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Explainer: 7 हाई डेनसिटी रेल कॉरिडोर से कैसे बदल जाएगी रेलवे की तस्वीर? जानिए मोदी सरकार का पूरा प्लान

सोचिए देश की सबसे व्यस्त रेल लाइनों पर ट्रेनों की भीड़ घटे, रफ्तार बढ़े और मालगाड़ियों के लिए अलग कॉरिडोर मिले. सरकार ने एक बड़ा प्लान बना लिया है. देखिए हाई डेंसिटी नेटवर्क और डेडिकेटेड फ्रेड कॉरिडोर मिलकर कैसे बदलने वाली है रेलवे की पूरी तस्वीर?

Explainer: 7 हाई डेनसिटी रेल कॉरिडोर से कैसे बदल जाएगी रेलवे की तस्वीर? जानिए मोदी सरकार का पूरा प्लान
7 हाई डेनसिटी रेल कॉरिडोर से बदल जाएगी रेलवे की सूरत
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  • केंद्र सरकार 7 हाई डेंसिटी रेल कॉरिडोर की क्षमता बढ़ाने का बड़ा प्लान लेकर आई है.
  • डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर से मालगाड़ियों को अलग ट्रैक, यानी रेल यात्रियों को रेलवे ट्रैक पर मिलेगी अधिक जगह.
  • ज्यादा ट्रेनें, टाइमिंग भी दुरुस्त होगी और मजबूत लॉजिस्टिक से बदल सकती है रेलवे की पूरी तस्वीर.

भारतीय रेलवे देश के सात सबसे व्यस्त और रणनीतिक रेल मार्गों की क्षमता बढ़ाने की बड़ी तैयारी कर रहा है. ये देश की राजधानी दिल्ली को मुंबई, हावड़ा, चेन्नई और गुवाहाटी जैसे बड़े आर्थिक और यात्री केंद्रों से जोड़ते हैं. इनमें दिल्ली-हावड़ा, मुंबई-हावड़ा, दिल्ली-मुंबई, दिल्ली-गुवाहाटी, दिल्ली-चेन्नई, हावड़ा-चेन्नई और मुंबई-चेन्नई शामिल हैं. रेलवे की भाषा में इन्हें हाई डेंसिटी नेटवर्क यानी एचडीएन कहा जाता है.

इन रास्तों पर समस्या सिर्फ यह नहीं है कि ट्रेनें ज्यादा हैं. असली समस्या यह है कि एक ही ट्रैक पर पैसेंजर ट्रेनें, लंबी दूरी की ट्रेनें और मालगाड़ियां सभी दौड़ती हैं. जैसे-जैसे मालगाड़ियों और यात्री गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है, पुराने नेटवर्क पर क्षमता बढ़ाने की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि रेलवे पूरे रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ाने में जुटा है.

हाई डेंसिटी नेटवर्क क्या होता है?

हाई डेंसिटी नेटवर्क का आसान मतलब है ऐसा रेल नेटवर्क जिस पर सामान्य रूट की तुलना में बहुत ज्यादा ट्रेनें चलती हैं और ट्रैक की क्षमता पर इसकी वजह से लगातार दबाव रहता है.

रेलवे ने लंबे समय से सात ऐसे प्रमुख रूटों की पहचान की है.

1. दिल्ली-हावड़ा
2. मुंबई-हावड़ा
3. दिल्ली-मुंबई
4. दिल्ली-गुवाहाटी
5. दिल्ली-चेन्नई
6. हावड़ा-चेन्नई
7. मुंबई-चेन्नई

सरकार 2015 में भी इन सात रूटों को हाई डेंसिटी रेल नेटवर्क के रूप में पहले ही सूचीबद्ध कर चुकी है. इन रेल रूट्स पर डबलिंग, तीसरी-चौथी लाइन, सिग्नलिंग, यार्ड सुधार और दूसरी क्षमता बढ़ाने वाली परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की बात कही गई थी. 

यानी यह तैयारी बिल्कुल नई शुरुआत नहीं है बल्कि वर्षों से पहचाने गए सबसे व्यस्त रेल गलियारों को बड़े पैमाने पर अपग्रेड करने की अगली कड़ी है.

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इन्हीं सात रेल रूट्स पर जोर क्यों?

दरअसल रेलवे यातायात पूरे नेटवर्क में समान रूप से बंटा नहीं है. कुछ चुनिंदा रेल रूट्स पर यात्रियों के साथ-साथ कोयला, स्टील, सीमेंट, खाद, अनाज, कंटेनर और अन्य सामानों की भारी आवाजाही होती है. 

यही वजह है कि इन रूट्स पर ट्रेनों की हेवी ट्रैफिक होती है. पैसेंजर, मालगाड़ी और एक्सप्रेस ट्रेनें एक के बाद एक लगातार आवाजाही करती रहती हैं. इस हेवी ट्रैफिक का असर इन रूट्स पर पड़ने वाले स्टेशनों पर भी पड़ता है.

अगस्त 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय रेलवे के करीब 16% नेटवर्क पर देश के लगभग 41% रेल यातायात का दबाव है. इसी वजह से रेलवे सात हाई डेंसिटी रूट्स पर बड़े पैमाने पर मल्टी ट्रैकिंग की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि जब आप ट्रेन में सफर करते हैं तो कई बार आपकी ट्रेन लेट होती है. ऐसा केवल इसलिए नहीं होता कि यह ट्रेन की कमी की वजह से है, बल्कि इसकी एक वजह ट्रैक की कमी के कारण भी है. 

चार लाइन का नेटवर्क क्यों जरूरी है?

इस समय देश में कई रेल रूट्स पर दो मुख्य लाइनें हैं, जिन पर दोनों दिशाओं से ट्रेनों की आवाजाही होती है. अब तीसरा और चौथा ट्रैक बनने से रेलवे के पास एक साथ दोनों दिशाओं से दो-दो ट्रेनों को चलाने की गुंजाइश होगी. यानी रेल की ट्रैफिक दोगुनी हो सकती है.

मसलन किसी हिस्से में एक लाइन पर तेज यात्री ट्रेन, दूसरी लाइन पर दूसरी दिशा की यात्री ट्रेन, तीसरी लाइन पर मालगाड़ी और चौथी लाइन पर दूसरी दिशा की मालगाड़ी चलाने की क्षमता विकसित की जा सकती है.

हालांकि यह परिचालन बिल्कुल ऐसा ही होगा, यह जरूरी नहीं है. पर चार लाइनों का मकसद है कि एक ट्रेन के कारण दूसरी ट्रेन को बार-बार नहीं रोकना पड़े.

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आम आदमी को इसका क्या फायदा होगा?

रेलवे के आम यात्रियों के लिए ट्रेनों का समय पर परिचालन सबसे महत्वपूर्ण है. तो आम आदमी के लिए ट्रैकों के चौड़ीकरण से भविष्य में नई ट्रेनों के मिलने, मौजूदा ट्रेनों की फ्रीक्वेंसी बढ़ने और भीड़ वाले ट्रैक पर ट्रेनों का संचालन सुधरने की गुंजाइश बढ़ सकती है.

खासकर दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा जैसे मार्गों पर इसका असर देखने को मिलेगा क्योंकि यहां वर्तमान में हेवी ट्रैफिक है.

इसके अलावा एक अप्रत्यक्ष फायदा भी होगा. डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के बनने के बाद लंबी दूरी के सामानों का परिवहन रेलवे के जरिए वर्तमान की तुलना में मुफीद होगा. इससे माल ढुलाई और लॉजिस्टिक व्यवस्था जहां अभी की तुलना में रेलवे पर अधिक निर्भर होंगे वहीं इससे सड़क पर दबाव भी कम हो सकता है.

इतना ही नहीं, रेलवे इन दोनों हेवी डेंसिटी रूट्स पर कवच, बेहतर सिग्नल और दूसरी तकनीकों को आगे बढ़ा रहा है. रेल मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक मार्च 2026 तक हेवी डेंसिटी रेल नेटवर्क समेत कई अहम हिस्सों में कवच के ट्रैक साइड का काम 24 हजार किलोमीटर तक किया जा चुका है.

यानी रेलवे पटरी बढ़ाने के साथ ही सिग्नलिंग, सुरक्षा, स्टेशन और यार्ड क्षमता इन सबको साथ लेकर चलने की कोशिश हो रही है.

लेकिन असली गेम डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर यानी डीएफसी का है.

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर क्या है?

हेवी डेंसिटी नेटवर्क और डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को अलग-अलग समझना जरूरी है. हेवी डेंसिटी रेल नेटवर्क का मुख्य मकसद मौजूदा व्यस्त रेल नेटवर्क की क्षमता बढ़ाना है. वहीं डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का उद्देश्य मालगाड़ियों के लिए अलग और ज्यादा क्षमता वाला ट्रैक तैयार करना है. 

यानी जहां मौजूदा रेल नेटवर्क को दो से चार पटरियों पर करने की योजना है वहीं मालगाड़ियों के लिए एक डेडिकेटेड यानी समर्पित ट्रैक बनाने की कोशिश हो रही है.

भारत में अभी कितने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर हैं?

दो बड़े डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पूरे हो चुके हैं.

लुधियाना से सोननगर तक करीब 1337 किलोमीटर लंबा ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और दादरी से जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक करीब 1506 किलोमीटर लंबा वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर.

रेल मंत्रालय के मुताबिक इन दोनों कॉरिडोर पर औसतन 443 ट्रेनें प्रतिदिन चलती हैं.

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सरकार का अगला प्लान क्या है?

2026 के बजट में सरकार ने पश्चिम बंगाल के डंकुनी से गुजरात के सूरत के बीच करीब 2052 किलोमीटर लंबे नए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का एलान किया है.  यह ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र से होकर जाएगा और मौजूदा वेस्टर्न डीएफसी से जुड़ेगा.

इसका मकसद पूर्वी भारत के औद्योगिक और खनिज क्षेत्रों से पश्चिमी तट के बंदरगाहों तक माल की आवाजाही को मजबूत करना है.

फिलहाल इसकी विस्तृत योजना पर काम चल रहा है तो यह तुरंत नहीं बनने जा रहा बल्कि रेलवे के अगले चरण की बड़ी योजना है.

अगर पूरी तस्वीर को एक साथ देखें तो रेलवे में कई समानांतर काम चल रहे हैं.

पहलाः हाई डेंसिटी नेटवर्क को मजबूत बनाना. इसके लिए 7 रूट्स पर तीसरी-चौथी लाइन और दूसरी क्षमता बढ़ाई जा रही हैं.

दूसराः डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का विस्तार, जिससे मालगाड़ियों को अलग रास्ता देकर मुख्य नेटवर्क पर आवाजाही निर्बाध और तेज हो सके.

तीसराः सुरक्षा तकनीक. कवच, ऑटोमेटिक ब्लॉक सिग्नलिंग, इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग जैसी तकनीकों का विस्तार.

चौथाः हाई-स्पीड रेल. 2026 के बजट में सात नए हाई स्पीड रेल कॉरिडोर का एलान भी किया गया था. इसमें मुंबई-पुणे, पुणे-हैदराबाद, हैदराबाद-बेंगलुरु, हैदराबाद-चेन्नई, चेन्नई-बेंगलुरु, दिल्ली-वाराणसी और वाराणसी-सिलीगुड़ी शामिल हैं. इनकी कुल लंबाई करीब 4000 किलोमीटर बताई गई है.

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इसका भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे फायदा होगा?

रेलवे का फ्रेट कॉरिडोर नेटवर्क जितना अधिक बेहतर होगा, माल ढुलाई उतनी तेजी और भरोसे के साथ एक जगह से दूसरी हो सकेगा.

इसका असर बंदरगाहों तक माल पहुंचने में, उद्योगों की सप्लाई चेन में, कोयला और कच्चे माल की आवाजाही में, कंटेनर परिवहन में, सड़क से रेल की ओर माल स्थानांतरण में और लॉजिस्टिक्स लागत में देखने को मिल सकता है.

सरकार का लक्ष्य सिर्फ ज्यादा ट्रेन चलाना नहीं है. रेल को देश की माल ढुलाई और आर्थिक गतिविधि की रीढ़ बनाने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है.

2025-26 में रेलवे की माल ढुलाई 1,670 मिलियन टन तक पहुंची, जबकि 2014-15 में यह 1,098 मिलियन टन थी.

कुल मिलाकर, मालगाड़ियों के लिए डेडिकेटेड ट्रैक बना कर एक तरफ माल ढुलाई को बेहतर बनाया जा रहा है तो दूसरी ओर ट्रेन से सफर करने वालों के लिए पटरियों पर ज्यादा जगह बनाने का काम भी साथ ही चल रहा है.

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