- चुनाव से पहले आरक्षण नीति को लेकर सामान्य वर्ग के युवाओं ने दिल्ली में प्रदर्शन कर समीक्षा की मांग की है
- ब्रजेश पाठक ने प्रदर्शनकारियों से मुलाकात कर उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखने का आश्वासन दिया है
- सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा की आरक्षण समीक्षा को आरक्षण समाप्त करने की साजिश बताते हुए विरोध जताया है
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है. लेकिन आरक्षण को लेकर सियासत अभी से गरमा गई है. इसकी शुरुआत दिल्ली के जंतर-मंतर से हुई, जहां सामान्य वर्ग के कुछ युवाओं ने आरक्षण नीति की समीक्षा और सुधार की मांग को लेकर प्रदर्शन किया. सियासत तब तेज हो गई जब यूपी के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने इस प्रदर्शन का चेहरा बने हर्ष दुबे से मुलाकात की और प्रदर्शनकारियों की चिंताओं को गंभीर बताया. बीते शनिवार को लखनऊ में ब्रजेश पाठक ने हर्ष दुबे के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा, 'छात्रों की मांगों और चिंताओं की गंभीरता के मद्देनजर दो दिनों में उनकी मांगों को केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष प्रभावी ढंग से रखा जाएगा. संबंधित केंद्रीय मंत्री से उनकी भेंट भी कराई जाएगी. छात्रों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सरकार प्रतिबद्ध है, किसी भी छात्र के साथ अन्याय नहीं होगा. भाजपा के इसी कदम को विपक्ष ने लपक लिया है.
अखिलेश का वार- ये सुधार नहीं, आरक्षण खत्म करने की साजिश
मौका मिलते ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इसे PDA के खिलाफ साजिश करार दिया. अखिलेश ने सोशल मीडिया पर लिखा- 'आरक्षण सुधार' के नाम पर 'आरक्षण समाप्ति' का षड्यंत्र PDA समाज के खिलाफ एक और गहरी साजिश है. आरक्षण PDA का अधिकार है, किसी की इच्छा का विषय नहीं. भाजपा कभी 'समीक्षा' तो कभी 'सुधार' जैसे शब्दों से, कभी 'क्रीमीलेयर' तो कभी 'आरक्षण त्यागने' की सलाह देकर आरक्षण की हकमारी की कोशिश करती है. आरक्षण था, आरक्षण है, आरक्षण रहेगा!'
खरगे ने खोला नौकरियों का हिसाब
आरक्षण की बहस को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नया एंगल दिया. उन्होंने आंकड़ों के साथ मोदी सरकार पर हमला बोला- 'मोदी सरकार ने चोरी के दरवाजे से आरक्षण खत्म करने की योजना रची है. 2015 में केंद्र में 4.21 लाख पद खाली थे, 2024 में ये बढ़कर 8.24 लाख हो गए. PSU में 5.1 लाख स्थायी नौकरियां खत्म. ठेका कर्मचारियों की हिस्सेदारी 19% से 49% हो गई.' खरगे ने इसके आगे लिखा, 'सरकारी पद खाली रखो तो आरक्षण का अवसर खत्म, PSU बेचो तो आरक्षित नौकरियां खत्म, स्थायी नौकरी को ठेके में बदलो तो आरक्षण खत्म. आरक्षण खत्म करने के लिए संविधान बदलना जरूरी नहीं, आरक्षण वाली नौकरियां खत्म कर देना ही काफी है.'
विपक्ष का नया नैरेटिव- सामाजिक न्याय खतरे में?
जाहिर है कि विपक्ष को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा मिल गया है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-सपा के 'संविधान खतरे में' के नारे ने यूपी में गठबंधन को बड़ी बढ़त दिलाई थी. अब विधानसभा चुनाव में INDIA गठबंधन उसी तर्ज पर 'आरक्षण' और 'सामाजिक न्याय' को बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है. इसी कड़ी में विपक्ष ने जाति जनगणना में OBC कॉलम न होने का मुद्दा भी उठाना शुरू कर दिया है. राहुल गांधी और खरगे ने इसको लेकर पीएम मोदी को पत्र लिखकर विरोध जताया है.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा- 'आरक्षण और जाति जनगणना दोनों सामाजिक न्याय के मुद्दे हैं. RSS ने जब संविधान सभा ने पहली बार मसौदा पारित किया था तो संविधान जलाया था. आंबेडकर, नेहरू, गांधी के पुतले जलाए थे. BJP-RSS संविधान में विश्वास नहीं रखती. पिछले 12 सालों में सरकार की नीतियां सामाजिक न्याय की दिशा में नहीं हैं.' कुल मिलाकर, 2027 से पहले यूपी में आरक्षण बड़ा सियासी हथियार बनता दिख रहा है और अब भाजपा को सामान्य वर्ग को नाराज़ किए बिना विपक्ष के इस 'सामाजिक न्याय खतरे में' नैरेटिव की काट ढूंढनी होगी. भाजपा के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है.
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