- सिया गोयल और उनके प्रेमी चेतन चौधरी ने मंगेतर केतन की हत्या की है, दोनों को गिरफ्तार किया गया है
- लोहागढ़ किला सह्याद्री पहाड़ियों में समुद्र तल से 1033 मीटर की ऊंचाई पर है और इसका इतिहास एक हजार साल पुराना
- चालुक्य, राष्ट्रकूट, यादव, बहमनी, निजाम, मुगल और मराठा शासकों का अधिकार रहा है और यह समय के साथ मजबूत होता गया
पुणे की सिया गोयल का मामला इन दिनों चर्चा में है. सिया पर आरोप है कि उन्होंने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने मंगेतर केतन अग्रवाल को खाई में ढकेल कर उनकी हत्या कर दी. पुलिस ने सिया और उनके प्रेमी चेतन चौधरी को गिरफ्तार कर लिया है. पुलिस के मुताबिक यह घटनाक्रम पुणे के लोहागढ़ किले के आसपास हुआ. आइए हम आपको बताते हैं कि लोहागढ़ किला क्या है और क्यों मशहूर है.
लोहागढ़ किला पहाड़ों पर स्थित महाराष्ट्र के किलों में से एक है. यह पुणे से 52 किलोमीटर दूर सह्याद्री की पहाड़ियों पर बना हुआ है. यह समुद्र तल से 1,033 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. महाराष्ट्र के पर्यटन विभाग के मुताबिक लोहागढ़ किले का इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है. इसके निर्माण की शुरुआत 10वीं शताब्दी में लोहतमिया वंश या लोहटमिया वंश के समय हुआ था.इस किले पर चालुक्य, राष्ट्रकूट, यादव, बहमनी, निजाम, मुगल और मराठा शासकों का भी अधिकार रहा. इस दौरान यह किला और मजबूत होता रहा.
लोहागढ़ किले में कितने प्रवेश द्वार हैं
इस किले में चार प्रवेश द्वार हैं. इन्हें गणेश दरवाजा, नारायण दरवाजा, हनुमान दरवाजा और महा दरवाजा के नाम से जाना जाता है. इन दरवाजों पर की गई नक्काशी मराठी कला-संस्कृति का बेजोड़ नमूना है. इस किले के का एक हिस्सा बिच्छू की पूंछ के आकार का है. उसे बिच्छू काडा कहते हैं.इस जगह से सह्याद्री की खूबसूरत पहाड़ियों के दर्शन होते हैं.
मराठा साम्राज्य की स्थापना करने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज ने 1648 ईस्वी में लोहागढ़ किले को अपने कब्जे में लिया था. छत्रपति शिवाजी महाराज और मुगल साम्राज्य के सेनापति राजा जयसिंह प्रथम के बीच 11 जून, 1665 को पुरंदर की संधि हुई थी. इस वजह से शिवाजी को अपने 23 किले मुगलों को सौंपने पड़े थे. जो किले सौंपे गए थे, उनमें लोहागढ़ का यह किला भी शामिल था.लेकिन शिवा जी ने 1670 में इस किलो को फिर से जीत लिया था. उन्होंने सूरत पर हमले में मिले धन-संपदा को सुरक्षित रखने के लिए इस किले का चुनाव किया था.
कभी जैन मुनियों का भी ठिकाना था
पेशवा शासन के मंत्री नाना फणनवीस ने भी इस किले में शरण ली थी. उन्होंने यहां पर एक बड़े जलाशय और बावड़ी का निर्माण कराया था. ये दोनों आज भी वहां मौजूद हैं.
पुणे के कुछ ट्रैकर्स को सितंबर 2019 में किले की दक्षिणी ढलान पर एक गुफा में जैन ब्राह्मी लिपि का प्राचीन शिलालेख मिला था. इतिहासविदों ने इसे दूसरी या पहली शताब्दी ईसा पूर्व का माना था. इससे यह भी पता चलता है कि इस इलाके में कभी जैन मुनि भी रहा करते थे.
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