- दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश होटल की आग में 23 लोगों की मौत हुई, जिसमें बांग्लादेशी नागरिक सामया भी बची।
- सामया ने बताया कि आग लगने पर होटल में कोई आपातकालीन निकासी का रास्ता नहीं था और सभी फंस गए थे।
- आग लगने के बाद बचाव दल तक पहुंचना मुश्किल था क्योंकि गली बहुत तंग थी और धुआं घना था।
दिल्ली के मालवीय नगर स्थित फ्लोरिश होटल में हुए उस भयावह अग्निकांड में 23 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी. उस हादसे में मौत के मुंह से जिंदा बचकर निकली बांग्लादेश की नागरिक सामया ने शनिवार को एक ऐसा सनसनीखेज और झकझोर देने वाला खुलासा किया है, जिसने सरकार और दूतावास के मानवीय दावों का मुखौटा उतार दिया है.
दिल्ली के मैक्स अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद रोते हुए सामया ने NDTV से बातचीत में न सिर्फ उस दम घोंटने वाले अग्निकांड सुबह की रोंगटे खड़े कर देने वाली आपबीती सुनाई, बल्कि यह भी उजागर किया कि आपदा के समय जब सरकार मुफ्त मदद के दावे कर रही थी, तब उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर अपनों के शव वतन ले जाने के बदले उनसे लाखों रुपये वसूल लिए गए.
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Photo Credit: NDTV
बांग्लादेश की सामया की पूरी कहानी उसी की जुबानी
मैं सामया हूं, बांग्लादेश की रहने वाली हूं. 2 जून को हम पांच लोग दिल्ली आए थे. एयरपोर्ट से आकर शाम सात बजे होटल में रूम बुक किया था. तीसरी मंज़िल पर 302 और 304 नंबर के रूम में नाइट स्टे किया था. सुबह करीब 7-8 बजे मामा ने बताया कि जहां कुकिंग हो रही है, वहां छोटी सी आग लगी हुई है. वह यह देखकर हम सबको बुलाने ऊपर आए थे. हम सभी सुरक्षित नीचे जाते, उससे पहले ही आग तेजी से ऊपर की ओर आ गई थी. पहली से लेकर तीनों मंज़िलें आग से घिर गई थीं. अब हम चाहकर भी नीचे नहीं जा सकते थे. हम सब घबरा गए थे और भारी तनाव में आ गए कि कहां जाएं, क्या करें? वहां कोई जंगला या खिड़की कुछ भी नहीं था. उस होटल में कोई आपातकालीन दरवाजा भी नहीं था कि हम सुरक्षित वहां से निकल सकें.
उसके बाद पूरे होटल की लाइट चली गई. चारों तरफ बस धुआं और आग थी. मैंने अपने मोबाइल की फ़्लैश लाइट ऑन कर रखी थी. मैं जान बचाने के लिए एक नाइजीरियन कपल के पीछे-पीछे उनके रूम में चली गई. उन्होंने डरकर रूम बंद कर लिया. थोड़ी देर में एक जोरदार ब्लास्ट की आवाज सुनाई दी. फिर बहुत कोशिश के बाद मैंने एक ग्लास तोड़ा और आग से बची. देखा तो सब चिल्ला रहे थे. हम तक बचाव दल भी नहीं पहुंच पा रहा था, क्योंकि गली बहुत तंग थी.
दिल्ली अग्निकांड के एक सप्ताह बाद आया होश
अब तक मेरी हिम्मत जवाब देने लगी थी और ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगी थी. लग रहा था कि अब जान निकल जाएगी. उसके बाद हम बेहोश हो चुके थे. मैक्स अस्पताल की वजह से मेरी जान बची है. अस्पताल में तीन दिन मैं लाइफ सपोर्ट पर रही. मुझे यहां एक सप्ताह बाद होश आया तो पता चला कि हम पांच में से दो लोग, मेरी मामी और मामी के भाई की मौत हो चुकी है. उन दोनों के शव बांग्लादेश पहुंचा दिए गए हैं.
दूतावास ने प्रति शव 1 लाख 80 हजार रुपए लिए
सरकार ने वादा किया था कि हादसे में जान गंवाने वाले विदेशी लोगों के परिजनों को 10 लाख रुपए की आर्थिक मदद की जाएगी और शव भिजवाने के लिए निशुल्क टिकट मुहैया करवाएंगे, लेकिन हमें कुछ नहीं मिला है. हमें दूतावास को प्रति शव 1 लाख 80 हजार रुपए देने पड़े हैं. वे बिना पैसे लिए बांग्लादेश शव पहुंचाने को तैयार ही नहीं हो रहे थे.
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