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उत्तिरामेरुर की 1,000 साल पुरानी कहानी: PM मोदी ने किया जिक्र तो इतिहासकारों ने बताया पूरा मॉडल

उत्तिरामेरुर याद दिला रहा है कि भारत में लोकतांत्रिक शासन की उत्पत्ति प्राचीन है—आधुनिक चुनावी संस्थाओं के जन्म से बहुत पहले से ही यहां चुनाव संरचना, संहिता और प्रचलन रहा है.

उत्तिरामेरुर की 1,000 साल पुरानी कहानी: PM मोदी ने किया जिक्र तो इतिहासकारों ने बताया पूरा मॉडल
  • तमिलनाडु के उत्तिरामेरुर शिलालेखों में प्राचीन लोकतंत्र की विस्तृत चुनावी व्यवस्था का उल्लेख मिलता है
  • कुदावोलाई प्रणाली में ताड़ के पत्तों पर उम्मीदवारों के नाम लिखकर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किया जाता था
  • उम्मीदवारों की उम्र तीस से सत्तर वर्ष के बीच होनी चाहिए और उन्हें गांव में ज़मीन का मालिक होना आवश्यक था
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में तमिलनाडु के प्रसिद्ध उत्तिरामेरुर शिलालेखों का उल्लेख किया तो लोगों में उस व्यवस्था को जानने की रुचि जागृत हुई है. कई इतिहासकार और विद्वान इसे दुनिया के सबसे प्राचीन और जमीनी स्तर के लोकतंत्र के सबसे विस्तृत मॉडलों में से एक मानते हैं. उनकी टिप्पणियों ने चोल-युग की कुदावोलाई सिस्टम पर फिर से ध्यान आकर्षित किया है, जो एक हज़ार साल से भी पहले प्रचलित एक चुनावी प्रक्रिया थी, जिसमें गांव के नेताओं का चयन एक विस्तृत चुनाव प्रणाली के माध्यम से किया जाता था.

इतिहासकार क्या कहते हैं

  1. कांचीपुरम के पास उत्तिरामेरुर में प्राचीन वैकुंड पेरुमल मंदिर की दीवारों पर अंकित ये शिलालेख स्थानीय शासन के एक उच्च संरचित ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं. इतिहासकार डॉ. नंदिता कृष्णा ने एनडीटीवी से बात करते हुए इन शिलालेखों को एक प्राचीन चुनाव आयोग की पुस्तिका की तरह बताया, जिसमें प्रक्रियाओं, पात्रता नियमों, अयोग्यता मानदंडों और निर्वाचित प्रतिनिधियों के कर्तव्यों की व्याख्या की गई है.
  2. इस प्रणाली का मूल कुदावोलाई पद्धति थी. ताड़ के पत्तों पर लिखे उम्मीदवारों के नाम एक बर्तन में रखे जाते थे और एक बच्चे को निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए पर्ची निकालने को कहा जाता था. तमिल विद्वान और तमिल के सहायक प्रोफेसर डॉ. बालाजी कहते हैं, "नेताओं का चुनाव पारदर्शी तरीके से और अक्सर संयोग से होता था, लेकिन केवल सख्त पात्रता मानदंडों को पूरा करने के बाद ही." उम्मीदवारों की आयु 35 से 70 वर्ष के बीच होनी चाहिए थी, जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए गांव में ज़मीन का मालिक होना चाहिए था और सटीक हिसाब-किताब रखने वाला होना चाहिए था. जो लोग हिसाब-किताब जमा नहीं कर पाते थे, उन्हें और उनके परिवारों को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता था.
  3. चोल राजा विशाल क्षेत्रों पर शासन करते थे, स्थानीय शासन इन निर्वाचित ग्राम निकायों द्वारा संचालित होता था, जो राजस्व, सार्वजनिक कार्यों और सामुदायिक मामलों का प्रबंधन करते थे. डॉ. कृष्णा ज़ोर देते हैं, "यह विकेंद्रीकरण का एक मज़बूत मॉडल था. भारत लोकतंत्र की जननी है. अंग्रेज़ भी इसे अपनाते थे. हमारे पास जो था, वह कहीं ज़्यादा पुराना और गहराई से जड़ जमाए हुए था."
  4. दोनों विशेषज्ञ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ज़मीन के मालिकाना हक़ पर ज़ोर देने का उद्देश्य धनी लोगों को बढ़ावा देना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि निर्णय लेने वाले लोग समुदाय के ज़िम्मेदार हितधारक हों. निर्वाचित सदस्यों से अपेक्षा की जाती थी कि वे गांव के संसाधनों की रक्षा करें, निष्पक्ष रूप से कर वसूलें और रिकॉर्ड बनाए रखें—ऐसा न करने पर कठोर दंड का प्रावधान था.
  5. जैसे-जैसे राष्ट्रीय स्तर पर नए सिरे से चर्चाएं शुरू हो रही हैं, उत्तिरामेरुर याद दिला रहा है कि भारत में लोकतांत्रिक शासन की उत्पत्ति प्राचीन है—आधुनिक चुनावी संस्थाओं के जन्म से बहुत पहले से ही यहां चुनाव संरचना, संहिता और प्रचलन रहा है.

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