरकारी अधिकारी-कर्मचारी पर एसी-एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज होने पर आरोपी की गिरफ्तारी उसके विभाग की इजाजत के बिना नहीं होगी. किसी साधारण व्यक्ति पर एससी एसटी एक्ट का केस दर्ज होता है, तो उसको अरेस्ट करने के लिए पुलिस को पहले एसपी से इजाजत लेनी होगी. कुछ इसी तरह के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में महाराष्ट्र से जुड़े एक मामले की सुनवाई में दिए थे.
इसके बाद सरकार ने अगस्त 2018 में इस कानून में संशोधन किया. इसके बाद से आरोपी की गिरफ्तारी के लिए जांच अधिकारी को किसी अथॉरिटी की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं रह गई. इस कानून के तहत एफआईआर दर्ज करने के लिए शुरुआती जांच की जरूरत नहीं होती है. इसके साथ ही इस कानून के तहत आरोपी की अग्रिम जमानत की व्यवस्था भी खत्म कर दी गई.
क्या करें अगर एससी एसटी एक्ट में झूठा मामला दर्ज हो जाए
अगर किसी व्यक्ति को एससी एसटी एक्ट के केस में झूठा फंसाया जा रहा है तो वह इस तरह से बच सकता है.
- अपने समर्थन में गवाहों के बयान, सीसीटीवी फुटेज, कॉल रिकॉर्ड जैसे सबूत इकट्ठा करें, जिससे यह साबित हो सके कि आपने कुछ नहीं किया है.
- पुलिस की जांच में सहयोग करें.पुलिस जांच के दौरान सही जानकारी और सबूत दें.
- अगर आपको लगता है कि आपके खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत झूठी है तो आप अदालत में याचिका दायर कर एफआईआर रद्द करने की मांग कर सकते हैं.
- अगर निचली अदालत में जमानत नहीं मिलती है तो उच्च अदालत का रुख करें.
- इस कानून में झूठा मामला दर्ज कराने पर किसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं हैं. लेकिन पीड़ित भारतीय न्याय संहिता की धाराओं का उपयोग कर झूठा मामला दर्ज कराने वाले व्यक्ति के खिलाफ अदालत की शरण ले सकता है.
मुकदमा दर्ज कराने वाले को सरकार कितना मुआवजा देती है
इसमें पीड़ित व्यक्तियों को सरकार आर्थिक मुआवजा भी देती है. जैसे उत्तर प्रदेश सरकार 85 हजार से सवा आठ लाख रुपये तक का मुआवजा देती है. मुआवजे की राशि अपराध के अलग-अलग प्रकार में अलग-अलग होती है. यह मुआवजा सरकार मुकदमें के अलग-अलग चरणों में देती है. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस जांच कर आर्थिक सहायता का प्रस्ताव संबंधित जिले के जिला समाज कल्याण अधिकारी को देती है. मुआवजे का वितरण जिला समाज कल्याण अधिकारी के जरिए ही होता है.
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